हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग- 16
हां याद है हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया।
फिर तुमने ये कैसी जिंदगी इख्तियार कर ली है? दोस्त ने अफसोस करते हुए कहा अगर तुम देहली में कयाम करते और दर्स व तदरीस में मश्गूल होते तो मुजतहिद जमाना कहलाते और बड़ी शान शौकत की जिंदगी गुजारते।
तुम्हारा
हुस्ने जन अपनी जगह मगर मैं इस तर्ज जिंदगी से राजी हो गया हो चुका हूं हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया और दोस्त से गुजरे जमाने की बातें करते रहे।
फिर जब खानकाह
पहुंचे तो पीरो मुर्शिद ने तलब करके फरमाया
अगर किसी दोस्त से मुलाकात हो और वो तुमसे कहे कि ये क्या हाल बना रखा
है.... और दर्स व तदरीस का वो सिलसिला क्यों छोड़ दिया है जो खुशहाली का जरिया बनता .... तुम ये कैसी जिंदगी बसर कर रहे हो।
पीरो मुर्शिद
के इरशादात सुनकर हजरत निजामुद्दीन औलिया हैरत जदा रह गये हजरत बाबा फरीद ने दोस्त
से मुलाकात का हाल इस तरह बयान कर दिया जैसे आप व नफ्से नफीस वहां पर मौजूद थे।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया को हैरान और परेशान पाकर पीरो मुर्शिद ने फरमाया मौलाना तुम
अपने दोस्त को क्या जवाब दोगे?
जो पीरो
मुर्शिद का हुक्म हो हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अर्ज किया।
अगर कोई दोस्त
ये सवाल करे तो ये सअर पढ़ देना। हजरत बाबा फरीद ने फरमाया:
तू मेरा हम
सफर नहीं बन सकता इसलिये अपना रस्ता पकड़।
तुझे तेरी खुश
बख्ती मुबारक हो और मुझे शिकस्ता हाली।
इसके बाद शेख
ने हुक्म दिया कि मुख्तलिफ किस्म के खाने एक ख्वान में सजाओ और फिर अपने सर पर
रखकर दोस्त के पास ले जाओ।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने ऐसा ही किया फिर देखने वालों ने देखा कि देहली का महफिले
शुकन बोसीदा लिबास में, सर पर ख्वान रखे हुए अजोधन के बाजार से गुजर रहा था। लोग तमाशाई थे मगर हजरत
निजामुद्दीन औलिया इस ऐजाज पर नाजां थे
जैसे सर पर ख्वान नहीं, ताजे शाही रखा हो।
दोस्त ने ये
मंजर देखा तो रोता हुआ दौड़ा और हजरत निजामुद्दीन औलिया के सर से ख्वान उतारा।
मौलाना तुमने ये क्या किया ?
हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने सारा वाक्या बयान किया।
तुम्हारे शेख
बड़े जबरदस्त हैं कि जिन्होंने तुम्हें चंद दिनों में नफ्स कशी के इस मकाम पर पहुंचा दिया। दोस्त ने बे इख्तियार
कहा तुम्हारे शेख आरिफ हैं। मुझे भी उनके
पास ले चलो।
खाने के बाद
दोस्त ने अपने मुलाजिम से कहा । ये ख्वान उठाओ और हमारे साथ चलो।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने इन्कार कर दिया जिस तरह मैं इस ख्वान को अपने सर पर उठाकर
लाया था, उसी तरह वापस ले जाउंगा।
फिर वो फाजिल
दोस्त जिसे अपने इल्म पर नाज था, हजरत बाबा फरीद के खिदमतगारों में शामिल हो गया।
साढ़े सात माह के कयाम के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने पीरो मुर्शिद की इजाजत से दोबारा देहली तश्रीफ लाये अजोधन से रूखसत होते वक्त हजरत बाबा फरीद ने फरमाया महबूबे इलाही को नसीहत करते हुए फरमाया था।
जिस तरह मुमकिन हो, अपने दुश्मनों को खुश रखने की कोशिश करना
जिस किसी से कर्ज लो उसकी अदायगी से गाफिल न होना, हक तआला
तुम पर मंजिल आसान फरमाए। (वाजेह रहे हजरत निजामुद्दीन औलिया का लकब महबूबे इलाही
है)
