हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.)भाग-19
मुझे माफ रखो हजरत निजामुद्दीन औलिया ने पुर जलाल लहजे में फरमाया गलत कहा उस तालिब इल्म ने मैं हरगिज फाके से नहीं हूं शदीद भूख के आलम में भी आपकी गैरत इस एहसान को बरदार्शत नहीं कर सकी ।
खाना लाने वाले बहुत देर तक खुशामद करते रहे मगर आपने उनकी जियाफत कुबूल नहीं की बड़ी शान से बे नियाजी के साथ फरमाया मेरी फाका कशी का मामला अल्लाह के सिवा किसी पर क्यों खुले ? अगर राजिक-ए- आलम खुद तुम्हारे दिलों में ये बात डालता तो मैं मेजबानी कर लेता अल्लाह मुझे इस वक्त से महफूज रखे जो दूसरे मेरी भूख का हाल जान लें और फिर लाने वाले इस तरह मेरे सामने खाना लाएं कि फलां शख्स ने उन्हें मेरी फाका कशी की खबर दी थी।
हजरत निजामुद्दीन औलिया शहर की पुरशोज फिजा से हमेशा बेजार रहते थे आप सुकून और यकसोई के तालिब थे और ये दोनों चीजें शहर में नहीं थीं अपनी इसी कैफियत के बारे में हजरत महबूब इलाही फरमाते हैं शुरू ही से मेरा दिल शहर में नहीं लगता था मैं एक रोज कतलग खान के होज पर था और कुरआन मजीद हिफज कर रहा था ,अचानक मेरी नजर एक दरवेश पर पड़ी जो याद इलाही में मश्गूल था मैं उन दरवेश के करीब जाकर बैठ गया फिर जब वो जिक्र से फारिग हुये तो उनसे अर्ज किया क्या आप इसी शहर के रहने वाले हैं ?
हां दरवेश ने कहा
क्या अपनी मर्जी से इस शहर में रहते हैं ?मैं ने दोबारा अर्ज किया।
ये बात नहीं है दरवेश ने जवाब दिया इसके बाद उन्होने एक वाक्या सुनाते हुए कहा कि कमाल दरवाजे के बाहर चबूतरे पर जहां शहीदों के चार दीवारी बनी हुई है, वहां एक दरवेश बैठे हुए थे मैं उनके करीब पहुंचा तो उन्होंने मुझे मुखतिब करते हुए कहा अगर अपने ईमान की सलामती चाहते तो इस शहर से चले जाओ मैंने इसी वक्त पक्का इरादा कर लिया था कि ये शहर छोड़ कर कहीं चला जाऊंगा.... मगर आज पच्चीस साल हो गये हैं कि जब भी इस शहर से जाने का इरादा करता हूं तो कोई कोई न कोई रूकावट पेश आ जाती है।
ये वाक्या बयान करने के बाद हजरत महबूब इलाही ने फरमाया कि उन दरवेश की बात सुनने के बाद मैंने ये शहर छोड़ने का इरादा कर लिया कभी सोचता कि फलां मकाम पर चला जाऊं कभी ख्याल आता कि पटियाली का रूख करूं वहां एक तुर्क रहता था पटियाली जिला ईटा का एक कस्बा है जहां हजरत अमीर खुसरू पैदा हुए थे और यही आपकी ननिहाल थी हजरत निजामुद्दीन ने इसी तरफ इशारा किया था कभी दिल कहता कि बसनाला चला जाऊं वो एक पाक साफ जगह है।
आखिर मैं बसनाला चला गया वहां तीन रोज मुकीम रहा कोई मकान नहीं मिला मजबूरान वापस चला आया फिर भी तर्क सुकूनत का ख्याल हर वक्त लगा रहता था गर्ज इसी कश्माकश में हौज रानी की तरफ चला गया वहां एक बाग जिसे बाग हैरत कहते हैं परवरदिगारे आलम से दुआ की ए अल्लाह तू अपने बन्दे के इज्तिराब से खूब वाकिफ है मैं इस शहर से चला जाना चाहता हूं तू मेरी रहनुमाई कर जैसे ही मेरी दुआ खत्म हुई , एक सदा ए गैबी आई ग्यास पुर
इससे पहले मैंने गयासपुर नहीं देखा था ये मकाम किस जगह आबाद है फिर मुझे एक नीशापुरी दोस्त का ख्याल आ गया जो दरबारे सुल्तानी में नकीब था मैं इस दोस्त के घर पहुंचा तो अहले खाना ने बताया कि वो गयासपुर चला गया है मुझे फौरन ख्याल आया कि यही वो गयास पुर है जिसकी तरफ गैब से इशारा किया गया है अलगर्ज मैं वहां पहुंचा तो वो एक वीरान इलाका था दूर दूर इंसानी आबादी नहीं थी सुनसान फिजा देखकर मुझे सुकून कल्ब हासिल हुआ कि यहां इत्मिनान से रह सकूंगा ।
अभी गयास पुर में थोड़ा अर्सा भी नहीं गुजरा था यहां भी दुनिया के हंगामें होने लगे सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के इन्तिकाल के बाद जब उसका बेटा मआजुद्दीन केकबाद हिन्दुस्तान का बादशाह हुआ तो इस इलाके का नक्शा ही बदल गया केलू खेड़ी में अपनी तफरीह गाह और महल तामीर किया तो यहां उमरा-ए- सल्तनत खिदमतगारों और सिपाहीयों का अज़दहाम हो गया मखलूक खुदा की कसरत देखकर मैंने सोचा कि अब ये जगह भी मेरे रहने के काबिल नहीं रही।
इत्तिफाक उन्हीं दिनों देहली में एक बुजुर्ग का इन्तिकाल हो गया ये बुजुर्ग मेरे उस्ताद भी रह चुके थे मैं ने दिल ही मैं फैसला कर लिया जब उस्ताद की फातिहा में जाउंगा तो फिर किसी और तरफ का इरादा करूंगा इसी रोज असिर की नमाज के वक्त एक दुबला पतला नौजवान मस्जिद में दाखिल हुआ उसकी जसामत कमजोर थी मगर नक्श निगार इस कदर दिलकश थे कि देखने वाले देखते ही रह जाते अल्लाह जाने वो मर्दाने गैब मैं से था या कौन था नौ जवान ने दूसरे लोगों के साथ नमाज अदा की और फिर मुझे मुखतिब करते हुए यह शअर पढ़ा। जिस रोज अल्लाह ने तुझे चांद बनाया था , उसी रोज समझ लेना चाहिए था कि सारी दुनिया की उंगलियां तेरी तरफ उठेंगी । (तर्जुमा)
उसके बाद उस नौजवान ने कहा पहले तो आदमी को मश्हूर नहीं होना चाहिए और जब कोई मश्हूर हो जाए तो उसे ऐसा बनना चाहिए कि कल रोजे कयामत रसूल के सामने शर्मिंदा न होना पड़े ये तो कोई हौसले की बात नहीं कि इन्सान मखलूके खुदा से भाग कर किसी गार या वीराने में गौशा नशीन हो जाये हौंसला तो उसे कहते हैं मखलूक खुदा के दर्मियान रहकर याद खुदा में मशगूल हो जाए ।
जब वो नौजवान अपनी बात मुकम्मल कर चुका तो मैंने उसके सामने खाना लाकर रख दिया ब जाहिर वो भूका नजर आता था मगर उसने खाने को हाथ भी नहीं लगाया फिर मैंने दिल मैं ये नियत की कि इस जगह को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा तो उसने थोड़ा सा खाना खाया और चला गया ।

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