हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-23
हजरत बाबा फरीद की इसी तालीम और फैज व मोहब्बत ने महबूब इलाही को सब्र व तहम्मुल की आग में इस कदर जलाया था कि आप कम उम्र में ही इक्सीर बन गये थे मगर साथी दरवेशों की तकलीफ हर वक्त आपके सामने रहती थी।
इसी जमाने में हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और हजरत शेख कमालुद्दीन जैसे अजीम बुजुर्ग हजरत निजामुद्दीन औलिया की जेरे निगरानी माअरफत की इब्तिदाई मंजिलें तय कर रहे थे जब मुसलसल कई दिन फाके होने लगते हो महबूब इलाही अपने मुरीदान खास से मुखातिब होकर फरमाते मैं जानता हूं कि तुम लोग मेरी खातिर ये मसाइब बर्दाशत कर रहे हो और इस वीराने में पड़े हुए हो जहां जिंदगी की कोई आशाइस तो दूर, एक वक्त की सूखी रोटी भी मैस्सर नहीं।
तुम्हें खबर होनी चाहिये अल्लाह की जमीन तंग नहीं हैं मैं रिज्क हराम की बात नहीं करता अल्लाह की आबाद की हुई बस्तीयों में हलाल रोजी भी ब कसरत मौजूद है तुम लोग शरीअत के दायरे में रह कर भी दुनिया की नेअमतों से लुत्फ अंदोज हो सकते हो सख्त जमीन पर सोते सोते यकीनन तुम्हारे जिस्म दुखने लगे होंगे मैं तुम्हें खुशी से इजाजत देता हूं कि तुम अपनी पीठ के लिये नर्म बिस्तर तलाश कर लो ये सब कुछ जायज है मेरी तरफ न देखो कि मुझे तो वीराने में रहने की आदत सी पड़ गई है.... और मैं तुम्हें इस बात की भी इजाजत देता हूं कि अपने शिकम को फाका कशी की आग से बचा लो अल्लाह ने तुम्हारे लिये बेशुमार चीजें हलाल की हैं मेरे भूखे रहने पर न जाओ मेरा बचपन इसी बे सरो सामानी में गुजरा है मैं तुमसे बहुत खुश हूं और रजा और रगवत से ये बात कह रहा हूं मेरी खातिर इतनी परेशानी न उठाओ मुझे तुम्हारी भूख और न आसूदा जिंदगी का ख्याल बहुत परेशान करता है मैं तुम्हारी जाहिरी सुकून के लिये अल्लाह दिन और रात दुआ करता हूं मगर अभी उसका वक्त नहीं आया है।
हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और मौलाना कमालुद्दीन याकूब अपनी जिंदगी सवांरने के लिये तमाम तकलीफें बर्दाश्त कर रहे थे मगर ये हजरत निजामुद्दीन औलिया की आला जरफी थी कि अपनी जात को मुरीदों के आजर का सबब करार दिया पीरो मुर्शिद की ये बातें सुनकर हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और मौलाना कमाल याकूब बे करार हो गये और हजरत महबूब इलाही के सामने गिरया व जारी करने लगे शेख हम तो इस दर पर आ पड़े अब और कहां जायें? आपकी मुहब्बतों के सिवा हमारा कोई ठिकाना नहीं खिदमत-ए- शेख में गुजरने वाला फाका कशी का एक दिन हमारे लिये जिंदगी भर की नेअमतों से ज्यादा है अगर हमें हुकूमते हिंद भी दे दी जाये तो हम आपकी कुरबत को एक लम्हें के लिये भी फरोख्त नहीं करेंगे हमें ये शर्फ काफी है कि हमरे पांवों में शाह की जंजीरे गुलामी पड़ी है आजाद कर दिये तो अपनी हबस के गुलाम हो जायेंगे और गुलामी हमें मंजूर नहीं।
हजरत बुरहानुद्दीन गरीब और शेख कमालुद्दीन याकूब की ये इल्तिजायें इस कदर रिक्कत आमेज होती कि हजरत महबूब इलाही खुद भी आबदीदा हो गये और फिर अपने दोनों मुरीदों की तालीफ कल्ब के लिये फरमाते अल्लाह की रहमत हमेशा तुम्हारे सरों पर सायाफगन रहे अगर तुम अल्लाह की रजा के लिये अपने जिस्म को भूख की आग में जला डाला और शोला-ए- इश्क की तपिश से नफ्स को खाकस्तर बना दिया तो फिर तुम पर आतिश दोजख हराम हो जायेगी इस कायनात में इफाये अहद ही सब कुछ है जो लोग अपना अहद तोड़ देते हैं, उन्हें दुनिया तो शायद हासिल हो जाये मगर आखिरत में उन के लिये शदीद अजाब है न काबिल बयान जिल्लत व रूसवाई है और बदतरीन महरूमी व नाकामी है।
