मुगल बादशाह जहीरूद्दीन बाबर (भाग-1)
उसका पूरा नाम जहीरूद्दीन बाबर था।
उसका जन्म 14 फरवरी को वादी फरगाना के हुक्मरां उमर शेख
मिर्जा के यहां हुआ था।
1496 में जब उमर शेख मिर्जा का इंतेकाल हो गया तो वादी-ए-
फरगाना का तख्त व ताज जहीरूद्दीन बाबर के हाथ आया उस वक्त बाबर की उम्र 12 साल
थी।
बाबर का वालिद उमर शेख अजीम हुक्मरां तैमूर लंग की चौथी
पुश्त से था और उसकी मां चंगेज खान के
लड़के चोगताई खान की नस्ल से थी इसलिये उसकी मां निगार खानम ताशकंद के मंगोल हुक्मरां
यूनुस खान की बेटी थी जो चंगेज खान के
बेटे चोगताई खान का बेटा था।
इस लिहाज से बाबर की रगों में अपने बाप की तरफ से चुगताई
खान और मां की तरफ से मंगोल खानदान का खून दौड़ रहा था।
बाबार का बाप फरगाना का हुक्मरां उमर शेख बाबर के दादा अबू
सईद के नौ बेटों में से एक था।
सुल्तान अबू सईद खान तैमूर लंग के बेटे शाहरूख खान का पोता था।
अबू सईद 1457 में तख्त पर बैठा उसका हुकूत का दौर बिल्कु
अलग था वो अपने दौर का सबसे ताकतवर बादशाह माना जाता था उसने समरकंद पर भी कब्जा
कर लिया था बाद में उसने मावराय नहर, बदखशां, काबुल, कंधार, इराक, और खरासान को भी
अपनी हुकूमत में शामिल कर लिया था। सुल्तान अबू सईद बहुत सी अच्छी आदतों का
मालिक था और उसमें वकार दूरदर्शी व साफ बोलने और हैरत अंगेज सियासी समझ थी। उसकी सल्तनत उसके बेटों में बंट गई उसके सबसे
बड़े बेटे को बदखशां और हिसार के इलाके मिले, दूसरे बेटे
अलगा बेग के हिस्से में काबुल और गजनी की
हुकूमत आई जबकि बाबर के बाप उमर शेख के हिस्से में फरागाना का इलाका आया जिसका
मर्कज शहर अंदजान था।
फरगाना की जमीन दुनिया के सिरे पर थी उसके पूरव में काशगर
पश्चिम में समरकंद और दक्षिण में बदखशां के बुलंद
पहाड़ी इलाके थे और उत्तर में
अलमालीक और अलमाता की वादियां थीं। फरगाना की वादी जिसका हुक्मरां बाबर का बाप
उमर शेख था। उसका रकबा कुछ ज्यादा नहीं था लेकिन यहां अनाज और फल बहुत ज्यादा
पैदा होते थे इसके हर तरफ पहाडि़यां खड़ी हुईं थीं सिवाय पश्चिम के जो समरकंद की तरफ थे इस तरफ
पहाडि़या उठी हुईं थीं और दूर दूर तक उस तरफ से लोग फरगाना में आ सकते थे। इसी
इलाके में दरिया-ए- समून बहता हुआ खजंद शहर से गुजरकर उत्तर का रूख करता है फिर
आगे जाकर बहरे अराल में गिर जाता है।
बाबर का बाप उमर शेख मिर्जा कहने को तो बड़ा सखी फैयाज आदमी
था दूसरों को फायदा पहुंचाने में भी हमेशा आगे रहता था लेकिन खुद अपने फायदे का
नहीं सोचता था। वो अपने शहर ‘’अंदजान’’ में
अजनबियों का स्वागत तो जरूरत करता था मगर उसे इतनी भी फिक्र नहीं हुई कि जो उसकी
हुकूमत में आने वाली जमीन की हिफाजत के लिये कोई फौज भी तैयार करता बाबर अपने बाप
से इसके बारे अपने ख्यालात का इजहार करता था।
मेरे बाप की फैयाजीयां बड़ी थीं इसी तरह उसका दिल भी बड़ी
बड़ी उम्मीदें और बड़े बड़े मंसूबे बांधता था हर वक्त ऊंचे ऊंचे ख्वाब सोचा
करता था जब किसी इलाके को फतह करने निकलता तो शिकस्त खाकर मायूस लौट आता।
वो सुल्तान अबू सईद का बेटा था जिसने आखिरी दम तक तैमूर
लंग की सल्तनत के इलाकों को इकट्ठा करके रखा था । उमर शेख मिर्जा छोटे कद और
नोकीली दाढ़ी और सुर्ख बाल और बड़े बड़े हाथ पैर का मालिक था इतना तंग पाजामा
पहनता कि पेट दबाकर बंद बांधे जाते और बदन ढीला छोड़ता तो ज्यादातर बंद टूट जाते
अपने खाने और पहनने के बारे में उसे कोई खास फिक्र नहीं थी ढीली पगड़ी उसमें से
दोनों सिरे लटकते रहते थे गर्मीयों में
