हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-60
मौलाना अहमद नीशापुरी बहुत ही सलीके
और इज्जत से बात कर रहे थे मगर उस शख्स
ने उनकी एक भी नहीं सुनी तुम उसे नहीं जानते ये हुकूमत का बागी है अलाउल मलिक के
लहजे से नफरत और गजब की आग बरस रही थी उसने कई मकामात पर हिन्दुओं से मुलाकातें
की हैं और ये कहा कि अलाउद्दीन ने मेरे राजा राम देव को लूटा है इसलिये तमाम हिन्दुओं
को सुल्तान अलाउद्दीन से इंतिकाम लेना चाहिये कानून उसे माफ नहीं करेगा ऐसे संगीन
जुर्म की सजा सिर्फ मौत है।
मैं तुर्क जबान से ज्याद वाकिफ
नहीं था फिर भी मैंने उस शख्स की बातों मतलब समझ लिया कि मौत अपना खूनी मुंह खोले
हुए मेरी तरफ बढ़ने लगी अभी ये बातें खत्म नहीं हुई थी कि हजरत शेख निजामुद्दीन औलिया के
खादिम खास ख्वाजा इकबाल वहां तश्रीफ लाये और अलाउल मलिक के नायब को मुखातिब करके
कहने लगे हमारे पीरो मुर्शिद ने फरमाया है कि हम महेन्द्र देव को कहीं जाने नहीं
देंगे अलाउल मलिक हमारे पास आए और ये
बातये कि महेन्द्र देव ने किया जुर्म किया है?
अलाउलमलिक के नायब ने हजरत ख्वाजा
इकबाल को बड़ी हैरत से देखा फिर इसी तेज
लहजे में बोला तुम्हारे शेख को कैसे मालूम हुआ कि मैं महेन्द्र देव को गिरफ्तार
करने आया हूं मैं ने यहां आने से पहले किसी से इसका जिक्र नहीं किया था।
तुम्हें क्या मालूम कि हमारे शेख
क्या हैं और अल्लाह ने उन्हें कैसी रूहानी ताकत बख्शी है हजरत ख्वाजा इकबाल
ने जवाबन फरमाया मैं उन बातों को नहीं
मानता कोतवाल के नायब का लहजा गुस्ताखाना और गजबनाक था तुम्हारे हजरत दरवेश हों
या सहिबे कमाल हो , मेरे नजदीक उन चीजों की कोई हैसियत नहीं वो कोतवाल के पीर
हों, वजीर हों या कुछ भी मैं उन बातो
से मुताअस्सिर नहीं हो सकता मैं शाही मुजरिम को लेने आया हूं और हर हाल में लेकर
जाउंगा अगर तुम मेरे काम में मुदाखिलत करोगे तो मैं उसका सर लेकर जाउंगा।
हजरत ख्वाजा इकबाल एक नर्म दिल
इंसान थे मैँने देखा कि उनका चेहरा जर्द पड़ गया है और इंतिहाई कोशिश के
बावजूद नायब कोतवाल की सख्त कलामी का जवाब न दे सके मुझे अपनी मौत चंद कदम के
फासले पर नजर आ रही थी अचानक हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद आगे बढ़े और निहायत ही
जुराअत के साथ फरमाने लगे किसकी मजाल है जो हमारे मेहमान को हजरत की इजाजत के बगैर
यहां से ले जाये।
ये सुनते ही उस शख्स ने अपनी
तलवार नियाम से खींच ली उससे पहले के मेरी गर्दन शमशीर की जद में आती, हजरत ख्वाजा सैयद मूसा कमाल ने
जुराअत का मुजाहिरा किया वो तेजी से आगे बढ़े और उन्होंने अपनी जान की परवाह किये
बगैर नायब कोतवाल का हाथ पकड़ लिया और दूसरे हाथ से बाजू मरोड़कर तलवाल छीन ली
मौलाना अहमद नीशापुरी ने ख्वाजा सैयद मूसा की मदद की और फिर उस गुस्ताख के दोनों
हाथ बांधकर बैठा दिया गया मैंने देखा कि उसकी आंखे शेर आंखों की तरह चमक रही थी उसके
हांटों से कफ उबल कर दाढ़ी पर टपक रहा था और उसकी जबान से मुसलमसल गुस्ताखाना अल्फाज
अदा हो रहे थे ।

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