हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-27
जब हजरत निजामुद्दीन औलिया देग लेकर उस दरवेश के करीब पहुंचे तो वो भूख की शिद्दत से इस कदर परेशान हुआ कि उसने उबलते हुए पानी में बे झिझक अपना हाथ डाल दिया हजरत महबूब इलाही उसे मना करते रहे मगर दरवेश बार बार देग में हाथ डालता और फिर जौ के आटे को मुंह में रख लेता गुदड़ीपोश ने ये अमल तीन बार दोहराया फिर उसने देग को जमीन पर मार दिया वो देग दरअसल मिट्टी का मटका थी जो जमीन पर गिरते ही टूट गई ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया निहायत सब्र सुकून से दरवेश की इस
इज्तिरारी हरकत को देखते रहे मगर मौलाना
कमालुद्दीन याकूब खामोश न रह सके।
मेहमान तुमने ये क्या किया ? मौलाना के लहजे से तल्खी का रंग साफ था तुम्हे मालूम है
कि इस पानी जैसी गिजा से खुदा के बंदे भी रोजा खोल सकते थे अफसोस तुमने दूसरों की भूख को नजर अंदाज कर दिया तुम नहीं
जानते ये दरवेशाने खुदा मस्त कितने दिन के फाके से हैं।
मैं अल्लाह के हुक्म से ये बात जानता था मगर क्या करता
मेरे लिये अल्लाह का यही हुक्म था दरवेश बे नियाजी के आलम में बोल रहा था
मुझसे यही कहा गया था कि उस देग को तोड़ दो ये कहकर गुदड़ीपोश हजरत महबूब इलाही के
करीब आया और निहायत मोहब्बत आमेज नजरों से देखते हुए कहा शेख निजामुद्दीन तुम्हें
बाबा फरीद गंज शकर ने नेअमत बातिनी बख्शी और मैंने तुम्हारी फाका कशी की देग को
तोड़ दिया , अब तुम
सुल्तान जाहिरी भी हो और सुल्तान बातिनी भी ये कहकर दरवेश तेज कदमों से वहां से
चला गया और थोड़ी दूर जाकर गायब हो गया।
मौलाना कमालुद्दीन याकूब हैरत से अपने पीरो मुर्शिद को
देखने लगे ।
हजरत महबूब इलाही ने अपने मुरीदों की हैरत दूर करने के लिये
फरमाया मौलाना अल्लाह की कुदरत भी ला
महदूद है और इंसान बेेेेबस है कि वो तोफीक इलाही के बगैर कुछ नहीं समझ
सकता हम नहीं जानते कि किस रूप में कौन आए? आओ अपने अल्लाह का जिक्र करें तमाम तारीफें अल्लाह के
लिये हैं उस गुदड़ी पोश ने आपको सुल्तान
जाहिरी और सुल्तान बातिनी कहकर पुकारा था , इस लिये आपका
लकब सुल्तान मशाइख भी है।
उस अजनबी दरवेश के
जाने के बाद के बाद एक हफ्ता भी न गुजरा होगा कि हजरत निजामुद्दीन औलिया पर तसखीर
जाहिरी के दरवाजे खुल गये लोग कतार दर कतार चले आते थे आने वालों में उमरा वुजरा और
साहिबे हैसियत अफराद शामिल थे मुफलिस और तंगदस्त लोगों के अलावा जो शख्स भी हजरत
महबूब इलाही आस्ताने आलिया पर हाजिर होता , कुछ न कुछ नजर के लिये जरूर लाता और दरख्वास्त करता हजरत
निजामुद्दीन औलिया उसे कुबूल फरमा लें हजरत महबूब इलाही किसी की दिल सिकनी न फरमाते
अगर आने वाला मुतकब्बिर सरमाया दार होता तो दरवेश खुदा मस्त उसे नामुराद और नाकाम
लौटा देते वर्ना आम तौर हजरत निजामुद्दीन औलिया नजरें कुबूल फरमा लेते मगर इस तरह
की सारी चीजें उसी वक्त जरूरत मंदों में तकसीम फरमा देते । तस्खीरे जाहिरी के
दरवोजे खुल जाने के बाद भी हजरत महबूब इलाही वही हाल था अय्याम ममनू को छोड़ कर
तमाम साल रोजे रखते सहरी में जो की एक रोटी का इस्तेमाल करते और जब इफ्तार का वक्त
आता तो जो की दूसरी रोटी आपकी की गिजा होती खानकाह में रहने वाले खिदमतगार पेटभर
कर खाते और जिक्र इलाही में मशगूल हो जाते।
हजरत निजामुद्दीन औलिया सुल्तान अलाउद्दीन के इकतिदार में
आने से पहले ही देहली के आस पास खासे मश्हूर
हो चुके थे आपकी खानकाह में मुहर्रम की हर पांचवी तारीख से लेकर दसवीं तारीख तक
हजरत बाबा फरीद मसउद गंज शकर के उर्स मुबारक की तकरीबात मुनअकिद की जाती थीं उर्स
में शिरकत करने के लिये मुल्क के कोने कोने से देखने आते थे इस तरह तवील और अरीज
मुल्क को कोई हिस्सा होगा जहां के लोग हजरत महबूब इलाही के हल्का-ए- अकीदत में
शामिल न हों।
उस जमाने में सुल्तान अलाउद्दीन खिल्जी का एक अमीर, हजरत निजामुद्दीन औलिया की खिदमत में हाजिर
हुआ और कीमती नजर पेश की खिलजी अमीर का ख्याल था कि हजरत महबूब इलाही किसी पशोपेश
के बगैर उस नजर का कुबूल फरमा लेंगे शायद इस ख्याल की वजह ये हो कि खिलजी अमीर
गौशा नसीन दरवेशों को जरूरतमंद समझता था।

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