हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-12
सैयद मोहम्मद कल तुमने मुझ से कोई सवाल किया था? हजरत बीबी जुलेखा के होंठो को जंम्बिश हुई।
खादिम ने अर्ज किया था इस गरीब को किस के हवाले कर रही हैं? शिद्दत जज्बात से निजामुद्दीन औलिया की आवाज
लरज रही थीऔर आंखों के गोसे भीग गये थे।
आज मैं तुम्हारे सवाल का जवाब देती हूं हजरत बीबी जुलेखा
ने कहा और चंद लम्हों के लिये खामोश हो गईं फिर फरमाया सैयद मोहम्मद तुम्हारा
दांया हाथ कौनसा है? इस बात से
अंदाजा है बीबी जुलेखा की बीनाई धुंधली हो चुकी थी।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपना दायां हाथ वालिदा मोहर्तमा
की तरफ बढ़ाया हजरत बीबी जुलेखा ने अपने बेटे का हाथ अपने हाथ में लिया और निहायात
पुरसोज लहजे में कहा ए अल्लाह मैं सैयद मोहम्मद को तेरे हवाले करती हूं।
तेरी जात ही इबादत
के लायक है और तू ही अपने बंदों का कफील है ये कहते कहते हजरत निजामुद्दीन औलिया
के हाथ पर हजरत बीबी जुलेखा के हाथ की गिरफ्त कमजोर होने लगी यहां तक कि मां का
हाथ बेटे के हाथ से छूट गया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने घबराकर देखा हजरत बीबी जुलेखा
कल्मा शहादत का विर्द कर रही थीं आपने तीन बार अल्लाह की वाहदानियत और सरवरे
कोनेन सललल्लाहु अलैहि वसल्लम की रिसालत पर गवाही दी और इस तरह दुनिया से
रूखसत हो गई जैसे बादे नसीम का कोई झोंका किसी चमन जार से गुजर गया हो।
एक वली सिफत और शफीक मां की मौत कोई ऐसा हादसा नहीं थीं कि
गर्दिश वक्त उसकी यादों को धुंधला कर देती आपके मुरीद खास अमीर संजरी इस वाक्ये
का जिक्र करते हुए अपनी तालीफ ’फाइदुल फवाइद’ में
तहरीर फरमाते हैं जब भी वालिदा मोहर्तमा का जिक्र आता तो पीरो मुर्शिद की हालत गैर
हो जाती इस कदर गिरया तारी होता कि आप के लिये बात करना भी दुश्वार हो जाता करीब
बैठे हुये लोग भी ये जानने से कासिर रहते हजरत शेख क्या फरमा रहे हैं इस मौके पर
हजरत निजामुद्दीन औलिया हमेशा ये शअर पढ़ते और जारो कतार रोते
मेरे दिल अफसोस के तूने कोई तदबीर नहीं की।
विसाल की रातें गुजर गईं और तूने इन्हें जंजीर नहीं दी।
हजरत निजामुद्दीन औलिया पहले ही एक ना मालूम इज्तिराब में
मुब्तिला थे वालिदा मोहर्तमा के विसाल के
बाद ये इज्तिराब ‘वहश्त‘ में तब्दील हो गया दोस्त और साथी तसल्लीयां देते मगर आपकी उदासी
में कोई कमी न आती ज्यादा तर वक्त शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल की सोहबत में गुजरता
बार बार फरमाते शेख मैं नहीं जानता क्या होने वाला है।
हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल फरमाते सैयद जो कुछ होगा अच्छा
होगा।
हजरत निजामुद्दीन औलिया की माली हालत बहुत खराब थी एक दिन
हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज करने लगे शेख मेरे लिये दुआ फरमां दें मैं किसी शहर का
काजी बन जाऊं।
सैयद काजी बनकर भी तुमको सुकून कल्ब हासिल नहीं होगा हरजरत
शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने फरमाया काजी शहर की जगह कुछ और बन जाओ।
क्या बन जाऊं? हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अर्ज किया।
जो मेरी आंखें देख रही हैं। हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने
फरमाया।
आपकी आंखे क्या देख रही हैं? हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने पुर शौक लहजे में
अर्ज किया ।
यही कि मन्सबे कजा तुम्हारे लायक नहीं है हजरत शेख
नजीबुद्दीन मुतवक्किल ने फरमाया अन करीब अल्लह तुम पर जाहिर कर देगा कि मेरी आंखें क्या
देख रही हैं।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के इज्तिराब में इजाफा हो रहा था फिर एक दिन जामा मस्जित में नमाज अदा कर रहे थे पेश इमाम ने ये आयत तिलावत की।
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