हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-62
अपना फैसला वापस नहीं लेता था चाहे दुनिया इधर उधर हो
जाए।
थोड़ी देर खामोश रहने के बाद सुल्तान ने मुझे मुखातिब करते हुए कहा तुझे
देहली में रहने की पूरी आजादी है मगर तू अभी देवगढ़ नहीं जा सकता’’।
सरकार मेरे मां- बाप मेरी जुदाई
में बहुत परेशान होंगे’’।
सुल्तान ने दरख्वास्त का बराहे रास्त जवाब
देने की बजाए कोतवाल अलाउल मलिक से मुखातिब होकर कहा महेन्द्र देव के मां-बाप को
दक्किन से देहली बुला लो’’।
कुछ देर बाद फरमा रवाए हिन्दुस्तान
के खिदमगार एक कीमती खलअत लाए और मुझे वो लिबास सुल्तान के सामने पहनाया गया फिर खादिमों ने एक हजार अशर्फियों की थैली मुझे पेश की।
ये तुम्हारा इनआम है सुल्तान के
बारे मश्हूर था कि वो सिर्फ अपने मसाहिबीन खास के हल्के में बे तकल्लुफी का
इजहार करता है मगर मैंने देखा कि उसके होंटों पर हल्की सी मुस्कुराहट थी। फिर वो
अलाउल मलिक से मुखातिब हुआ वजीर खतीरूद्दीन से कह दो महेन्द्र देव को कोई मुनासिब मुलाजिमत दी जाए
ताकि वो आसूदा जिन्दगी बसर कर सके’’।
और जब मैं उल्टे कदमों बारगाहे
सुल्तानी से बाहर निकल रहा था तो मैंने देखा कि मलिक काफूर मुस्कुरा रहा है फिर
उसने झुक कर बादशाह कान में कुछ कहा जिसके जवाब में बादशाह भी मुस्कुरा दिया ।
मैं कोतलवाल अलाउल मलिक के साथ
बाहर आया तो उसने मुझसे कहा। तुम यहीं ठहरो, मुझे सुल्तान से अपने नायब के
बारे में बात करना है। हजरत शेख की शान
में उसकी गुस्ताखियां मुसलसल बढ़ती जा रही हैं। ये कहकर अलाउ लमलिक वापस चला गया।
फिर कुछ देर बाद वो वापस आया तो
उसके चेहरे पर सख्त गुस्से के आसार थे। उसने इंतिहाई तंदो तेज लहजे में अपने आदमियों
को मुखातिब करते हुए कहा। मेरे नायब को भी
उन्हीं हिन्दू जासूसों के साथ बंद कर दिया जाय। सुल्तान का हुक्म है कि वो भी उन जासूसों के
साथ कत्ल किया जायेगा।
उसके बाद अलाउलमलिक मुझे लेकर हजरत
शेख निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर हुआ।
उस वक्त सुल्तानुल मशाइख आराम फरमा रहे थे। अलाउल मलिक ने ख्वाजा इकबाल के जरीये इत्तिला
करवाई । फौरन ही दोनों को खलवत में तलब कर लिया गया फिर जैसे हम दोनों दस्त बस्ता
होकर बैठे ,
हजरत महबूब इलाही ने देहली के कोतवाल को मुखातिब करते हुए फरमाया। अलाउलमलिक तुम इसी वक्त सुल्तान के पास जाओ और
उससे कहो अल्लाह तेरी हिफाजत करेगा और हर शरीर की शरारत से बचाया जायेगा। हिन्दू जासूसों को माफ कर दे और तुम्हारे नायब को भी अगर कुदरत ने
चाहा तो उनसे इंतिकाम ले लेगी। उन लोगों
के लिये यही सजा काफी है कि उन्हें जिला वतन कर दिया जाये।
हजरत शेख का इरशाद सुनकर मुझे और
अलाउल मलिक को शदीद हैरत हुई। ये बातें
सुल्तान अलाउद्दीन और कोतवाल के बीच हुई थीं फिर हजरत शेख को इस राजदाराना
गुफ्तगू की खबर किस तरह हो गई? मैं महबूब इलाही की कुव्वत कश्फ के कई मुजाहिरे
अपनी आंखों से देख चुका था इसलिये मेरी हैरत चंद लम्हों मे दूर हो गई मगर अलाउल
मलिक के चेहरे पर परेशानी के आसार साफ नजर
आ रहे थे।
सैयदी वो आपकी शान में बहुत गुस्ताखियां
करता है । अलाउल मलिक के लहजे से शदीद अजिय्यत का इजहार हो रहा था। ऐसे बे अदब की सजा सिर्फ मौत है। सुल्तान ने उसके बारे में सही फैसला किया है। ‘’
सुल्तान कौन होता है उसकी किस्मत
का फैसला करने वाला....? अलाउल मलिक की बात सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के
