हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग- 18
हजरत निजामुद्दीन औलिया को भी जबरन अंदाज में घर से बे दखल किया गया था। बेशक महबूब इलाही ने रावत अर्ज के बेटों को बद दुआ नहीं दी थी मगर आपका दिल दुखा था। यही खलश बिजली बनकर टूटी। आप उठे तो इस जगह से बरकत उठ गई और रावत अर्ज का मकान राख का ढेर हो गया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के साथ बदसलूकी का ये वाक्या सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद के जमाने में पेश आया था सुल्तान नासिररूद्दीन महमूद एक दरवेश हुक्मरां था और कुरआन करीम की किताबत करके अपनी रोजी हासिल करता था फरमा रवाए हिंद हजरत निजामुद्दीन औलिया के पीरो मुर्शिद बाबा फरीद से बे पनाह अकीदत रखता था।
एक बार हजरत शेख की खिदमत में हाजिर होना चाहा मगर वजीर-ए- सल्तनत गयासुद्दीन बलबन ने रास्ते की दुश्वारीयों का जिक्र करके सफर से रोक दिया और खुद एक लश्कर कसीर लेकर अजोधन हाजिर हुआ अगर सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन को मालूम हो जाता कि हजरत बाबा फरीद के चहेते मुरीद के साथ रावत अर्ज के बेटों ने ये सूलूक किया है तो उन्हें हुकूमत हिंद की तरफ से सख्त सजा दी जाती और हजरत महबूब इलाही के लिये के बेहतरीन रिहाइश गाह का इंतेजाम किया जाता मगर अल्लाह को यह मंजूर नहीं था।
हजरत निजामुद्दीन औलिया किसी शहंशाह या वजीर के अहसान मंद होते वो जिस शहंंशाह के दरबार से फक्र व किनाअत का ताज पहनकर देहली तश्रीफ लाये थे , उसका तकाजा यही था कि साहिबान वसाइल व असबाब से बे नियाज होकर हर हाल में अपने खालिक का शुक्र अदा करें।
सअद कागजी हजरत शेख सदरूद्दीन के मुरीदों में से था दूसरे रोज इस वाक्ये का पता चला तो गिरया व जारी करते हुये हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत हें हाजिर हुआ।
शेख मेरे होते हुए आप इस आप इस तरह बे आरामी की जिंदगी बसर करें
अब मैं किसी बंदा-ए- खुदा को परेशान करना नहीं चाहता हजरत महबूब इलाही ने दरपर्दा रावत अर्ज के बेटों के सूलूक की तरफ इशारा करते हुए फरमाया अभी तो मैं अपने अल्लाह के घर मेहमान हूं अगर उसके बंदों को मेरा ये कयाम भी पसंद न आया तो में सेहरा की तरफ निकल जाऊंगा ।
सअद कागजी बहुत देर तक खुशामद करता रहा आखिर उसकी खुशनूदी के लिये हजरत महबूब इलाही छप्पर वाली मस्जिद से निकल कर सअद कागजी के घर मुंतकिल हो गये और सैयद महमूद किरमानी के अहले खाना के लिये किसी दूसरी जगह का इंतिजाम कर दिया गया हजरत निजामुद्दीन औलिया एक माह तक यहां मुकीम रहे फिर जब दूसरी जगह तश्रीफ ले जाने लगे तो सअद कागजी ने दस्त बस्ता अर्ज किया शेख ये किस गलती की सजा है गुलाम को खिदमत से महरूम किया जा रहा है?
सअद तूने तो मेजबानी का हक अदा कर दिया मगर मैं अपने दिल का क्या करूं , किसी जगह ठहरने ही नहीं देता हजरत महबूब इलाही ने फरमाया जहां जा रहा हूं, वहां भी चंद दिनों से ज्याद नहीं ठहरूंगा ।
इसके बाद आप रकाब दार की सराय के एक घर में तश्रीफ ले गये ये सराये पुल केसर के करीब में थी सैयद किरमानी भी अपने खानदान वालों के साथ इसी सराय के एक हुजरेमें मुकीम हुए इस सराय में भी आप का कयाम बहुत कम रहा। यहां से उठ कर आप शादी गुलाबी के यहां तश्रीफ ले गये ।
कुछ दिन के बाद शमशुद्दीन शराबदार के अजीज व अकारिब आपकी खिदमत में हाजिर हुए ये लोग निजामुद्दीन औलिया से बहुत अकीदत रखते थे उनके बेहद इसरार करने के बाद आप शमशुद्दीन शराबदार के घर तशरीफ ले गये (शराबदार एक ओहदा है जिसके सुपुर्द बादशाह को पानी पिलाने का काम था) हजरत महबूब इलाही इस मकान मे कई साल तक मुकीम रहे अजोधन से आने वाले अकीदतमंद आप से इसी मकान में मुलाकात करते थे।
गुरबत व अफलास का ये आलम था कि कई कई वक्त रोटी मैस्सर न आती इस सिलसिले में खुद हजरत महबूब इलाही फरमाते हैं सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के दौरे सल्तन में जरूरत की चीजों की अरजानी का ये आलम था कि दो सिक्कों में एक मन खरबूजा मिलता था मगर पूरी फसल गुजर गई और मैं खरबूजा चख भी न सका यही हाल आटे का था मैं एक रोटी खरीदने की सलाहियत नहीं रखता था।
इसी जमाने का वाक्या है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया शहरे पनाह के उस बुर्ज में मुकीम थे जो मन्दरा दरवाजे के करीब मुकीम था यहां आप जिक्र इलाही भी किया करते थे और तलाबा को तालीम भी देते थे हस्ब रिवायत कई रोज गुजर गये और आपके खाने के लिये कोई चीज मेस्सर न आई फिर भी इस्तिकामत का वही आलम था पूरी तवज्जो और खुश दिली के साथ तालिब इल्मों को दर्स देते इत्तिफाक से एक शार्गिद जो अपने उस्ताद के शब व रोज पर नजर रखता था ।
ये राज जान गया कि हजरत शेख ने कई दिन से खाना नहीं खाया तालिब इल्म खुद भी बहुत गरीब था इसलिये खुद खाने का इन्तेजाम नहीं कर सका लेकिन पड़ोसीयों के पास जाकर कहने लगा तुम्हारे दस्तरख्वान पर तो कई तरह के खाने जमा हैं मगर क्या तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे पड़ोस में किसी अजीम हस्ती ने कई दिन से एक लुक्मा भी नहीं खाया है।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के ये पड़ोसी कपड़ा बुनने का काम करते थे शागिर्द की जुबान से हाल सुनकर बहुत अफसुर्दा हुये फिर उन लोगों ने कई किस्म के खाने पकाये और हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर हुये आपने इसे गैबी इन्तेजाम समझ कर खाने पर रजामंदी जाहिर कर दी फिर जब खाना लाने वालों में से एक शख्स आपके हाथ धुला रहा था तो उसकी जबान से निकल गया अल्लाह भला करे उस तालिब इल्म का जिसने हमें ये खबर दी
ये सुनते ही हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने दोनों हाथ खींच लिये और उस शख्स से फरमाया क्या खबर दी उस तालिब इल्म ने ?
यही कि आप कई दिन से फाके से थे हाथ धुलाने वाले ने सादगी से कहा ।
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