हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-22
हजरत महबूब हलाही हजरत शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल को याद करके अक्सर आबदीदा हो जाया करते थे और निहायत रिक्कत आमेज लहजे में फरमाया करते थे इस शहर में वही आपके मोहसिन भी थे और दोस्त भी .... वही गमगसार भी थे और रहनुमा भी.... इल्म और आग्ही का एक रोशन पेकर था जो मौत के गर्द गुबार में गुम हो गया जुहद और तकवा का एक आला नमूना था जो मौत ने हमसे छीन लिया था अल्लाह शेख की कब्र को नूर से भर दे कि वो हम धूप में जलने वालों के लिये मुहब्बत का एक मजबूत सायबान थे।
फिर जब रंज व अलम की शिद्दत कम हुई तो हजरत महबूब इलाही को समझ में ये राज आया कि हजरत बाबा फरीद ने आपको खिलाफत नामा आता करते हुये ये क्यों नहीं फरमाया कि इसे नजीबुद्दीन मुतवक्किल को भी दिखा लेना ये हजरत बाबा फरीद के नूर वातिन की अजीब मिसाल था
दिन व रात का फाका अपनी मुर्कररा रफ्तार से बढता रहा और हजरत निजामुद्दीन औलिया सारी दुनिया से बेजार होकर एक वीरान इलाके गयास पुर में अपने मालिक की रजा तलाश करते रहे ये हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके साथियों के अफलास का वो जमाना था तीन तीन दिन तक रोटी का एक लुक्मा भी मैस्सर नहीं आता था अगर कभी गैब से कुछ हासिल हो भी जाता तो आप पहले अपने खिदमत गारों को खिलाते खुद्दाम अर्ज करते कि पीरो मुर्शिद भूखे हैं तो हम किस तरह इस गिजा को अपने हलक से नीचे उतार सकते हैं मगर आप कमाल सब्र के साथ इस मुश्किल वक्त को गुजार देते और खुद भूके रहकर दूसरों को खिलाते।
कभी आप फरमाते कि ये मेरा हुक्म है और खिदमत गार मजबूरन खाना खाने लगते कभी आप फरमाते मैं भी तुम्हारे दस्तर ख्वान पर बैठा हूं क्या ये काफी नहीं है? एक बार तो ऐसा हुआ कि आपने रोटी का पहला निवाला तोड़ा और उसे शोरबे में डोबने के लिये दस्त मुबारक बढ़ाया फिर देखने वालों ने देखा कि आखिरी वक्त तक आपका हाथ सालन के प्याले में रहा मगर आपने गिजा का एक लुक्मा नहीं खाया यहां तक कि तमाम दरवेश खाने से फारिग हो गये फिर आपने वो लुक्मा खाया और दस्तर ख्वान से उठ गये ।
सुल्तान गयासुद्दन बलबन, हजरत निजामुद्दीन औलिया के उस्तादे-ए- गिरामी मौलाना कमालुद्दीन जाहिद का बहुत बड़ा मुुुुुरीद था मगर हैरत की बात है कि कि अपने तवील दौरे इक्तिदार में वो एक बार भी हजरत महबूब इलाही की तरफ मुतवज्जा नहीं हुआ उसकी एक वजह तो यह है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया दारूल हुकूमत से दूर ग्यासपुर में जैसे वीरान इलाके में गौशा नशीनी की जिंदगी गुजार रहे थे दूसरे ये कि गयासुद्दीन बलबन हल्म दोस्त जरूर था मगर उसके दिमाग में बूये सुल्तानी मौजूद थी वह ऐसे अहले इल्म को नवाजता था जो उसके दरबार में हाजिरी दिया करते थे और उसकी शान में कसीदे पढ़ा करते थे सुल्तान को दरवेशों से कोई दिलचश्पी नहीं थी और हजरत निजामुद्दीन औलिया ऐसे दरवेश थे जो कसर सुल्तानी की तरफ देखना भी गवारा नहीं करते थे फिर दोनों में किस तरह कुर्बत के रिश्ते होते ?
