हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-20
गयास पुर के कयाम के दौरान हजरत निजामुद्दीन औलिया को शदीद तकलीफ का सामना करना पड़ा यहां इस बात की वजाहत जरूरी है कि ये दुनियावी मसाइब हजरत महबूब इलाही का मुकद्दर नहीं थे आशाइस तो आपके दरवाजे पर हाथ बांध कर खड़ी रहती थी मगर खुद ही आप उन्हें मुंह नहीं लगाते थे ।
हम तरीख की रोशनी में ये बात साबित कर सकते हैं कि अगर हजरत निजामुद्दीन औलिया एक बार रसमन भी सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के दरबार में तश्रीफ ले जाते और सिर्फ तआरूफ के तौर पर ही फरमा देते कि मैं हजरत बाबा फरीद उद्दीन मसऊद गंज शकर का मुरीद हूं तो फरमांरवा ए हिंद आप पर नवाजिशात की बारिश कर देता.... मगर आप बलबन के दरबार में किस तरह हाजिरी देते कि बलबन तो खुद इक्तिदार की भीख मांगने अजोधन हाजिर हुआ था अगरचे हजरत महबूब इलाही की रूहानी अजमतों का मुकम्मल इजहार नहीं हुआ था लेकिन हजरत बाबा फरीद से निसबत के सबब आप खुद भी शहंशाह थे फिर एक शहंशाह किसी बादशाह से किया तलब करता जो बचपन से अल्लाह मियां का मेजबान रहा हो वो किसी इंसान की मेजबानी किस तरह कुबूल करता ? सब्र व रजा की मंजिल का मुसाफिर था हर्ष व लालच को अपने दिल में जगह देता तो जल कर खाक हो जाता।
हजरत निजामुद्दीन औलिया फरमाया करते थे कि एक बार में बदायूं से देहली आ रहा था रास्ते में मुझे एक शख्स मिला वो सियाह गुदड़ी पहने हुये था और एक मैली सी पगड़ी सर पर बंधी हुई थी अपने जाहिरी हुलिये से वो कोई मस्त मालूम होता था उसने मुझे सलाम किया और बड़े वालहाना अंदाज में बगलगीर हुआ कुछ देर तक मेरे सीने से सीना मिलाएं खड़ा रहा फिर अलग हुआ और मेरे दिल पर हाथ रखकर कहने लगा यहां से बू ए मुसलमानी आती है इसके बाद वो चला गया मगर मैं उसकी हैसियत को ना पहचान सका।
दूसरी बार मैंने उसे उस वक्त देखा जबकि जमाअत खाने में कंदूरी का खाना तैयार था और दस्तरख्वान बिछा हुआ था ) कंदूरी उस खाने को कहते हैं जिस पर हजरत फातिमा रजि. की फातिहा पढ़ी जाये) अचानक वहीं शख्स जो मुझे बदायूं में मिला था , जमाअत खाने में दाखिल हुआ और सलाम करके दस्तरख्वान पर बैठ गया खाने के बाद मैंने उसे तलाश किया मगर वो कहीं नजर नहीं आया हाजिरीन से पूछा उस दरवेश ने कुछ खाया भी या नहीं? वहां मौजूद लोगों ने बताया कि जब खाना शुरू हुआ था तो उस दरवेश ने चार रोटियां और कुछ शोरबा एक लकड़ी के प्याले में डाला और खानखा के सामने वाले टीले पर बैठ कर खाने लगा फिर किसी तरफ चला गया उस वक्त तंगी के सबब हम पर तीसरा फाका था फिर कहीं जाकर उस फातिहा का ऐहतिमाम हुआ था।
तीसरी बार वो शख्स मौलाना उमर को रास्ते में मिला केलू खेड़ी से कुछ अकीदत मंद गयासपुर आ रहे थे और उनमें मौलाना उमर भी शामिल थे अचानक वो शख्स किसी तरफ से नमूदार हुआ और मौलाना उमर से पूछने लगा तुम लोग कहां जा रहे हो ?
