हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-6
हजरत ख्वाजा अली ने एक नजर हजरत निजामुद्दीन औलिया की तरफ देखा और दुआ के लिये हाथ उठा दिये ‘ ए खुदाए बुजुर्बर जिस तरह तूने मुझ गुमराह को सिराते मुस्तकीम पर गामजन होने की तोफीक बख्शी, उसी तरह इस बच्चे पर भी अपना रहम व करम की बारिश फरमा।
मैं तो बुत परस्तों की औलाद था और कज्जाकी मेरा
पेशा था लेकिन सैयद मोहम्मद (निजामुद्दीन औलिया) तो तेरे हबीब (स.अ.) की नस्ल पाक का नुमाइंदा है, परहेजगारों की औलाद है। इसकी खानदानी अजमत बरकरार रख और सैयद जादे का उलेमा हिंद में
शामिल फरमा और अपनी कुदरत बे पनाह के सदके में इसे जुराअत व सदकात के आला दर्जे पर
पहुंचा दे ।
हजरत ख्वाजा अली के लहजे में इस कदर गुदाज था कि अहले
मज्लिस बे इखितयार रोने लगे। मौलाना अलउद्दीन उसूली की आंखे भी नम हो गईं। खुद
हजरत निजामुद्दीन औलिया भी आब दीदा नजर आ
रहे थे।
फिर हजरत ख्वाजा अली की दुआओं का सिलसिला खत्म हुआ और दस्तार
बंदी की रस्म अदा हो चुकी तो हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने नशिस्त से उठे सबसे पहले आपने हजरत ख्वाजा
अली की दस्त बोसी की वक्त बदायूं में वही विलायत के आला मन्सब पर फायज थे।
हजरत ख्वाजा अली की दस्त बोसी के बाद हजरत निजामुद्दीन
औलिया अपने उस्तादे गिरामी की तरफ बढ़े और मौलाना अलाउद्दीन उसूली की दस्त बोसी
से शर्फयाब हुये मौलाना उसूली ने भी अपने महबूब तरीन शार्गिद को इस तरह दुआऐं दीं
कि जजबात से अहले मज्लिस की आंखे भीग गईं
फिर आम रस्म अदा की गई और इस तरह तमाम उलेमाऐ बदायूं की दुआओं के साये में हजरत
निजामुद्दीन औलिया के इल्म के नये सफर का आगाज हुआ।
इस तकरीब में मौलाना अलाउद्दीन उसूली ने हाजिरीन मज्लिस को
मुखातिब करते हुए फरमाया था अल्लाह ने चाहा तो इस बच्चे का सिर किसी के आगे खम
नहीं होगा।
मौलाना अलाउद्दीन उसूली के बारे में ये रिवायत मश्हूर है कि एक दिन मौलाना, बदायूं की गलियों में फिर रहे थे।
उस वक्त
आपका लड़कपन था अचानक शेख जलालुद्दीन तबरेजी की नजर उन पर पड़ी हजरत शेख ने उन्हें
मुखातिब करके फरमाया लड़के इधर आओ ‘’
मौलाना अलाउद्दीन उसूली आगे बढ़े और हजरत शेख जलालुद्दीन तबरेजी के सामने अदब से सर झुकाकर खड़े हो गये।
‘’ये तुमने क्या लिबास पहन रखा है? हजरत शेख ने फरमाया ।
मौलाना अलाउद्दीन ने अपने कपड़ों की तरफ नजर की और शर्मिदा
नजर आने लगे मैं एक गरीब बाप का बेटा हूं, इस लिये अच्छा लिबास पहन नहीं सकता।
मैं तुम्हारे गुरबत और अफलास की बात नहीं कर हूं।
हजरत शेख जलालुद्दीन तबरेजी ने निहायत शफकत
आमेज लहजे में फरमाया तुम्हारे जिस्म पर ये लिबास मुनासिब नजर नहीं आता।
मौलाना अलउद्दीन उसूली ने हैरतजदा लहजे में अर्ज किया फिर
मैं क्या करूं?
आओं मैं तुम्हें नया लिबास पहनाता हूं ये कहकर हजरत शेख
जलालुद्दीन तबरेजी ने अपना पेरहन मुबारक उतारा और मौलाना अलाउद्दीन उसूली को पहना
दिया।
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