हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-55
महेन्द्र देव के कुबुल इस्लाम का
वाक्या भी बड़ा अजीब है हजरत निजामुद्दीन
औलिया के रूहानी तसर्रूफ का अंदाजा होता है महेन्द्र देव गढ़ (दक्किन) के इलाके
का एक बड़ा जागीरदार था आसूदा हाल जिंदगी गुजारने के बा वजूद उसे एक अजीब सी परेशानी
का एहसास होता था अपनी इसी परेशानी के जमाने में महेन्द्र ने अपने हम मजहबों की
जुबानी हजरत निजामुद्दीन औलिया का नाम मुबारक सुना।
वो बपने वक्त के बड़े दरवेश हैं
और उनकी दुआओं से बिगड़े हुए काम बन जाते हैं हजरत निजामुद्दीन औलिया की बुजुर्गी के
किस्से देवगढ़ के गली कूचों में आम थे महेन्द्र देव गैर महसूस तौर पर हजरत
निजामुद्दीन औलिया की जाते गिरामी का असीर होता चला गया फिर शौक दीदार इस कदर बढ़ा
कि वो अपनी मां से इजाजत लेकर देहली रवाना हो गया।
मैं हिन्दू मजहब से हूं और हूजूर की जियारत के लिये
देवगढ़ से आया हूं
महेन्द्र देव ने हजरत महबूब इलाही
की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज किया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उसे
जमाअत खाने में ठहराया और अपने खिदमगारों को हुक्म दिया कि हिन्दू मेहमान का खास तौर ख्याल रखा जाए महेन्द्र देव कई दिन तक
जमाअत खाने में मुकीम रहा हजरत निजामुद्दीन औलिया के खिदमगार उसके आगे पीछे रहते
थे दर्स शुरू होता तो वो भी हाजिरीन मज्लिस में शामिल हो जाता और हजरत निजामुद्दीन
औलिया की बातें गौर से सुनता रहता अगर चे
दक्किन का हिन्दू होने की वजह से हजरत महबूब इलाही की बहुत सी बातें
उसकी समझ में नहीं आती थीं लेकिन वो खानकाह की जाहिरी आदाब देखकर बहुत
मुताअस्सिर था।
फिर एक दिन हजरत अमीर खुसरू पीरो
मुर्शिद की इजाजत से महेन्द्र देव को अपने मकान पर ले गये बाकी वाक्यात वो इस
तरह तहरीर करता है।
रात को मैं अमीर खुसरू के माकन पर
रहा था ज्यादा देर तक जागने के सबब मेरी आंख देर से खुली मैंने देखा कि अमीर
खुसरू घर पर नहीं हैं नौकरों से पूछा तो मालूम हुआ कि अमीर खुसरू सुबह जल्दी ही दरबारे सुल्तानी में तश्रीफ ले गये हैं आज कोई
खास जश्न है इसलिये अमीर रात को जरा देर से वापस आएंगे अकेले में मेरा दिल नहीं
लग रहा था इसलिये सोचा कि अपनी कयामगाह चला जाऊं
अमीर खुसरू के मुलाजिमों ने मेरी खातिर मदारत की फिर में जमाअत खाने में
वापस जाने के लिये घर से निकल पड़ा मेरे रास्ते में देहली का वो बाजार भी आता था
जहां बुखारा,
तर्किस्तान और ईरान का सामान बिकता था मैं धीमे कदमों से चलता हुआ उन दुकानों को
देखता जाता था जहां हर किस्म के कपड़े, पोस्तीन, कम्बल, कालीन, कमानें, ढालें,तीर,तलवारें, नेजे, और खंजर
मौजूद थे मैं दुकान पर रूक गया कुछ तलवारें और खंजर देखने लगा ये दुकान
किसी तुर्क की थी मगर वहां सामान बेचने वाला एक हिन्दुस्तानी नौकर भी था।
मैंने मुलाजिम से कीमतें भी पूछीं
और चीजों के बारे में ये पूछा कि ये किन मुल्कों में तैयार किया गया है? दुकानदार बहुत अख्लाक से पेश आया
और मेरे सवालात का जवाब देता रहा फिर उसने मेरे बारे में पूछा कि मैं कौन हूं और
कहां से आया हूं ?
मैंने उसे अपना नाम बताया कि मेरा
नाम महेन्द्र देव है और देवगढ़ का रहने वाला हूं अमीर खुसरू के यहां कयाम है और
हजरत निजामुद्दीन औलिया के यहां भी जाता रहा हूं।
हजरत महबूब इलाही और अमीर खुसरू का
नाम सुनकर वो शख्स इस तरह भड़क उठा कि जैसे मैंने कोई बहुत बुरी बात कह दी हो वो
दोनों बे दीन है एलानिया गाना सुनते हैं कव्वालों की महफिलों मे नाचते हैं
हालांकि इस्लामी शरीअत में गाना और बजाना
सुनना बिल्कुल हराम है
दुकानदार की बातें सुनकर मुझे सख्त
गुस्सा आया हालांकि मैं इस शहर में अजनबी था मगर मैंने उसे गजबनाक लहजे में जवाब
देते हुए कहा अपनी जबान बंद रखो मैं उन दोनों बुजुर्गों के बारे में एक लफ्ज भी
सुनने के लिये तैयार नहीं ।
दुकानदार ने बड़ी तअज्जुब से मेरी
तरफ देखा तुम तो अभी कह रहे थे कि तुम्हारा तअल्लुक हिन्दू मजहब से है
इसमे कोई शक नही मैंने ऊंची आवाज से
कहा।
हिन्दू होते हुए तुम्हें एक
मुसलमान फकीर से इतनी हमदर्दी क्यों है ?दुकानदार की हैरत बरकरार थी
मैंने पुर जोश लहजे में जवाब दिया
मैं दक्किन से सिर्फ हजरत निजामुद्दीन औलिया की जियारत के देहली आया हूं मैंने उनकी बातें
सुनीं और उनकी मज्लिस का रंग देखा है
दुकानदार ने मेरी बातों को काई
एहमियत नही दी और निहायत ही तहकीर आमेज लहजे में कहने लगा तुम अमीर खुसरू के पीरो
मुर्शिद को नहीं जानते वो सीधे सादे लोगों से अपने आपको सजदा कराते हैं और उन्होंने
मकरो फरेब का एक जाल बिछा रखा है ।
मैंने दुकानदार की बातों को
झुठलाते हुए कहा मैं कल रात अमीर खुसरू के मकान पर रहा था मैंने उनमें या उनके पीर
में कोई बात मकरो फरेब की नहीं देखी
दुकानदार ने कहा तुम भी बुत परस्त
हो और तुम्हारा दोस्त अमीर खुसरू भी बुत परस्त है और उसका पीर भी कुछ ऐसा ही होगा इसलिये तुम उसके गिरोहीदा हो गये हो।
दुकानदार की तहकीर आमेज गुफ्तगू
सुनकर मैं अपने गुस्से पर काबू न पा सका अब मैं एक लम्हें के लिये भी यहां ठहर
नहीं सकता था मुझे जिंदगी भर इसका अफसोस रहेगा मैं तुम्हारे पास क्यों आया?
न यहां ठहरता और न एसी तकलीफ देह
बातें सुनने को मिलतीं।
दुकानदार हंस कर कहने लगा मैं खरा आदमी हूं तुम मुसाफिर अजनबी हो सबसे बढ़कर ये
कि मुसलमान हुकूमत के जिम्मि हो इसलिये मैंने तुम्हें बुराई से बचाना जरूरी समझा।

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