गर्ज पीरो मुर्शिद की दुआओं के साये में हजरत निजामुद्दीन औलिया देहली की जानिब रवाना हुये रास्ते में एक घना तारीक जंगल पड़ता था इत्तिफाक से उस रोज बारिश भी हो गई जिसने फजा को मजीद तरीक और पुर होल बना दिया था फिर अचानक डाकू बे नियाम शमशीरें लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया की तरफ बढ़े ।
उस वक्त आप बारिश से बचने के लिये एक तनावर दरख्त के नीचे बैठे हुऐ थे डाकूओं को देखकर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने दिल में सोचा मैं एक गरीब मुसाफिर हूं , मेरे पास माल व दौलत नाम की कोई चीज नहीं है, अगर कुछ है तो बस पीरो मुर्शिद का अतिया , उस वक्त हजरत निजामुद्दीन औलिया, हजरत बाबा फरीद का अता करदा पेराहन पहने हुए थे और कंबल ओडे़ हुए थे अगर इन डाकूओं ने पीरो मुर्शिद की ये निशानी मुझसे छीन ली तो मैं हरगिज किसी आबादी में नहीं जाउंगा और जिंदगी पर किसी को मुंह नहीं दिखाउंगा हजरत निजामुद्दीनऔलिया दिल ही दिल में सोच रहे थे और डाकू तेजी से आप की तरफ बढ़े चले आ रहे थे। फिर डाकू चंद कदम के फासले पर ठहर गये हजरत निजामुद्दीन औलिया के सामने थे आपको यकीन हो चला था कि डाकूओं की पहुंच से महफूज नही रह सकेंगे.... मगर अचानक डाकूओं ने अपना रूख बदला और तेजी से भागते हुए तारीक जंगल के किसी हिस्से में गुम हो गये।
हजरत निजामुद्दीन औलिया इस वाक्ये
का जिक्र करते हुए फरमाते थे ये पीरो मुर्शिद के बख्शे हुए पेरहन और कम्बल की
बरकत थी कि वो डाकू अन्धे हो गये थे या फिर उन्हें नजर नहीं आया ।
वहीं देहली
पहुंच कर हजरत महबूब इलाही, हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल की खिदमत में हाजिर हुए और पीरो मुर्शिद
की बे पनाह नवाजिशात का जिक्र किया।
हजरत शेख
नजीबुद्दीन मुतवक्किल ये तमाम माजरा सुनकर बहुत खुश हुए और बे इख्तियार फरमाया
निजामुद्दीन मोहम्मद तुम खुश नसीब हो कि बहुत जल्द आसूदा मंजिल हो गये वर्ना इस
रास्ते में तो उम्रें तमाम हो जाती हैं और मंजिल का धुंधला सा निशान भी नजर नहीं
आता।
देहली पहुंचते
ही हजरत निजामुद्दीन औलिया को पीरो मुर्शिद की नसीहतें याद आईं आप दूसरे जरूरी
कामों को नजरअंदाज करके सबसे पहले अपने एक दोस्त के मकान पर तश्रीफ ले गये। ये
वही जिससे कुछ अर्से पहले हजरत महबूब इलाही ने एक किताब पढ़ने के लिये ली
थी जैसे ही उस दोस्त से मुलाकात हुई, हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया ए मखदूम तुम्हें याद होगा
एक बार मैंने तुमसे एक किताब ली थी, इत्तिफाक से वो
किताब गुम हो गई और मैं उस वक्त हजरत बाबा फरीद की खिदमत में हाजिर होने के लिये
आजोधन चला गया।
फिर तुम क्या
चाहते हो मौलाना निजामुद्दीन दोस्त ने पूछा।
वो किताब दो
बारा तो मिल नहीं सकती.... और मेरी माली हैसियत भी इस काबिल नहीं कि मैं दूसरी
किताब खरीद कर तुम्हें दे सकूं हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया मेरे जहन व दिल
पर एक बोझ सा है और इस बारे गिरां को उतारेने की एक ही सूरत है कि मैं इस किताब को
दोबारा सफहात पर मुन्तकिल कर दूं बस जरा मुझे कुछ कागज मैस्सर आजाएं , मुझे चंद दिनों की मोहलत और दे दो ।
दोस्त ने
हजरत निजामुद्दीन औलिया की बात को बहुत गौर से सुना कुछ देर तक वो गहरे सुकूत के
आलम में हजरत महबूब इलाही के चेहरे मुबारक को देखता रहा फिर निहायत पुर सोज लहजे
में कहने लगा मौलाना निजामुद्दीन तुम जिस जगह से आये हो वहां की यही बरकत है कि
इंसान को अल्लाह की खुशनूदी हासिल होती है और दिल से दुनिया की मुहब्बत रूखसत हो
जाती है, अब तुम इस किताब को भूल जाओ, वो एक दोस्त की तरफ से दूसरे दोस्त के लिये तोहफा था।

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