मुगलई टोपी पहना करता था वो अपने अकीदों का पाबंद था पांच वक्त की नमाज पढ़ा करता
था और कुरआन की तिलावत करता था मिर्जा नर्म मिजाज
लेकिन बहादुर आदमी था मगर उसके मुक्के में जबरदस्त ताकत थी जिसे भी वो मुक्का मारता वो गिरे वगैर नहीं रह
सकता था आगे चलकर वो खाने पीने की महफिलों में भी शामिल होने लगा था लोगों के साथ
नरमी से पेश आता ज्यादातर चौसर और कभी कभी पांसा भी खेला करता था।
फरगाना नाम की वो वादी जिसका हुक्मरां बाबर हुआ वो बहुत से
इलाके उसमें आते थे एक तो नदियों के किनारे के गांव तो उसके आस पास बसे हुए थे
दूसरे पहाड़ी इलाके जहां आबादी नहीं थी लेकिन जानवरों के लिये चरगाहें थी और मवेशी
वहां चरा करते थे जगह जगह नरसल के झुंड और तंग घाटियां थीं दूर दूर तक गांव भी नजर
आते थे पहाड़ी इलाकों में काली भेड़े और बकरियां बहुत ज्यादा थीं इलाके के लोग
अपने मेहमानों का स्वागत ज्यादातर बादामों या मोटे तीतर के गोश्त से करते थे।
वादी फरगाना का मरकजी शहर ‘’ अंदजान’’ था अंदजान के फलदार बागात बड़े मश्हूर थे। बाबर अपने उस्ताद के आगे दो
जानों बैठकर पढ़ा करता था सर्दी में उमर मिर्जा के महल के कमरे में अंगेठियां गर्म
करके , उस्तादों के सामने पढ़ाई का इंतिजाम किया जाता था ।
इतिहासकार लिखते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि बाबर ने पढ़ाई में बहुत मेहनत की और
ग्यारह साल की उम्र में इतना पढ़ लिया कि जो इस उम्र के बच्चों के लिये काफी था
उसके बाद उसे पढ़ाई की तरफ ध्यान देने का मौका ही नहीं मिला इसलिये कि उसका बाप
मर चुका था।
वादी में तीन भाषाएं बोली जाती थीं एक देहात की पुरानी
तुर्की जबान थी दूसरी कूचा बाजार की
फार्सी और तीसरी अरबी और बाबर को इन तीनों जबानों पर महारत हासिल थी ।
बाबर के बाप उमर शेख के लिये बाबर का नाना बड़ा सहारा हुआ
करता था। उसका नाम यूनुस था चंगेज खान के बेटे चुगताई खान की नस्ल से था और
ताशकंद का हुक्मरां था ।
अब यूनुस मर चुका था और बाबर का बाप भी इस दुनिया से कूच कर
गया था। अब बाबर ग्याराह साल की उम्र में चारों तरफ से दुश्मनों से घिरा हुआ था
उसे अकेले ही उन दुश्मनों से निपटते हुए जिंदा रहना था ।
अब नौ उम्र बाबर के लिये उसका सबसे बड़ा सहारा उसका फौजी
सालार था जिन्हें उमर शेख मिर्जा ने जागीर दे रखी थी वर्ना उसके हालात बहुत खराब
थे उसके ला परवाह बाप ने रिश्तेदारों से झगड़े मौल ले रखे थे और अब सब बाबर की तरफ टेड़ी निगाहों से देख रहे
थे ।
उन सबमें सबसे आगे बाबर का चाचा अहमद था जो समरकंद का हुक्मरां था और उमर शेख के मरने के बाद ही उसने फरगाना के कुछ कस्बों पर कब्जा कर लिया था। उसकी बेटी से बाबर का रिश्ता भी तय हो चुका था जब वो बाबर के इलाकों पर कब्जे करने लगा। तब बाबर के बाप उमर शेख के सालारों नें बाबर को मश्वरा दिया कि हमें समरकंद के हुक्मरां और बाबर के चाचा अहमद के खिलाफहरकत में आ जाना चाहिये लेकिन फरगाना का काजी बड़ा नेक और अक्लमंद आदमी था उसने अहमद पर हमला करने की तजवीज को रद्द कर दिया और लोगों का मश्वरा दिया कि उनका बादशाह अभी ग्यारह साल का छोटा बच्चा है उसे जंगों में न डालो बल्कि उसने मश्वरा दिया समरकंद का हुक्मरां बाबर का चाचा है और उसकी बेटी से बाबर का रिश्ता भी तय हो चुका है । इसलिये बाबर अपने कुछ कासिदों को भेजे अपने चाचा से दरख्वास्त करे कि दुश्मनों के खिलाफ वो उसकी मदद करें।

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