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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-13

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-13




क्‍या ईमान वालों के लिय अभी वक्‍त नहीं आया कि उनके दिल अल्‍लाह के जिक्र से झुक जाएं।

ये आयत मुकद्दस सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया की हालत गैर हो गई और नमाज ही में आप पर गिरया तारी हो गया नमाज खत्‍म हुई तो आप मस्जिद के एक गोशे में बैठकर देर तक सोचते रहे फिर दिल से आवाज आई निजामुद्दीन ये हिदायत गैबी है तुझे सुकून अल्‍लाह के जिक्र से ही मिलेगा, किताबों के ढेर में तेरी निजात नहीं है।

ये ख्‍याल आते ही आप हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल की खिदमत में हाजिर हुये और अर्ज करने लगे शेख मैं अजोधन जा रहा हूं  आपकी आंखे यही देख रही थीं?

हजरत नजीबुद्दीन मुतवक्किल मुस्‍कुराये सैयद अब तुम्‍हें सुकून कल्‍ब हासिल होगा जब तुम हजरत शेख की खिदमत में हाजिर हो तो इस खादिम का भी सलाम अर्ज करना।

शेख मेरे हक में दुआ कीजिये  मेरी हाजिरी कुबूल हो जाये हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अर्ज किया ।

हजरत नजीबुद्दीन  मुतवक्किल ने दुआ फरमाई और बीस साला नौजवान जो देहली में महफिले शुकन के नाम से मश्‍हूर था, अजोधन रवाना हो गया।  

जब हजरत निजामुद्दीन औलिया देहली से रवाना हुये तो आपके पास एक मुसल्‍ले और एक बर्तन पानी के सिवा कुछ नहीं था अल्‍लाह ही जानता है कि ये दुश्‍वार और लंबा सफर कैसे तय किया?

हजरत बाबा फरीद की खिदमत में हाजिर हुये तो इस मज्लिस इरफानी का रंग देखकर आप की जबान गूूंगी हो गई और जिस्‍म पर लरजा तारी हो गया आप अहले इल्‍म की कैसी कैसी मज्लिसों मे शरीक हुये थे मगर एक दरवेश की खाानका का अंदाज की जुदागाना था।

हजरत निजामुद्दीन औलिया को देखते ही बाबा फरीद ने ये सअर पढ़ा:

तेरे फिराक की आग ने दिलों को कबाब कर डाला।

और तेरे शौक सैलाब ने जानों को बर्बाद कर डाला।

हजरत शेख की खिदमत में हाजिर होने से पहले हजरत निजामुद्दीन औलिया ने सोचा कि अपने दीदार को मुख्‍तलिफ जावियों से बयान करूंगा जब हजरत बाबा फरीद के चेहरे मुबारक को देखा तो आप सब कुछ भूल गये:

नजर वो है जो इस कोनो मकान के पार हो जाये।

मगर रोये ताबां पर पड़े तो बेकार हो जाये।

हजरत बाबा फरीद के रूबरू देहली के महफिले शुकन भी यही हाल था। बड़े बड़े उलेमा को अपने जोरे बयान और दलाइल से आजिज कर देने वाला आज खुद इजहार शौक के तरस रहा था।

सारी मन्तिक धरी की धरी रह गई थी और तमाम लुगत अल्‍फाज से खाली नजर आ रही थी बस इतना ही अर्ज कर सके मखदूम मुझे आपसे मुलाकात का बहुत शौक था।

हजरत बाबा फरीदुद्दीन मसऊद गंज शकर ने फरमाया  हर नये आने वाले पर दहशत तारी हो जाती है  मौलाना निजामुद्दीन तुम्‍हारा शौक इससे कहीं ज्‍यादा है जितना कि तुमने बयान करते हो।

हजरत शेख ने जांसोज की ताईद की तो हरजत निजामुद्दीन औलिया ने सर अकीदत खम कर दिया मेरे लिये बस यही इर्शाद गिरामी काफी है।

अकीदत व नियाजमंदी का ये अंदाज देखकर हजरत बाबा फरीद ने फरमाया मेरी ख्‍वाहिश थी कि ये नेअमत सजादा और विलायत हिन्‍द किसी और को दे दूं कि हातिफ गैबी ने सदा दी अभी ठहर जाओ निजामुद्दीन बदायूं आ रहा है।

हजरत शेख की जबान मुबारक से ये अल्‍फाज सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया पर गिरया तारी हो गया बहुत देर तक पीरो मुर्शिद के सामने सर झुकाये रोते रहे सैयदी मैं किस लायक हूं?

हजरत बाबा फरीद के तमाम मुरीद खाके फर्स पर सोते थे मगर हजरत निजामुद्दीन औलिया के लिये चार पाई का इंतेजाम किया गया फिर जब रात आई तो हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने दूूूूूसरे साथियों की तरह जमीन पर लेट गये ईशा के बाद खानका का एक खादिम इधर आया हजरत निजामुद्दीन औलिया को इस हाल में देखा तो कहने लगा निजामुद्दीन तुम चार पाई पर क्‍यों नहीं लेटते?

यहां कैसे कैसे हाफिज कुरआन और बुजुर्ग जमीन पर सो रहे हैं मुझे इस ख्‍याल से शर्म आती है कि मैं इन मोहर्तम हस्तियों की मौजूदगी में चारपाई पर आराम करूं हरजत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया ।

खादिम वापस चला गया और सारा वाक्‍या मौलाना बदरूद्दीन इसहाक के सामने बयान कर दिया जो हजरत बाबा फरीद के खलीफा भी थे और दामाद भी।

खादिम की बात सुनकर मौलाना बदरूद्दीन इसहाक जमात खाने में तश्‍रीफ लाये और हजरत निजामुद्दीन औलिया से कहा तुम यहा अपनी मन्तिक पेश करने आये या हिदायत पाने? मौलाना के लहजे में किसी कदर तल्‍खी झलक रही थी तुम अपनी मनमानी करोगे या हुक्‍म शेख पर अमल पेरां होगे?

मुर्शिद का फरमान ही अब मेरी जिंदगी है हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इन्‍तिहाई अकीदतमंदाना लहजे में फरमाया।




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