शेख निजामुद्दीन से मुलाकात के लिये जा रहे हैं मौलाना उमर ने जवाब देते हुए कहा।
उन मिस्कीन के पास क्या रखा है? उस शख्स ने कहा और अपने पेरहन से बारह जेतल निकाले ये मेरी तरफ से निजामुद्दीन को दे देना इतना कहकर वो गायब हो गया । उसके बाद खानका में फुतूहात (नजरात) आना शुरू हो गईं उस दिन मुझ पर ये राज फाश हुआ कि वो मर्दान गैब मैं से था मगर अपने आपको जाहिर नहीं करता था।
अहले नजर इन तमाम वाकियात से अंदाजा कर सकते हैं कि हजरत निजामुद्दीन औलिया ने किस गुर्बत में अपनी जिंदगी बसर की थी और राह सुलूक में किस तरह साबित कदम रहे थे जो दुनिया दार लोग जाहिरी करामात को विलायत की निशानी समझते हैं उन्हें महबूब इलाही की हयात-ए- मुबारक का ब गौर मुताआला करना चाहिए आपकी पूरी जिंदगी एक करामत मुसलसल थी।
गिजा की कमयाबी के साथ जिस्मानी जेबाइश का भी अजीब हाल था सैयद मोहम्मद किरमानी फरमाते हैं एक वक्त ऐसा भी गुजरा है ,जब हजरत महबूब इलाही के पास कपड़ों का सिर्फ एक ही जोड़ा रह गया था। कसरत इस्तेमाल से वो बोसीदा हो गया था और मैला भी लिबास पर मैल कुचेल जम जाने की वजह ये थी कि हजरत निजामुद्दीन औलिया साबुन खरीदने की इस्तिताअत नहीं रखते थे सैयद मोहम्मद किरमानी की अहलिया बीबी रानी ने ये हाल देखा तो अर्ज किया बिरादर अजीज तुम्हारे कपड़े फट गये हैं और मैले भी हो गये हैं अगर तुम कुछ देर के लिये अपना ये लिबास मुझे दे दो तो मैं उसे धोकर साफ भी कर दूं और उसमें पेबन्द भी लगा दूं वाजेह रहे बीबी रानी हजरत निजामुद्दीन औलिया से उम्र में बड़ी थीं ।
बीबी मुझे फुर्सत नहीं मिल रही है एक आध रोज में ये काम भी हो जायेगा तुम फिक्रमंद न हो हजरत निजामुद्दीन औलिया ने निहायत लतीफ अंदाज में माअजरत की बीबी रानी ने आपका ये उज्र कुबूल नहीं किया और अपनी चादर पेश करते हुए अर्ज किया भाई इसे बांध लो इतनी देर मैं तुम्हारे कपड़े धो दूंगी बीबी रानी भी हजरत बाबा फरीद की मुरीद थीं , इसलिये हजरत निजामुद्दीन औलिया उनकी इस ख्वाहिश पर मजबूर हो गये आपने चादर बांधी और एक किताब लेकर पढ़ने में मश्गूल हो गये फिर जब कपड़े धुल कर खुश्क हो गये तो बीबी रानी ने अपने शोहर सैयद किरमानी की छोटी पगड़ी धोई और उसे काट कर महबूब इलाही के कुर्ते में जो गिरेबान के पास फट गया था पेबन्द लगा दिया फिर वो कपड़े बड़े अदब से आपकी खिदमत में पेश किये ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने निहायत माजरत और शुक्र के साथ वो कपड़े पहने सैयद मोहम्मद किरमानी कहते हैं बजाहिर ये मामूली सी बात थी मगर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इस वाक्ये को हमेशा याद रखा अक्सर इस वाक्ये का जिक्र फरमाते यहां तक कि मैं शर्म से सर झुका लेता मुझपर भी मेहरबान रहे और मेरी औलाद पर भी मैंने और मेरे खानदान ने जो कुछ बरकतें और नेअमतें हासिल कीं वो सब महबूब इलाही की दुआओं का सदका थीं ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया दूसरी बार पीरो मुर्शिद की खिदमत में हाजिर हुये तो आपको सिलसिला चिश्तिया की खिलाफत से सरफराज किया गया खिलाफत नामा अता करने के बाद खानका में मौजूद तमाम दरवेशों के सामने हजरत बाबा फरीद ने बुलंद आवाज में फरमाया हम ने खिलाफत के साथ हजरत निजामुद्दीन औलिया को हिन्दुस्तान की विलायत भी दे दी ।
हजरत शेख जमालुद्दीन हांसवी , हजरत बाबा फरीद के महबूब तरीन खलीफा थे मगर हिन्दुस्तान की विलायत हजरत निजामुद्दीन औलिया का मुकद्दर ठहरी जैसे ही बाबा फरीद की जुबान मुबारक से ये अल्फाज अदा हुये, महबूब इलाही ने पीरो मुर्शिद की दस्त बोसी की फिर इस तरह खड़े रहे कि आपका सर नियाज शेख की बारगाह-ए- जलाल में झुका था।

Comments
Post a Comment