हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-53
इसमें मेरा क्या कुसूर है? मैं खुद नहीं बैठा हूं, मुझे किसी ने बैठाया है हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने मुस्कुराते हुए फरमाया।
गुदड़ी पोश आपकी बात का मफहूम नहीं
समझा और उसी गुस्ताखाना अंदाज में कहने लगा सारी दुनिया नजरें लेकर आ रही है
खानकाह में माल दौल के ढेर लगे हैं और
मुझे एक रोटी तक नहीं।
हजरत निजामुद्दीन आलिया ने अपने
खादिमे खास ख्वाजा इकबाल से फरमाया जरूरतमंद है और उसे ख्वाहिशात की आग ने जला
डाला है,
अगर तुम से हो सके तो आग को बुझा डालो हजरत ख्वाजा इकबाल उस गुदड़ी पोश को ले
जाकर जमाअत खाने की तरफ चले गये और उसकी जरूरत पूरी करने के बाद उसे रूख्सत कर
दिया।
फिर वो गुस्ताख फकीर चला गया
तो हजरत महबूब इलाही ने हाजिरीन मज्लिस को मुखातिब करते हुए फरमाया
खुशगुफ्तार को तो सभी अपनी मज्लिस में जगह देते हैं और सरों पर बिठाते हैं मगर ये
बद जुबान लोग कहां जाएं? यहां बहुत से लोग ऐसे आते हैं जो अपने साथ नजर लाते हैं और कदमों पर सर रखते
हैं फिर वो लोग क्यों न दुआएं दें और
उसके जवाब में कुछ तोहफे लेकर जाएं ।
इसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने अपने जिंदगी का एक वाक्या बयान करते हुए फरमाया एक बार कई गुस्ताख और दरदीदा
दहन लोग मेरे पास आए और उनके पास बुरे अल्फाज का जिस कदर सरमाया था वो सब का सब उन्होंने
मुझ पर खर्च कर दिया मैंने उनके किसी बात का जवाब नहीं दिया और खामोश बैठा रहा
आखिर उनकी जबानें थक गईं और वो ये कहकर चले गये जब तक ये दुनिया कायम है, उस वक्त तक सारी भलाईयां हमारे
लिये और सारी बुराईयां तुम्हारे लिये।
हजरत महबूब इलाही ने अपने पीरो मुर्शिद
का जिक्र करते हुए फरमाया एक बार इसी किस्म के बे बाक लोग हजरत शेखुल इस्लाम फरीदुद्दीन गंज शकर की
खिदमत में हाजिर हुए और अपनी आदत के मुताबिक हजरत शेख की जनाब में गुस्ताखियां
करते हुए कहने लगे बुत बने बैठे हो और मखलूखे खुदा से अपनी परश्तिश कराते हो।
हजरत बाबा फरीद ने निहायत ही शीरीं
लहजे में फरमाया मैं खुद यहां नहीं बैठा हूं अल्लाह तआला ने मुझे बैठाया है।
गुस्ताखों की जमाअत ने इसी दरदीदा
दहनी का मुजाहिरा करते हुए कहा नहीं तुम खुद बुत बनकर बैठे हो ।
हजरत बाबा फरीद ने जवाब में फरमाया
अगर तुम मुझे बुत समझते हो तो उस बुत को भी अल्लाह तअला ने बनया है।
आखिर वो बेबाकर लोग शर्मिंदा होकर
चले गये।
उसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने हजरत बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी का जिक्र करते हुए फरमाया एक बार उन गुस्ताख
लोगों की एक जमाअत हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया की खिदमत में भी हाजिर हुई हजरत शेख
ऐसे लोगों को पसंद नहीं करते थे खिदमगारों को खास हिदायत थी कि वो लोगों पर खानकाह
के दरवाजे बंद रखे जाएं फिर भी किसी न किसी तरह गुस्ताखों का वो गिरोह खानकाह के
अंदर दाखिल हो गया और हजरत बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी से बहस करने लगा।
तुम्हें यहां किसने बिठाया है कि
तुम खुदा के बंदों पर हुकुमत करो और मजहब की आड़ लेकर अकीदत व इरादत के बहाने उन्हें
अपना गुलाम बनाओ।
हजरत बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी
पहले ही उन जैसे लोगों को ना पसंद करते थे फिर जब गुस्ताखों की जमाअत ने दरदीदा
दहनी का मुजाहिरा किया तो शेख ने इंतिहाई ना खुशगवार लहजे में फरमाया मैं तुम्हारे
किसी सवाल का जवाब देना पसंद नहीं करता बेहतरी यही है कि तुम लोग किसी ताखीर के
बगैर मेरी खानकाह से निकल जाओ।
हजरत शेख की बात सुनकर वो लोग बुरा
कहते हुए खानकाह से चले गये उनके जाते ही हजरत बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी ने अपने
खिदमगारों को हुक्म दिया कि खानकाह के दरवाजे बंद कर दिया जाए हजरत शेख के हुक्म
पर अमल किया गया तो बे अदब लोगों का वो गिरोह कुछ और बरहम हो गया वो बेहूदा लोग
हजरत बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी का नाम ले लेकर इंतिहाई फहश और न जेबा कलिमात अदा
करते रहे फिर जब चींखते चीखते उन गुस्ताखों
की आवाजे बैठ गईं तो उन्होंने खानकाह के दरवोज पर संगबारी शुरू कर दी सारे
खिदमगार हैरान परेशान थे हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी कुछ देर तक अपनी
खानकाह के दरवाजे पर पत्थरों की ये बारिश बर्दाश्त करते रह फिर यकायक आपको जोश आ
गया और इसी हालत जलाल में अपने खुद्दाम को मुखातिब करते हुए फरमाया खानकाह का
दरवाजा खोल दो और उन गुस्ताखों को अंदर बुलालो ।
खिदमगारों ने हुक्म शेख पर अमल
करते हुए खानकाह का दरवाजा खोल दिया ये सूरत हाल देखकर हाल देखकर वो बेबाकों का
गिरोह कहकहे लगाने लगा खानकाह का दरवाजा खुलने को वो कम नजर लोग अपनी काम्यिाबी
समझ रहे थे।

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