हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-54
तुम्हें हजरत शेख ने याद फरमाया
एक खिदमगार ने तेज आवाज से कहा।
हमें मालूम था कि तुम्हारा शेख
हमारी बातों की ताब न ला सकेगा एक गुस्ताख ने चींख कर कहा और अपने साथियों को
पीछे आने का इशारा किया।
फिर वो बेहूदा और मगरूर लोग इस तरह
हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी की खिदमत में पहुंचे कि उनके माथों पर बल
पड़े हुए थे और गर्दनें कज थीं हजरत शेख ने उन गुस्ताखों से नजरें मिलाए बगैर फरमाया
उस वक्त तुम लोगों ने मुझसे क्या सवाल किया था?
अगर तू पहले ही हमारी बात सुन लेता
तो नोबत यहां तक न पहुंचती एक गुस्ताख ने निहायत रूखे अंदाज के साथ कहा जैसे वो
शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी की बे कसी का मजाक उड़ा रहा हो ।
तुम सिर्फ अपना सवाल दोहराओ हजरत शेख ने उसकी बेहूदगी को नजर अंदाज करते
हुए फरमाया हमने पूछा था कि तुझे यहां किसने बैठाया है और तू किसकी इजाजत से मुल्तान
के सादा लोह इंसानों पर हुकूमत कर रहा है? दूसरे बे अदब ने जवाब देते हुए
कहा उसके लहजे में भी गुरूर व तकब्बुर की आमेजश थी।
तुम लोग मेरी तरफ गौर से देखो हजरत
शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी ने उन बेहूदा
लोगों की जमाअत को मुखातिब करते
हुए फरमाया।
वो बे अदब लोग मजाकिया अंदाजा में
हजरत शेख की तरफ देखने लगे एक मर्दे दरवेश से निगाह का मिलाना गजब था उन्हें यूं
महसूस हुआ जैसे उनके जिस्मों में एक बिजली दौड़ गई हो।
हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी
ने इंतिहाई पुर जलाल लहजे में फरमाया मुझे
इस जगह अपने वक्त के कामिल ने बैठाया है जिनका नाम हजरत शेख शहाबुद्दीन उमर सहर
वर्दी है
अभी फिजा में हजरत शेख बहाउद्दीन
जकरिया मुल्तानी के अल्फाज की गूंज बाकी थी कि सरकशों का वो गिरोह आपके कदमों पर
गिर पड़ा फिर उनमें से हर शख्स रो रो कर अपनी गुस्ताखीयों की माफी मांगने लगा।
हजरत निजामुद्दीन औलिया
बुजुर्गों के सब्र तहम्मुल और जलाले
रूहानी के वाक्यात बयान फरमा रहे थे इसलिये आज खानका के दर व दीवार पर गैर मामूली
सुकूत तारी था और सुनाने की ये कैफियत थी कि लोगों को उनकी सांसों की आवाजें सुनाई
दे रही थीं।
फिर जब मज्लिस दर्स खत्म हो गई और
लोग अपने अपने कामों में मसरूफ हो गये तो महेन्द्र देव ने हाथ जोड़ते हुए अर्ज
किया अगर हुजूर इजाजत दें तो मैं अपने मां
बाप के साथ देव गढ़(दक्किन) चला जाऊं।
क्या तुम्हें यहां कोई तकलीफ है ? हजरत महबूब इलाही ने अपने मुरीद से
पूछा
तकलीफ तो कोई नहीं महेन्द्र देव
कुछ सहमा- सहमा सा नजर आ रहा था
दरवेश की बस्ती में तकलीफ तो होगी
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने मुस्कुराते हुए फरमाया यहां वो ऐश व आराम कहां जो तुम्हें
देवगढ़ में थे तुम वहां साहिबे जागीर थे
और यहां फकीरों की कोई मिलकियत नहीं ।
हुजुर आपकी वजह से यहां हर शख्स
मुझसे बहुत मोहब्बत करता है घर के लोगों से भी ज्यादा महेन्द्र देव रूक रूक कर
बोल रहा था
फिर तुम क्यों जाना चाहते हो? हजरत महबूब इलाही ने पूछा
दरअसल बात ये है कि मैं हर लम्हा खतरात में
घिरा हुआ हूं आखिर महेन्द्र देव ने अपने दिल की बात कह दी खुसरू खान मुझे माफ
नहीं करेगा वो मेरी जान भी ले सकता है
अगरचे निजामुद्दीन औलिया ने बारहा उसे मुतमईन करने की
कोशिश की थी लेकिन महेन्द्र देव नया नया मुसलमान हुआ था इसलिये वो खुसरू खान जैसे
कीनापरवर इंसान से हर वक्त खौफजदा रहा था