माअजुद्दीन केकबाद बिस्तर पर पड़ा एडि़यां रगड़ रहा था और दूसरी तरफ सुल्तान गयासुद्दीन बलबन का एक तुर्क सरदार जलालुद्दीन खिलजी हुकूमत का ख्वाब देख रहा था आखिर एक दिन खिलजी ने तुर्क सिपाहियों के जरिये माअजुद्दीन केकबाद का फसाना हयात अंजाम तक पहुंचा दिया जो मुहाफिज थे वही कातिल बन गये तुर्क सिपाहियों ने मआजुद्दीन केकबाद को गला घोंट कर हलाक कर दिया इसके मुर्दा जिस्म को रेश्मी बिस्तर में लपेट कर दरया जमुना के हवाले कर दिया ।
सुल्तान मआजुद्दीन केकबाद के कत्ल के बाद ने उसके छ: साल के बेटे केउमरस को शमशुद्दीन का लकब देकर हिन्दुस्तान के तख्त पर बैठाया अगर चे सल्तन की पूरी बाग डोर जलालुद्दीन के हाथों में थी फिर भी वह दुनिया को दिखाने के लिये सुल्तान बलबन के खानदान की वफादारियों का दम भरता था फिर एक दिन ये मस्लहत भी खत्म हो गई जलालुद्दीन खिलजी ने केकबाद के छ: साल के बच्चे को कत्ल कराके अपनी मुतलकुल अनान हुक्मरानी का ऐलान कर दिया सुल्तान जलालुद्दीन खिल्जी पर आकाजादे का कत्ल साबित है मगर फिर भी मुअर्रखीन उसे एक नेक परस्त फरमांरवां करार देते हैं ये कैसा अजीब मजाक है।
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी सलातीन हिंद में पहला हुक्मरां था जिसने हजरत निजामुद्दीन औलिया के नियाज हासिल करने की कोशिश की थी इसी वाक्ये की तफसील ये है कि एक दिन सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के चंद ब होश मसाहिबों ने अपने फरमारवां से कहा आप दीगर अहले फन और उलेमा पर अपने अल्ताफ करम की बारिश करते हैं मगर फिर भी कुछ मुस्तहिक लोग आपकी नजर इल्तिफात से महरूम है?
आखिर वो कौन लोग है? सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने तअज्जुब से पूछा।
शेख निजामुद्दीन और उनके कुछ साथी गयासपुर में निहायत गुर्बत व अफलास की जिंदगी बसर कर रहे हैं मसाहिबीन ने अर्ज किया अगर आप उन दरवेशों की किफालत करें तो ये बात हुकूमत हिंद के लिये इंतिहाई सआदत का बाइस होगी शेख निजामुद्दीन औलिया एक ब कमाल बुजुर्ग है।
सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी खुद भी इल्म दोस्त हुक्मरां था इसलिये वो अपने मुसाहिबीन खास के मशवरे पर फौरन अमल पैरा हुआ कातिब सुल्तानी से फरमारवा ए हिंद के हुक्म के मुताबिक ये इबारत लिखि अगर आप पसंद करें तो मैं आपके लिये और आपके साथी दरवेशों के लिये कुछ गांव (जागीर) वक्फ कर दूं।
सुल्तान जलालुद्दीन का मकतूब हजरत निजामुद्दीन औलिया ने गौर से पढ़ा शाही कासिद का ख्याल था कि गयास पुर के एक गोशे में फाका कशी की जिंदगी गुजारने वाला ये दरवेश सुल्तान के अतिये को फौरन कुबूल कर लेगा मगर शाही कासिद उस वक्त हैरान रह गया , जब हजरत महबूब इलाही ने मकतूब वापस करते हुए फरमाया सुल्तान को इस फकीर की जानिब से सलाम पेश करना और कह देना अल्लाह उन्हें अच्छा बदला दे मेरे लिये यही काफी है कि सुल्तान को उन लोगों का ख्याल भी है जो दरबार सुल्तानी से बहुत दूर , और एक गौशे में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं ।
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