चेहरे मुबारक पर न गवारी का रंग अभर आया।
ये मेरा और उसका मामला है। आखिर उसने ऐसा कौनसा जुर्म किया है कि उसे मौत की सजा
दी जाये। वो मुझे सौ बार बुरा कहेगा मैं उसे हजार बार माफ करूंगा।
अलाउल मलिक ने सर झुका दिया फिर वो
उठा और अर्ज करने लगा। मैं अभी महल पहुंचकर हुजुर का हुक्म सुल्तान के सामने बयान
किये देता हूं और जो कुछ जवाब होगा, शाम तक खिदमत आलिया में पेश कर दूंगा।
हम जवाब नहीं चाहते। हजरत महबूब इलाही ने फरमाया हमने जो कुछ कहा है, इंशाअल्लाह ऐसा ही होगा। जाओ और
उस पर अमल करो।‘’
उसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने मुझे मुखातिब करके फरमाया। हमने तुम्हें देवगढ़ जाने की इजाजत दे दी थी मगर
सुल्तान चाहता है तुम देहली में मुकीम रहो। ये तुम्हारे लिये भी बेहतर है और
सुल्तान के लिये भी अभी तुम सैयद मोहम्मद के मेहमान रहो।‘’
मैंने हाथ जोड़कर अर्ज किया। मुझे
सुल्तान ने ये कीमती खलअत बख्शी है और उसके साथ ये अशर्फियां भी इनायत की हैं। मैंने सोने के सिक्के से भरी हुई थैली हुजूर के
कदमों में डाल दी । उस अतिया सुल्तानी के बारे में आपका क्या हुक्म है?
ये तुम्हारा हक है और तुम्हारे
पास ही रहना चाहिये। हजरत महबूब इलाही ने फरमाया
। तुम ये अशर्फियां अपने मां- बाप को भेज दो ताकि वो देव गढ़ से देहली आ जाएं।
उसके बाद मैं,अलाउल मलिक खानकाह से बाहर आये कोतलवाल शहर दरबार सुल्तान
की तरफ चला गया और मैं हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद की खिदमत में हाजिर हुआ मैंने देखा कि वहां अजीब सौ गवारी की फिजा
तारी थी, हर शख्स उदास बैठा था। मुझे देखती ही ख्वाजा
सैयद मोहम्मद इस तरह आगे बढ़े जैसे उसका
कोई करीबी अजीज फांसी के तख्ते से नीचे उतर आया हो। ख्वाजा सैयद मोहम्मद
के चेहरे से ना काबिल बयान खुशी झलकर रही थी। बड़े वाल्हाना अंदाज में मुझसे गले मिले और सही
सलामत वापस आने पर मुबारकबाद दी। फिर हजरत
ख्वाजा सैयद मूसा ने मुझे अपने सीने से लगाया। उन मर्दाने पाक बाज के जिस्मों से
खुलूस और वफा की एसी खुश्बू आ रही थी कि मेरी रूह तक को मुअत्तर हो गई। वहां मौजूद बाकी अफराद भी इसी अंदाज से मिले
मैंने ख्वाजा सैयद मोहम्मद, ख्वाजा सैयद मूसा और मौलाना अहमद नीशापुरी की मोहब्बतों
का शुक्रिया अदा करते हुए कहा। उस मुश्किल घड़ी में जिस तरह आप परेशान व मुजतरिब
थे। यही हालत मेरे मां- बाप की भी हुई
हालांकि आप लोगों से मेरा खूनी रिश्ता नहीं था’’ ।
हमारे और तुम्हारे बीच भी एक ऐसा
रिश्ता है जिसे दुनिया वाले तोड़ नहीं सकते । हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने
फरमाया।
ये बड़ी संगीन साअत थी’’ मैंने अर्ज किया। जिस तरह आप हजरात ने मेरी खातिर अपनी जानें खतरे
में डाल दी थी,
इस तरह तो शायद मां, बाप मेरा साथ नहीं देते। ये कहते कहते मेरी आंखों में आंसू
आ गये। ‘’ मौत को सामने देखकर बड़े बड़े साथ
छोड़ जाते है’’
रिफाकत व मोहब्बत का जज्बा भी
अल्लाह की तरफ से अता होता है। हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने फरमाया। तोफीक
इलाही के बगैर कोई किसी की मदद नहीं कर सकता।
मैंने हजरत ख्वाजा सैयद मूसा की
तरफ देखा जो मेरी वापसी पर निहायत ही खुश नजर आ रहे थे । सैयद आपने नायब कोतवाल की
तलवार छीन ली। खुदा न करे वो आप पर वार कर
देता तो क्या होता? मैं तो इस ख्याल से ही लरज उठता हूं। अगर वो जालिम शख्स
अपने इरादे में काम्याब होते?