दूसरे ये कि देहली की सियासी फिजा
भी इतनी लरजा खेज थी कि बहादुर से बहादुर मुसलमान भी अपने आपको गैर महफूज समझ रहा
था।
तुम देहली में रहो या देवगढ़ में
अल्लाह तुम्हे हर जगह अपनी पनाह में रखेगा हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया तुम
जाना चाहते हो तो चले जाओ मेरी दुआएं तुम्हारे साथ हैं
महेन्द्र देव और उसके मां बाप ने
हजरत महबूब इलाही के हाथ का बोसा लिया और फिर तीनों गरीबुल वतन अपने आबाई वतन की
तरफ रवाना हो गये।
अपनी वापसी के सफर का हाल बयान करते हुए महेन्द्र देव लिखता है जब मैं अपने मां बाप के साथ देहली से रवाना हुआ तो हर कदम पर ये महसूस होता था कि जैसे खुसरू खान के आदमी हमारा पीछा कर रहे होंगे मगर ये मेरा वहम साबित हुआ कोई हमारा तआकुब में नहीं था सुल्तान अलाउद्दीन खिलजीने देहली से देवगढ़ तक का रास्ता अच्छा बनवा दिया जगह जगह सराय मौजूद हैं और रास्ते के दोनों तरफ हरे भरे दरख्त खड़े हैं मैंने सफर के दौरान एक बात खास तौर पर महसूस की कि देवगढ़ से देहली की तरफ आने वाले मुसाफिर बे शुमार थे।
वो सबके सब हिन्दू थे और मुझसे खुसरू खान की बादशाहत का हाल पूछते थे मैं उन्हें ये कहकर टाल देता कि मुझे कुछ मालूम नहीं मैं तो देहली के देहात का रहने वाला एक मामूली इंसान हूं और अपने अजीजों से मिलने देवगढ़ जा रहा हूं वो लोग मेरी बे खबरी का मजाक उड़ाते हुए कहते हिन्दू होकर तुझे पता नहीं कि खुसरू खाना हमारा बादशाह है और उसने हिन्दुस्तान पर हिन्दुओं की हुकूमत दोबारा कायम कर दी है वो सब के सब बहुत खुश थे उसके बरअक्स मुझे रास्ते में मुसलमान बराए नाम ही मिले इगर इत्तिफाक से कोई मुसलमान नजर भी आता तो बहुत खामोश और फिक्रमंद दिखाई देता था शायद उसकी एक वजह ये भी थी कि मैं अपने लिबास और शक्ल व सूरत से हिन्दू मालूम होता था, इसलिये मुसलमान मुझसे बात करते हुए डरते थे कि मैं खुसरू खान का आदमी हूं और मैं भी ये सोचकर खौफजदा रहता था कि कहीं वो खुसरू खान के तरफदार न हों गर्ज इसी अजिय्यतनाक कशमाकश और खौफ व हरास के आलम में मैं अपने आबाई वतन की ये हालत देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गये देहली के इंकिलाब की खबरे यहां तक पहुंच चुकी थी बाज मुसलमान कहते थे कि खुसरू खान मुसलमान हो गया और उसकी हुकूमत भी इस्लामी हुकूमत है अब मैं किसे बताता कि खुसरू खान कौन है और वो मजहब इस्लाम के साथ कैसा बहिमाना सुलूक कर रहा है?
बहुत सेे मुसलमानों का ख्याल था कि खुसरू खान ने मुनाफिकाना इस्लाम कुबूल किया है, इसलिये उसकी हुकूमत ज्यादा देर कायम नहीं रह सकेगी उसके बरअक्स हिन्दुओं ने मेरा जीना मुहाल कर दिया था वो हर वक्त और हर महफिल में मुझसे देहली के मुतअल्लिक इतने सवालात करते थे कि मैं परेशान हो जाता था मुझे जितने भी हिन्दू मिले उनमें से हर एक का इस बात पर यकीन था कि आम हिन्दुस्तान के हिन्दू खुसरू खान की मदद करेंगे और इस तरह उसे कोई मुसलमान शिकस्त नहीं दे सकता।
मैं कुछ दिन तक अपने मां बाप के साथ देवगढ़ में रहा हमारी सारी जागीर जब्त करके शाही मक्जूबात में शामिल कर ली गई थी उसके वहां जितने भी दिन गुजरे रंज व परेशानी में गुजरे शायद हजरत निजामुद्दीनऔलिया इसी लिये चाहते थे कि महेन्द्र देव देहली में रहे और देवगढ़ जाकर अपनी जागीर की तबाही का तकलीफ दह वो मंजर न देख सके मगर उसके एसाब पर खुसरू खान का खौफ इस कदर मुसल्लत था कि वो अपने आबाई वतन और अपने आशियाने की राख देखने पर मजबूर हो गया ।

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