हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-25
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी का अतिया शुक्रिया के साथ लौटा दिया गया और अब फिर गयासपुर के दरवेशों की खानकाह में चार वक्त का फाका था हजरत निजामुद्दीन औलिया ममनूअ दिनों के अलावा हमेशा रोजा रखते थे अगर गिजा आ जाती तो एक रोटी से अफ्तार कर लेते और एक रोटी से सहरी का एहतमिमा करते कुल दो रोटियां आपकी खुराक थीं अक्सर रिवायतों में दर्ज है कि हजरत महबूब इलाही ने कई सालों तक नमक के पानी से जो की रोटी इस्तेमाल की यानी लज्जत से आप इतनी दूर थे जितने कि जमीन और आसमान है।
गयासपुर में एक बूढ़ी औरत हजरत निजामुद्दीन औलिया की पड़ोसी थी और आपसे बेहद अकीदत रखती थी उस बूढ़ी औरत का काम ये था सुबह से शाम तक रस्सी बनाती और फिर दूसरे दिन करीब की आबादी में जाकर रस्सी बेंच देती फिर चार पैसे जो हासिल होते उनसे जो का आटा और थोड़ी सी तरकारी खरीद लाती उसके बाद चंद रोटीयां पकाकर महबूब इलाही की खिदमत में पेश कर देती पहली बार जब उन बूढ़ी खातून ने इस तरह अकीदत का मुजाहिरा किया तो हजरत निजामुद्दीन औलिया ने ये कहकर वो रोटियां कुबूल करने से इंकार कर दिया इस गिजा से तो सिर्फ तुम्हारा पेट भी नहीं भर सकता फिर हम तुम्हारे कमजोर कंधों पर अपने रिज्क का बोझ क्यो डालें ? हम अल्लाह के लिये इबादत कर रहे हैं तो फिर अल्लाह ही हमारा राजिक है और दूसरी जरूरीयात का कफील है।
हजरत महबूब इलाही का जवाब सुनकर बूढ़ी औरत रोने लगी मुझे अपनी खिदमत से महरूम न फरमाइये मेरे नामा- ए- आमाल में इसके सिवा कुछ नहीं ।
बूढ़ी खातून के लहजे में इस कदर खुलूस और गुजार था हजरत निजामुद्दीन औलिया इंकार न कर सके और जो की पकी हुई रोटीयां कुबूल फरमा लीं।
अब ये इत्तिफाक था या कुदरत की कोई मसलहत कि वो खातून कई दिन तक रस्सियां तैयार करती रही थीं मगर कोई खरीदार नहीं मिलता था हजरत महबूब इलाही और दूसरे दरवेशों की तरह वो खातून भी चार दिन से भूखी थी हजरत निजामुद्दीन औलिया से अकीदत का ये हाल था कि वो अपनी तकलीफ को भूल गई थीं और हर वक्त इस फिक्र में रहती थीं कि राजिक दो आलम किसी तरह चंद रोटियों का इंतेजाम कर दे और ये मर्दाने खुदा उन रोटियोंसे रोजा खोल सकें।
आखिर पांचवे दिन उन खातून से किसी ने एक रस्सी खरीद ली खातून बहुत खुश हुईं थीं कि आज फाका कशी का सिलसिला टूट जायेगा रस्सी फरोख्त करने से जो रकम हासिल हुई थी वो महज इतनी थी कि उससे एक सेर जो का आटा खरीदा जा सकता था खातून ने यही किया और जब असर का वक्त आया तो उन्होंने वही सेर आटा हजरत महबूब इलाही की खिदमत में पेश कर दिया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया कुछ देर तक सोचते रहे , फिर मौलाना कमालुद्दीन याकूब को हुक्म देते हुए फरमाया ये नजर खुलुस है, उसे कुबूल कर लो और आटे को देग में डाल कर पकने के लिये रख दो।
हजरत शेख कमालुद्दीन याकूब ने पीरो मुर्शिद के हुक्म पर अमल करते हुए जौ के आटे को देग में डाल दिया और फिर ज्यादा मिकदार में पानी भर दिया गया इसके बाद आग दहकादी गई एसा करने से हजरत हमबूब इलाही का मकसद ये था कि आटे के अलावा गैब से कुछ हासिल हो तो उसे भी देग में डाल कर पका लिया जाये इस तरह इसकी मिकदार बढ़ जाती वर्ना अगर रोटियां पकाई जाएं तो एक दो निवालों से ज्यादा खुराक किसी के हिस्से में न आती ।
आग के शौले भड़कते रहे और पानी उबलता रहा इसी वक्त एक गुदड़ी पोश फकीर कहीं से घूमता हुआ आया और नारा जनी करने अगर किसी के पास कुछ हो तो वो उसे फकीर के सामने पेश करे आज फकीर बहुत भूखा है, जल्दी करो और उसकी भूख को मिटा दो ।
दरवेश नारा जनी करता हुआ कमालुद्दीन याकूब के पास आया मौलाना उस वक्त देग के करीब बैठे हुए थे नजदीब आकर दरवेश ने फिर से सदा लगाई अगर कुछ है तो खाने को दे देग को बंद क्यों कर रखा है इसका मुंह खोल दे ।
हजरत मौलाना कमालुद्दीन याकूब ने गौर से उस गुदड़ी पोश की तरफ देखा दरवेश का लिबास दरीदा था और मैला भी उसकी दाढ़ी बे तरतीब थी और बाल परेशान थे।

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