आखिर गयासुद्दीन बलबन शदीद महरूमी के आलम में दुनिया से रूख्सत हो गया इसका लायक तरीन बेटा मुगलों के हाथों शहीद हो गया बुगरा खां ऐशों इश्रत में मुब्तिला था मजबूरन बलबन ने खान शहीद के बेटे के खुसरू के नाम वसीयत की मलिक फखरूद्दीन कोतवाल एक ताकतवर अमीर था शहजादा खान शहीद अपनी जिंदगी में मलिक फखरूद्दीन कोतवाल को ना पसंद करता था नतीजनत उसने खान शहीद की रूह से बदला लेने के लिये उसके बेटे की बजाय बुगरा खां के बेटे मअजलुद्दीन केकबाद को हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा दिया अगरचे बलबन ने केकबाद को नामवर उस्ताद से तालीम दिलाई थी और खुद भी उसे ऐशो इश्रत की फजाओं से दूर रखता था।
..... मगर अठहरा साल की उम्र में ताज सुल्तानी सर पर रखते ही उसके कदम लड़खड़ा गये फिर मअजुद्दीन केकबाद गुनहों की पस्ती में ऐसा गिरा उसे कुछ होश ही न रहा वो कौनसी रंगीनी न थी जो मअजुद्दीन केकबाद ने मंहगे दामों नहीं खरीदी .... वो कौनसी बदमस्ती थी जो उसके हलका इख्तियार में नहीं थी सागिर व सुराही, रक्स बतां , शोखी दिलबरां, साजो आवाज , खुद फरामोशी बेखबरी, बस यही वो सामन कैफ निशात थी जिसके सहारे मआजुद्दीन केकबाद की जिंदगी बसर हो रही थी आखिर इक्कीस साल की उम्र में वो फालिज का शिकार होकर बिस्तर अलालत पर दराज हो गया।
मआजुद्दीन केकबाद ने एक वीरान इलाके कैलू खेड़ी को आबाद किया यह वही जगह है जहां हजरत कुजुबुद्दीन बख्तियार काकी ने कयाम फरमाय था बाद में आप सुल्तान शमशुद्दीन की दरख्सास्त पर मेहरोली तशरीफ लाये थे केकबाद ने केलू खेड़ी में शाही किले की बुनियाद रखी , एक दिलकश जामा मस्जिद तामीर कराई और सरकारी दफातिर देहली से यहां मुंतकिल करा दिये नतीजतन ये सुनसान जगह उमरा और सरकारी मुलाजिमों की पुर हूजूम बस्ती में तब्दील हो गई ।
केलू खेड़ी से दो तीन मील के फासले पर (गयास पुर) था जहां हजरत निजामुद्दीन औलिया जिक्र इलाही में मशगूल थे यही वो जमाना था , जब सरकारी करिन्दों का हुजूम देखकर हजरत महबूब इलाही किसी और जगह तशरीफ ले जाना चाहते थे।
ये बड़ी अजीब बात है कि (केलू खेड़ी) में जश्न व निशात जारी था ब मुश्किल दो तीन मील के फासले पर (गयास पुर) में दरवेशों की एक जमाअत फाका कशी के बदतरीन दौर से गुजर रही थी जिहालत पर दुनियावी नेअमतों और आसाइसों की बारिश हो रही थी और अहले इल्म के पेट पर पत्थर बंधे हुए थे ये दरवेशों की कम नसीबी नहीं, खुद मआजुद्दीन केकबाद की बदबख्ती थी कि वो हजरत निजामुद्दीन औलिया के पड़ोस में रहते हुए भी आपकी दुआओं से महरूम रहा।
हजरत महबूब इलाही को तो अपनी बे सरो सामानी का ख्याल तक न आता कि आप इस मर्द जलील के तरबियत याफ्ता थे जिसने कर्ज लिये हुए नमक का सालन खाने से इंकार करते हुए फरमाया था निजामुद्दीन मोहम्मद दरवेश को भूख की शिद्दत से मर जाना कुबूल है मगर कर्ज की जिल्लत गवारा नहीं।
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