हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-10
तुम क्या चाहते हो महफिले शुकन? साथी सवाल करते
मैं तुम्हारी मज्लिसों में एक मेहमान की हैसियत रखता हूं हजरत निजामुद्दीन
औलिया फरमाते मेहमान को एक दिन जाना ही होता है।
हमारे बीच से उठकर कहां जाओगे ? साथी उदास लहजे में पूछते ये मैं भी खुद नहीं
जानता कहां जाऊंगा हजरत निजामुद्दीन औलिया फरमाते
क्या इल्म की दुनिया से उक्ता गये हो ए बाहिसे शुकन ? दोस्त पूछते क्या देहली
से इसलिये चले जाओगे कि अब यहां तुमसे बहस करने वाला कोई नहीं ।
इल्म तो मकसूद हयात है मगर फिर भी मुझे इल्म ही प्यास महसूस होती है हजरत
निजामुद्दीन औलिया फरमाते मगर खुद भी इस बैचेनी की वजह जानने से कासिर थे ये कैसी
प्यास थी और कैसी तलब? हजरत निजामुद्दीन औलिया एक अजीब सी जहनी कशमकश का शिकार
थे।
अक्सर तन्हाई में बाबा फरीद गंज को याद करते थे अगरचे इस मर्द बुजुर्ग को
आंख से नहीं देखा था लेकिन दिल पर शेख की यादें नक्स थीं इस सिलसिले में निजामुद्दीन औलिया फरमाते हैं
उस वक्त मेरी उम्र बारह साल की थी और मैं उस वक्त मौलाना उसूली से तालीम हासिल
कर रहा था एक एक शख्स अबूबक्र क्वाल, उस्ताद ग्रामी के मक्तब में हाजिर हुये और
मौलाना से अर्ज करने लगे हजरत पिछले दिनों मुल्तान जाने का इत्तिफाक हुआ हजरत बहाउद्दीन
जकरिया की बहुत शोहरत सुनी थी शोक दीद उनकी खानका तक ले गई बड़ी शान वाले बुजुर्ग
हैं शेख के रूहानी फैज का ये असर है कि उनकी कनीजें भी चक्की पीसते वक्त जिक्रे
इलाही करती रहती हैं ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया
फरमाते हैं कि अबूबकर क्वाल ने निहायत पुर जोश लहजे में हजरत शेख
बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी के औसाफ बयान किये थे मगर मेरे दिल पर कोई खास असर
नहीं हुआ फिर अबू बकर क्वाल अपने सफर अजोधन का हाल सुनाने लगे।
कुछ दिनों मुल्तान में कयाम करने के बाद अजोधन पहुंचा और
हजरत बाबा फरीदउद्दीन गंज शकर की खिदमत में हाजिर हुआ शेख की रियाजत का ये असर है
कि अजोधन के दर व दीवार तक से नूर बरसता हुआ महसूस होता है और यूं लगता है जैसे
हजरत बाबा फरीद की रूहानियत ने पूरे हिन्दुस्तान को मुसख्खर कर लिया है।
हजरत निजामुद्दीन औलिया फरमाते हैं हजरत बाबा फरीद का जिक्र
सुनते ही मुझे अहसास हुआ कि मेरी पूरी शख्सियत हजरत शेख के जेरे असर है और किसी न
दीद ताकत ने मेरे दिल व दिमाग को भी मुसख्खर कर लिया है।
उस दिन के बाद कयाम देहली तक हजरत निजामुद्दीन औलिया हजरत
बाबा फरीद को मुसलसल याद किया करते थे इस तअस्सुर की एक वजह ये भी थी कि देहली के
जिस महल्ले में आप का कयाम था, वहीं हजरत शेख
नजीबुद्दीन मुतवक्किल भी रहा करते थे ये बुजुर्ग हजरत बाबा फरीदउद्दीन गंज शकर के
मुरीद और छोटे भाई थे हजरत बाबा फरीद के फैजे रूहानी ने शेख नजीबुद्दीन को हकीकतन ‘मुतवक्किल’ बना दिया था।
मश्हूर वाक्या है कि एक दिन शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल दर्स
में पहुंचे तो उस्ताद ने पूछा। नजीबुद्दीन मुतवक्किल तुम हो?
शेख ने जवाब दिया मैं तो नजीबुद्दीन मुतावाकिल(खाने वाला)
हूं- मुतवक्किल होना किसके इख्तियार में है।
उस्ताद ने दूसरा सवाल किया। तुम शेखुलइस्लाम फरीदुद्दीन
के छोटे भाई हो?
शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने अर्ज किया मैं शेख का बिरादर
सौरी हूं, बिरादर माअनवी अल्लह जाने कौन होगा।
हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल की गुफ्तगू का ये मफहूम था कि खानदानी एतबार से आप हजरत बाबा फरीद के भाई थे मगर किरदार इल्म के लिहाज से आप उनके भाई कहलाने के मुस्तहिक नहीं थे। ये
हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल को इनकिसार था वरना आप भी बड़े पाये के बुजुर्ग थे हजरत निजामुद्दीन औलिया चार साल तक उनके पड़ोस में मुकीम रहे इस दौरान अक्सर मुलाकातें होती रहीं और हर मुलाकात में हजरत बाबा फरीद का जिक्र जरूर होता नतीजतन हजरत निजामुद्दीन औलिया गैर महसूस तौर पर हजरत बाबा फरीद के जेरे असर आते चले गये।

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