हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-21
निजामुद्दीन सर उठाओ हजरत बाबा फरीद ने फरमाया।हजरत महबूब इलाही ने पीरो मुर्शिद के हुक्म की तामील की तो एक और नेअमत आपकी मुंतजिर थी हजरत बाबा फरीद कभी कभी एक खास दस्तार बांधते थे और ये दस्तार थी जो आपके पीरो मुर्शिद हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने अता की थी बाज रिवायत के मुताबिक ये दस्तार हजरत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को अपने शेख हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती से अता हुई थी इस तरह ये दस्तार को पीराने चिश्त के तबर्रुकात में नुमायां हैसियत हासिल थी।
जब हजरत महबूब इलाही ने हुक्म शेख पर सर उठाया तो हजरत बाबा फरीद इस दस्तार को खोल रहे थे फिर अहले दिल के लिये वो बड़ा अजीब मंजर था, जब हजरत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की अता, हजरत कुतुबुद्दीन की बखशिश और हजरत बाबा फरीद की इनायत हजरत निजामुद्दीन के सर की जीनत बन गई हजरत बाबा फरीद ने खुद अपने दस्त मुबारक से दस्तार विलायत हजरत निजामुद्दीन औलिया के सर पर आरास्ता की ।
इसके बाद हजरत बाबा फरीद ने अपना असा हजरत निजामुद्दीन औलिया को मरहमत फरमाया और फिर फरमाया निजामुद्दीन दो रकअत नमाज अदा करो।
महबूब इलाही फौरन हुक्म शेख पर अमल पेरां हुये फिर जब आप नमाज अदा कर चुके तो हजरत बाबा फरीद ने हाथ पकड़ कर आसमान की तरफ इशारा किया फरजन्द मैं तुम्हें अल्लाह के सुपुर्द करता हूं।
फिर हजरत बाबा फरीद ने तमाम दरवेशों के सामने हजरत निजामुद्दीन औलिया के लिये खुसूसी दुआ फरमाई ए अल्लाह निजामुद्दीन मोहम्मद तुझसे जो कुछ मांगे, उसे अता फरमा दे कि तेरे सिवा कोई देने वाला नहीं ।
फिर जब हजरत महबूब इलाही अजोधन से रूखसत होने लगे तो हजरत बाबा फरीद ने मुखातिब करते हुए फरमाया निजामुद्दीन मोहम्मद अपना ये खिलाफत नामा हांसी में मौलाना जमालुद्दीन और देहली में काजी मुंतजीबुद्दीन को दिखा देना।
काजी मुंतजिबुद्दीन हजरत बाबा फरीद के अजीमुल मुरतबत खलीफा थे इस वक्त काजी साहब पीरो मुर्शिद के हुक्म के मुताबिक देहली में मुकीम थे और बंदगाने खुदा में इल्म जाहिरी और वातिनी तक्सीम कर रहे थे मौलाना जमालुद्दीन से मुराद हजरत शेख जमालुद्दीन हांसवी हैं आपका सिलसिला नसब इमाम आजम हजरत अबूहनीफा से मिलता है हजरत शेख जामल से हजरत बाबा फरीद इस कदर मुहब्बत करते थे कि उन जज्बात के अल्फाज को लफ्जों में जाहिर नहीं किया जा सकता हजरत शेख जमालुद्दीन की खातिर हजरत बाबा फरीद ने बारह साल तक हांसी में कयाम किया था अपने महबूब मुरीद के बारे में आप फरमाया करते थे जमाल,जमाल मास्त(जमाल ,हमार जमाल)
हजरत बाबा फरीद जब अपने किसी मुरीद को खिलाफत अता करते तो उस शख्स को ताकीद फरमाते कि हांसी जाकर शेख जमालुद्दीन से मुहर लगवा लेना अगर हजरत शेख जमाल हांसवी खिलाफत नामे पर मुहर लगा देते तो मुस्तनद समझा जाता और अगर शेख जमाल मुहर न लगाते तो हजरत बाबा फरीद भी इस खिलाफत नामे को कबूल न फरमाते और साफ साफ कह देते जमाल के चाक किये हुये को हम सी नही सकते।
हजरत बाबा फरीद केे अल्फाज इस वाक्ये की तरफ इशारा करते हैं , जब शेख जमाल ने आपके एक मुरीद का खिलाफत नामा उसकी बे अदबी और गुरूर के सबब चाक कर दिया था और फिर उस शख्स ने हजरत बाबा फरीद की खिदमत में हाजिर होकर शेख जमाल की शिकायत की थी जवाबन हजरत बाबा फरीद ने तमाम अहले मजलिस के सामने फरमा दिया था जिसे हमारा जमाल चाक कर दे हम उसे नहीं सी सकते ।
अलगर्ज दौलत अजीम से सरफराज होने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया पीरो मुर्शिद की दुआओं के साये में अजोधन से देहली रूख्सत हुये हजरत शेख जमालुद्दीन हांसवी का इंतिकाल 659 हिजरी में हुआ उस तारीखी पशेमंजर की रोशनी में अंदाजा किया जा सकता है कि 657 हिजरी या 658 हिजरी में हजरत निजामुद्दीन औलिया को खिलाफत अता हुई थी बाज रिवायतों में खिलाफत नामा तहरीर किये जाने की तारीख 669 हिजरी दर्ज है उस वक्त तो खुद हजरत बाबा फरीद भी विसाल फरमा चुके थे आप 664 हिजरी में दुनिया से रूख्सत हुये वाजेह रहे कि इस सिलसिले में बहुत से तारीखी इख्तिलाफ मौजूद हैं मगर हमने उन तारीखों पर इन्हिसार किया है जो ज्यादा करीन कयास हैं ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया अजोधन से रवाना होकर हांसी तशरीफ लाये और हजरत जमालुद्दीन हांसवी को अपना खिलाफत नामा दिखाया, शेख जमालुद्दीन बहुत खुश हुये और निहायत वालहाना अंदाज में यह शअर पढ़ा ।
तमाम जहांनों के मालिक के लिये हजार शुक्र है।
कि गौहर उस शख्स के हवाले कर दिया जो गौहर शनास है।
हांसी में चंद रोज कयाम के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया देहली की तरफ रवाना हो गये रास्ते भर आपको यही ख्याल परेशान कर रहा था कि हजरत शेख ने खिलाफत अता करने वक्त काजी मुन्तजिबुद्दीन के साथ हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल का नाम क्यों नहीं लिया ? हालांकि वह आपके छोटे भाई भी थे और खलीफा भी इस मसले में हजरत निजामुद्दीन औलिया का जहन उलझ कर रह गया अकली तौर पर इस मसले की एक ही वजह समझ आती थी कि पीरो मुर्शिद शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल से नाराज है और यह ख्याल हजरत महबूब इलाही के लिये निहायत तकलीफ दे था क्योंकि हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल की दुआओं के तुफेल ही हजरत महबूब इलाही को हजरत बाबा फरीद का आस्ताना मैस्सर आया था।
गर्ज इसी जहनी कशमाकश में सफर तमाम हुआ और एक जांगुदाज खबर आपकी मुंतजिर थी हजरत निजामुद्दन औलिया अजोधन और हांसी के दर्मियान में थे कि हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल का इंतिकाल हो गया ये खबर सुनकर हजरत महबूब इलाही की आंखों से बे इख्तियार आंसू जारी हो गये एक तवील रफाकत थी जो खत्म हो गई एक रिश्ता -ए-खास था जो टूट गया एक शहर इल्म था जो उजड़ गया और एक दर्सगाह -ए-मुहब्बत थी जो खाली हो गई।

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