मेरे सवाल के जवाब में हजरत सैयद
मूसा मुस्कुराने लगे। अगर नायब कोतवाल का
बार मुझ पर चल जाता तो मैं शहीद-ए- करबला के पास होता और कहां होता’’
मैंने एक बार फिर अपने करम फरमाओं
की बे मिसाल मोहब्बत का शुक्रिया अदा किया।
हजरत ख्वाजा मोहम्मद और मौलाना
अहमद नीशापुरी ने एक जबान फरमाया। तुम हमारे भाई हो इस लिये शुक्रिये की कोई जरूरत
नहीं। मेजबान पर मेहमान की तवाजोअ लाजिम होती है सो हमने हस्बे मकदूर ये रस्म
अदा की। बेशब तुम पर एक बड़ी आफत नाजिल हुई थी मगर हजरत शेख की दुआओं के सदके में
वो बला टल गई। अब तुम तकलीफ देने वाली बातों को अपने दिमाग से निकाल दो और खाना खाओ कि तुम्हारे इंतिजार में सब लोग
भूके बैठे हैं।
आप हजरात ने अभी तक खाना नहीं खाया? मैंने हैरतजदा लहजे में अपने
मेजबानों से पूछा।
‘’ तुम्हारी जान पर बनी थी और हम
लोग खाना खा लेते, ये कैसे मुमकिन था? हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने
फरमाया।
खुलूस व मोहब्बत के मुजाहिरे ने
मुझे बहुत देर तक रूलाया। फिर जब हम लोग
खाने से फारिग हो गये तो हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने मुझे मुखातिब करके
फरमाया महेन्द्र देव तुम अपने वतन वापस नहीं जाओगे।
हजरत शेख का भी यही हुक्म है। मैंने अर्ज किया मैं हुजूर के हुक्म पर अमल करूंगा
में यहां रहूंगा मगर इन हालात ने मेरा दिल
उचाट कर दिया है। अब वो पहली जैसी उमंग
बाकी नहीं रही है।
महेन्द्र देव तुम खौफजदा हो गये
हो? हजरत ख्वाजा सैयद मोहम्मद ने
मुझे तसल्ली देते हुए फरमाया इंशाअल्लाह तुम्हारी ये हालत जल्द ही खत्म हो जायगी और देहली में खुश और खुर्रम रहोगे।
एक साल बाद मेरे बाद मेरे वालिद
देव गढ़ से देहली आकर न सिर्फ मुसलमान हो गये बल्कि हुजूर ने उन्हें भी बेयत का
शर्फ बख्श दिया। हजरत शेख ने मुझे खानकाह के करीब एक मकान अता कर दिया था जिसमें
मेरे मां- बाप रहा करते थे। सुल्तान अलाउद्दीन ने मुझे मुलाजिमत देने का जो ख्याल
जाहिर किया था,
वो सियासी हंगामों की नजर हो गया फिर कुछ दिन बाद मैंने सुना कि मलिक काफूर ने
मेरे वतन पर हमला कर दिया फिर खबर आई कि मेरे राजा राम देव का इंतिकाल हो गया। फिर उसके बेटे संगल देव और मलिक काफूर के बीच एक
खूंरेज लड़ाई हुई। संगल देव को शिकस्त हो गई और मलिक कफूर का पूरे इलाके पर कब्जा
हो गया।
ये है शाही खानदान के एक हिन्दू
की आपबीती जिसे हजरत निजामुद्दीन औलिया से बेहद मोहब्बत थी।
सुल्तान अलाउद्दीन की मौत और
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के कत्ल के बाद हिन्दू जादा बरसरे इक्तिदार आ गया था और
इसी के खौफ से महेन्द्र देव अपने मां, बाप को लेकर दोबारा देव गढ़ चला गया था।
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-58
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-59
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-60
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-61

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