हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-28
तुम्हारी इस मोहब्बत का शुक्रिया तुमने दरवेशों का इस कदर
ख्याल रखा हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया मगर इस फकीर को इस बड़ी रकम की जरूरत
नहीं है ।
खिलजी अमीर का चेहरा उतर गया हजरत महबूब इलाही ने इस तरीके
से एक मालदार के ख्याल को गलत साबित कर दिया दरवेश जरूरतमंद होते हैं और खास व आम
की हदिये कुबूल फरमा लेंते हैं ।
ये रकम जरूरतमंदों तक पहुंचा दो कि वो मुझसे ज्यादा तुम्हारी
मदद के हकदार हैं खिलजी अमीर को खामोश पाकर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया एक
मालदार का महल आन की आन में ढह गया खिलजी ने दरवेश का ये अंदाज देखा दिल पर चोट
लगी थी गिड़गिड़ाने लगा शेख मुझे इस तरह नाकाम न नामुराद वापस न लौटाएं ।
भाई अपना रास्ता लो क्यों इस दरवेश का वक्त बर्बाद करते
हो ? हजरत महबूब इलाही ने बेजारी के साथ फरमाया
मुझे और भी जरूरी काम हैं।
दरअसल वो खिलजी अमीर दौलत को दिखा रहा था और दरवेशों को
बड़ी रकम देकर अपनी अना को पूरा करना चहता था हजरत महबूब इलाही पर कश्प के जरीये
खिलजी अमीर की नियत जाहिर हो चुकी थी
इसीलिये आप उसकी नजर कुबूल करने से बच रहे थे।
शेख कुछ तो करम फरमाईये खिलजी अमीर ने दोबारा दरख्वास्त
की ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने खादिम खास ख्वाजा इकबाल को
बुलाया और फिर थैली से एक सिक्का निकालकर फरमाया इसे किसी जरूरतमंद को दे दो ।
हजरत महबूब इलाही
के इस अमल से खिलजी अमीर के चेहरे पर इत्मिनान का रंग उभर आया ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने खिलजी अमीर को मुतमइन अंदाज में बैठा देखा तो फरमाया अब जाओ मैंने अपनी मर्जी के खिलाफ तुम्हारी ख्वाहिश
की तकमील कर दी अब कहां तक किसी की दिलजोई करूं ?खिलजी अमीर की तबियत पर चढ़ा हुआ रंग उतर गया और उसकी जुबान
लड़खड़ा गई मुझे इस रकम की जरूरत नहीं, मेरे पास बहुत दौलत
है।
मालदारी के नशे में मुब्तिला एक मुकतदिर इंसान की बात सुनकर
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने चंद लम्हों के लिये सुकूत फरमाया फिर आपके चेहरे मुबार पर रंग जलाल उभर आया बेशक तुम एक दौलतमंद
शख्स हो मगर अल्लाह ने इस दरवेश को भी अपनी नेअमतों से मेहरूम नहीं किया इसके
बाद आपने खिलजी अमीर को हुक्म दिया कि अपने बायें तरफ देखे ।
अमीर ने जैसे ही अपने बाएं जानिब देखा उसकी जुबान गूंगी हो
गई और आंखे खुली की खुली रह गईं अशरफियों का एक दरिया जारी था जिसे खिलजी अमीर
शदीद हैरत के आलम में देख रहा था , इतना कुछ देखकर वो अमीर शर्मिंदा हो गया ।
मैंने सोने चांदी
के सिक्कों पर बड़ा गुरूर किया और अल्लाह के दरवेश बंदों को नादार
समझा शेख मुझे माफ फरमा दें खिलजी अमीर के लहजे में इन्तिहाई आजिजि झलक रही थी
तेरी नजर में खुलूस और नियत की सफाई शामिल नहीं थी हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया तू दरवेशों की मुफलिसी का तमाशा देखने आया था मगर
याद रख अल्लाह अपने साख्ता जानों को तन्हा नहीं छोड़ता बहरहाल मैंने तुझे माफ किया ।
फिर वो जब खिलजी अमीर नकरी सिक्कों की थेली उठाकर इन्तिहाई
शिकसतगी के आलम में वापस जाने लगा तो हजरत महबूब इलाही ने उसे मुखातिब करके फरमाया
तूने खानकाह के अंदर जो देखा है, किसी से उसका जिक्र न करना।
इसके बाद वो अमीर जब भी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की खिदमत
में हाजिर होता तो हजरत निजामुद्दीन औलिया का जिक्र जरूर करता वो बड़ी शान वाले है, उनकी रूहानी अजमतों का अंदाजा नहीं किया जा
सकता।
वाली हिंदुस्तान बड़े जोक शौक से एक दरवेश गौशानसीन का
जिक्र सुनता और फिर अमीर से पूछता आखिर तूने शेख निजामुद्दीन औलिया में ऐसी कौनसी
बात देखी है तो तू उनकी मदाह सराई करते नहीं थकता ?

Comments
Post a Comment