हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-65
वो शख्स औकाफ
के नुमाइंदों की बात सुनकर मुस्कुराया और बोला आप हजरात ने मेरे पास आने में बहुत
देर कर दी उस शख्स का लहजा बे नियाज था जब मैं मुतवल्ली होने का अरजूमंद था , उस वक्त किसी ने मेरी तरफ तवज्जो नहीं की
और जब में इस ओहदे से बेजार हूं तो आप लोग मेरे पास चले आए हैं ये मन्सब किसी
जरूरतमंद को दे दो। मुझे अल्लाह ने अपनी
मोहब्बत बख्श दी है और ये मेरे लिये काफी है। ये कहकर उस शख्स ने मुंह फेर लिया
और जिक्र इलाही में मश्गूल हो गया। फिर वो आपनी आखिरी सांस तक इसी रविश पर कायम
रहा।
ये वाक्या
बयान करने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया लोग इताअते खुदावंदी की लज्जत
से वाकिफ नहीं। अगर कोई एक बार इस मजे को
चख ले तो माल दौलत के अंबार और ताज तख्त
को ठुकरा दे।
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह और खुसरू खान जैसे हुक्मरानों
का जमाना गुजर चुका था और अब जमाना इक्तिदार गाजी मलिक के हाथों में था। गाजी मलिक
ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक का लकब इख्तियार किया और तख्ते हिन्दुस्तान पर
जलवा अफरोज हुआ।
मश्हूर
मुअर्रिख कासिम फरिश्ता की रिवायत के मुताबिक सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक एक
खुदातरस और परहेजगार हुक्मरां था संजीदगी , इंकिसारी और बुर्दबारी इसके किरदार के नुमाया औसाफ थे। वो
जहीन भी था और मुदब्बिर भी। मजहबी कवानीन की पाबंदी को वो अपना फर्ज समझता था सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक के बारे में मश्हूर है कि वो पांचों वक्त की नमाज ब जमाअत अदा
करता था और उमूरे सल्तनत में बड़ी महारत रखता था। दीवाने आम में बैठकर रियाया के हालात सुनता और
उनके मसाइल हल करने की कोशिश करता अक्सर
मुअर्रीखीन की राय में सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक दूसरे बादशाहों की तरह
मसनद नशीनी का काइल नहीं था वो बरसरे मज्लिस कहा करता था ‘’
मैं शंहशाह नहीं, रियाया का एक अदना खादिम हूं’’
मुख्तसर ये
कि अगर गयासुद्दीन तुगलक जैसा मर्दे जांबाज सियासी उफुक पर नमूदार न होता तो अल्लाह
ही जानता है कि खुसरू खान जैसा मुनाफिक बिसाते इक्तिदार पर क्या गुल खिलाता?और सर जमीने हिन्द पर मुसलमानों
का क्या हशर होता?
तमाम हंगामों पर काबू पाने के बाद सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक शाही खजानों की
तरफ मुतवज्जे हुआ खुसरू खान ने अपने पांच
मांह के इकतिदार में बे दरेग दौलत लुटाई थी और बड़ी बड़ी जागीरें हिन्दूओं के नाम
कर दी थीं तुगलक ने वो सारी जागीरें और दौलत नमक हराम उमरा से छीन लीं फरमा रवाए
हिन्द उस काम से फारिग हुआ तो सुल्तानी कारिन्दों ने एक और फहरिश्त पेश की
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बड़ी हैरत से उस फेहरिस्त को देखते हुए कहा गालिबन ये देहली के दरवेशों के नाम है।
,खुसरू
खान ने उन हजरात को भी बहुत बड़ी रकम दी थी आप इस फेहरिस्त को देख लिजिये । सुल्तानी कारिन्दों ने अर्ज किया ये
दस्तावेज खुसरू खान ने खुद तैयार की थी हर दरवेश के नाम के आगे दी जाने वाली रकम
भी दर्ज है।
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक बहुत देर तक दस्तावेज को देखता रहा फिर बे
इख्तियार उसके मुंह से निकला खुसरू खान ने
किस बे दर्दी से शाही खजाने को लुटाया है। बे शक ये दरवेश हजरात हमारी तवज्जो और
इमदाद के मुसतहिक है मगर इस कदर भी नहीं कि एक दरवेश को पांच पांच लाख तिनके दिये
जाए तुम इसी वक्त फरमाने शाही जारी करो कि ये तमाम हजरात दरबार सुल्तानी में
हाजिर होकर इस रकम का हिसाब पेश करें’’। हुक्मे सुल्तानी के मुताबिक देहली के तीन बुजुर्ग
हजरत सैयद अलाउद्दीन चिनोरी, हजरत बाबा फरीद के खलीफा वहीदुद्दीन और हजरत
रूकनुद्दीन अबुलफतह मुल्तानी के खलीफा शेख उसमान सैयाह गयासुद्दीन तुगलक के दरबार
पहुंचे और खुसरू खान की दी हुई रकम वापस कर दी। उन तीनों बुजुर्गो के नाम के आगे
पांच पांच लाख तुनके दर्ज थे ।
फिर ये तीनों बुजुर्ग दरबारे सुल्तानी से वापस तश्रीफ ले गये तो गयासुद्दीन
तुगलक ने अपने कारिन्दों से पूछा शेख निजामुद्दीन औलिया नहीं आए?
‘’
हजरत शेख एक मर्दे आजाद हैं और दरबारे शाही में आना पसंद नहीं करते सुल्तानी
कारिन्दों के लहजे से हजरत महबूबे इलाही के लिये खास अकीदत का इजहार हो रहा था। ‘’ मगर उन्हें शाही रकम का हिसाब तो
देना है’’
मुख्तसर से वक्फा सुकुत के बाद सुल्तान गयासुद्दीन ने किसी कदर तल्ख लहजे में
कहा, खुसरू खान ने शेख निजामुद्दीन
औलिया के नाम के आगे भी पांच लाख तिनकों का अंदराज किया है।
‘’
सुल्तान मुअज्जम जो हुक्म फरमाए। सुल्तानी कारिन्दे ने नजर उठाकर अपने फरमा
रवा की तरफ देखा।
‘’ तुम इसी वक्त जाओ और शेख निजामुद्दीन औलिया से पांच लाख तुनके लेकर शाही
खजाने में जमा करा दो’’
सुल्तानी कारिन्दें इसी वक्त दरबारे सुल्तानी से निकल कर हजरत निजामुद्दीन
औलिया की खिदमत में हाजिर हुआ। सलाम और नियाज के बाद उसने पूरा वाक्या हजरत शेख
के गौशे गुजार कर दिया।
‘’
मैं किस चीज का हिसाब पेश करूं? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने पुर जलाल लहजे में फरमाया
वो सारी रकम बैयतुल माल का हिस्सा थी जो हकदारों को पहुंच गई।
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