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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-14

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-14






तो फिर उठो हजरत शेख के हुक्‍म के मुताबिक चारपाई पर आराम करो मौलाना बदरूद्दीन इसहाक ने फरमाया ।

हजरत निजामुद्दीन औलिया पलंग पर दराज हो गये अगरचे आपके दिल में अब भी वही जज्‍बात उमड रहे थे कि मैं बरगुजीदा हस्तियों की मौजूदगी में आराम देेेेने वाले बिस्‍तर पर किस तरह लेट सकता हूं लेकिन हुक्‍म-ए- शेख ने आपको ऐसा करने पर मजबूर कर दिया था  रातभर इसी जहनी कशमश ने सोने नहीं दिया फिर फजर की आजान हुई तो आप पर राज फाश हुआ कि तरीकत में हजरत शेख ही सब कुछ हैं यहां अक्‍ल और मन्तिक का गुजर नहीं इस ख्‍याल के आते ही हजरत निजामुद्दीन औलिया को सुकून कल्‍ब हासिल हुआ।

हजरत बाबा फरीद के हल्‍काए इरादत में शामिल होने के बाद हजरत निजामुद्दीन ने अर्ज किया शेख का हुक्‍म हो तो अपनी तालीम जारी रखूं या फिर और नवाफिल में मश्‍गूल हो जाऊं?

हजरत बाबा फरीद ने कहा मैं किसी को तलीम छोड़ने को नहीं कहता वो भी जारी रखो और ये भी करते रहो फिर देखो दोनों में से कौन सी चीज गालिब आती है? दरवेश को इतना इल्‍म जरूर होना चाहिए कि वो शरीअत से बा खबर रहे वर्ना उसके भटक जाने का अंदेशा होता है।

पीरो मुर्शिद की ये इनायत-ए- खास थी हजरत निजामुद्दीन औलिया को खुद  कुछ चीजें पढ़ाया करते थे  हजरत शेख शहाबुद्दीन सहरवरर्दी की शहरा आफाक  तस्‍नीफ अवारिफुल माआरिफ का दर्श शुरू किया और इस के छ: बाब पढ़ाये अबूस्‍शकूर सालिमी भी अव्‍वल से आखिर तक पढ़ाई और इसके अलावा कुरआने हकीम के छ: पारे मुकम्‍मल तजवीद के साथ पढ़ाए जमाना गुजर जाने के बाद हजरत निजामुद्दन औलिया इस दर्स की लज्‍जत को याद फरमाते थे।


 (अवारिफुल मआरिफ) के दर्स और निकात हजरत शेख की जबान मुबारक से सुने, वो किसी से सुनने में नहीं आयेंगे पीरो मुर्शिद के बयान का ये आलम था कि जब तकरीर फरमाते तो ये आरजू होती कि काश इसी हालत में मौत आ जाय हजरत बाबा फरीद के पास (अवारिफुल मआरिफ) का जो नुस्‍खा था उसमें कुछ सिकम भी था और इसका खत भी बारीक था एक दिन पीरो मुर्शिद दर्स दे रहे थे।


 कि अचानक कुछ देर के लिये खामोश हो गये ये वही मकाम था जहां किताब में कुछ गल्ती हो गई थी हजतर बाबा फरीद ने बे ताम्‍मूल फरमाया हजरत निजामुद्दीन  औलिया अपनी सादगी और नो उम्री के सबब खामोश न रह सके, बे इखितयार आप की जबान से निकल गया मैं ने शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल के पास एक और नुस्‍खा देखा था, जो सही था।

हजरत बाबा फरीद ने जबावन फरमाया कि क्‍या फकीर में इतनी ताकत नहीं है कि वो गलत नुसखे की तस्‍हीह कर सके। पीरो मुर्शिद की ये बात सुनकर हाजिरीन मज्लिस  पर गहरा सुकूत छा गया ।

हजरत बाबा फरीद ने दोबारा फरमाया क्‍या फकीर में इतनी तकात नहीं है कि वो गलत नुसखे को सही कर सके।

पीरो मुर्शिद ने यही जुमला अपनी जुबान मुबारक से तीन बार अदा किया हजरत निजामुद्दीन औलिया फरमाते हैं कि शुरू  में तो मुझे ख्‍याल नहीं आया मगर जब बार बार हजरत शेख की जुबान मुबारक से ये अल्‍फाज अदा  हुये तो मेरे दूसरे साथी मौलाना बदरूद्दीन इसहाक ने मुझसे सरगौशी में कहा मौलाना निजामुद्दीन पीरो मुर्शिद का इशारा तुम्‍हारी तरफ है ।

ये सुनते ही हजरत निजामुद्दीन औलिया की हालत खराब हो गई बे इख्तियार अपनी नशिसत से उठे सर से पगड़ी हटाई  और हजरत शेख के सामने  सर झुका दिया।

मआजअल्‍लाह मेरा ये मकसद नहीं था हजरत निजामुद्दीन औलिया पीरो मुर्शिद के हाथ पकड़ कर रो रहे थे सैयदी मैं तो हजरत की जात गिरामी पर एतराज करने के बारे में सोच भी नहीं सकता।

हजरत निजामुद्दीन औलिया बहुत देर तक गिरया व जारी करते रहे मगर हजरत बाबा फरीद के चेहरे मुबारक पर अक्‍स मलाल नुमायां रहा यहां तक कि आप दर्सगाह से उठकर अपने हुजरे खास में तश्‍रीफ ले गये।

हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने हम सबक साथियों की तरफ देखा और निहायत रिक्‍कत आमेज लहजे में फरमाया अब मैं क्‍या करूं? मुर्शिद खफा हो गये । दुनिया भी गई आखिरत भी गई।

तमाम साथी खामोश रहे किसी में इजहारे राय की जुर्रत नहीं थी कोई कैसे मुदाखिलत करता? उसे भी रान्‍दा दरगाह होने का अंदेशा था।

हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने हुजरे में चले गये मगर एक लम्‍हे के लिये भी करार हासिल नहीं किया था। सारी रात जागते और रोते गुजार दी दूसरे दिन दर्स में हाजिर हुये मगर हजरत बाबा फरीद ने कोई तवज्‍जो नहीं दी घबराहट में अपनी नशिस्‍त से उठे और पीरो मुर्शिद के सामने रो रो कर अर्ज करने लगे । 

वल्‍लाह इसमें मेरे इरादे को कोई दखल नहीं था ये जुबान की लगजिश थी, दिल और दिमाग की नहीं।

हजरत बाबा फरीद ने कोई जवाब नहीं दिया आपके चेहरे पर अक्‍स मलाल अब भी नुमायां था।

हजरत निजामुद्दीन औलिया उठे और उल्‍टे कदमों चलते हुए दरसगाह से निकल कर जंगल की तरफ चले गये दीवाना वार रोते थे और। बार बार अपने आपको मुखातिब करके कहते थे।




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