हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-4
फिर कई सदियां गुजर जाने के बाद रोहिल खण्ड के हुक्मरां हाफिज रहमत खान रोहिला इसाले सवाब के लिये हजरत सैयद अहमद बुखारी की कब्र मुबारक पर हाजिर हुए फिर अपनी अकीदत का इजहार करने के लिये हाफिज रहमत खान रोहिला ने चार दीवारी भी बनवाई और गुंबद तामीर कराया।
इसके साथ ही मजार से लगकर एक मस्जिद की बुनियाद डाली और उसे भी तकमील तक पहुंचाया हम पहले ही बयान कर चुके हैं कि हजरत निजामुद्दीन औलिया की वालिदा हजरत बीबी जुलेखा एक अमीर कबीर बुजुर्ग हजरत अरब की साहबजादी थीं।
लेकिन आपने अपने वालिद की दौलत की जानिब आंख उठाकर भी नहीं
देखा हद तो ये कि बेवा होने का लिबास पहनने के बाद इस दरबाजे की जानिब निगाह न की
जहां आपका पूरा बचपन और जवानी के शुरूआती चंद साल गुजरे थे हजरत सैयद अहमद बुखारी
के बाद हजरत बीबी जुलेखा के भाईयों ने अपनी बहन की माल से मदद करनी चाही मगर
हजरत निजामुद्दीन औलिया की वालिदा एक
गैरतमंद खातून थीं आपने अपने भाईयों के इस मुहब्बत आमेज सुलूक का शुक्रिया अदा
किया और मेहनत मजदूरी करके अपनी जिंदगी गुजारने लगीं।
इस वक्त हजरत बीबी जुलेखा के घर में खाने वाले चार अफराद थे एक खुद आप की जात दूसरे हजरत निजामुद्दीन औलिया तीसरे महबूबे इलाही की छोटी बहन और चौथे एक मुलाजिमा उन सब की किफालत की जिम्मेदारीयां तन्हा बीबी जुलेखा पर आ पड़ी थीं आप- दिन रात सूत कातती और फिर मुलाजिमा के हाथ उसे बाजार में फरोख्त करवा देतीं, इस तरह जो कुछ रकम हासिल होती,उससे अपना गुजारा करतीं । ये आमदनी इतनी थोड़ी थी कि मामूली गिजा के सिवा कुछ हाथ नहीं आता।
तंगदस्ती का ये हाल था कि शदीद मेहनत के बावजूद हफ्ते में एक दिन भूखा रहना पड़ता और हजरत निजामुद्दीन औलिया अपनी मां से खाना मांगते तो हजरत बीबी जुलेखा बड़े खुश अंदाज से फरमातीं।
निजाम आज हम सब अल्लाह के मेहमान हैं’’
हजरत बीबी जुलेखा का बयान है कि जिस रोज सैयद मोहम्मद से
ये कहती कि आज हम अल्लाह के मेहमान हैं तो ये बहुत खुश होते और सारा दिन फाका की
तलब में गुजर जाता मगर एक बार भी खाने की कोई चीज भी तलब नहीं करते और इस तरह खुश
रहते कि अल्लाह का मेहमान का जिक्र सुनकर
उन्हें दुनिया की हर नेअमत मिल गई हो।
फिर दूसरे दिन खाने का इंतेजिाम हो जाता तो हजरत निजामुद्दीन औलिया अपनी मोहर्तम मां से अर्ज करते मां अब हम किस रोज अल्लाह के मेहमान बनेंगे?
वालिदा मोहर्तमा फरमातीं।
बाबा निजाम ये तो अल्लाह की मर्जी पर है वो किसी का मोहताज
नहीं दुनिया की हर चीज उसकी निगरानी में हैं वो जब चाहेगा तुम्हें अपना मेहमान
बना लेगा ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया अपनी मां की जुबानी ये ये बात सुनकर कुछ लम्हों के लिये खामोश हो जाते और फिर निहायत सरशारी के आलम में ये दुआ मांगते ।
ए अल्लाह तू अपने बन्दों को रोजाना
अपना मेहमान बना’’
अल्लाह का मेहमान होने का यही मतलब था कि उस रोज फाके की हालत में दो चार होना पड़ेगा।
पांच साल की उम्र में यह दुआ ये ख्वाहिश आरजू? दुनिया वालों को यह बात अजीब मालूम होगी मगर जिन्हें वो इस कायनात का हकीकी समझ बख्शी गई और जिन के दिल व दिमाग को कुशादा कर दिया गया।
वो इस राज से ब खबर हैं कि ऐसा क्यों होता था और हजरत निजामुद्दीन औलिया बेहद कम उम्री की के आलम में अल्लाह का मेहमान बनने की तमन्ना क्यों करते थे।
अल्लामा इकबाल ने
हजरत इस्माईल (अलै.) की कुर्बानी के वाक्ये
की तरफ इशारा करते हुए एक मकाम पर कहा है।
फितरत आप कर लेती है लाले की हिना बन्दी
सिखाए किसने इस्माइल को आदाबे फरजन्दी
इसी जात पाक ने हजरत निजामुद्दीन औलिया को भी पांच साल की
उम्र में ये जोक बख्शा था कि आप अल्लाह का मेहमान बनने की तमन्ना करते थे।
हजरत निजामुद्दीन औलिया की तालीम का सिलसिला वालिद मोहर्तम की जिंदगी में ही शुरू हो चुका था लेकिन इस वक्त तक आप किसी मकतब में दाखिल नहीं किये गये थे।
फिर जब सैयद अहमद बुखारी दुनिया से रूख्सत हो गये तो वालिदा मोहर्तमा ने कुछ दिनों तक खुद ही अपने बेटे की तरबियत की शायद इसकी वहज ये हो कि उस वक्त निजामुद्दीन औलिया बहुत कम अम्र थे।
छ: या सात साल की उम्र में हजरत बीबी जुलेखा ने सैयद मोहम्मद
को मौलाना शादी मकरई के मकतब मे दाखिल करा
दिया-
मौलाना शादी मकरई बदायूं में रहने वाले एक साहिबे करामत बुजुर्ग थे हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने उस्तादे गिरामी के बारे में फर्माते हैं।
कि मौलाना शादी मकरई की एक करामत ये थी कि अगर कोई शख्स उनसे क़ुरआन शरीफ की एक सूरत भी पढ़ लेता तो उसकी बरकत से उसे पूरा कुरआन हिफ्ज हो जाता- मैं ने भी मौलाना शादी मकरई से एक पारा पढ़ा था।
फिर मुझे महसूस हुआ कि मेरा जहन रोशन हो गया है जो आयत भी तिलाबत करता, जहन में नक्श होकर रह जाती यहां तक कि उस्ताद
मुहर्तम के फैजे रूहानी से किसी खास ऐहतिमाम के बगैर मुझे पूरा क़ुरआन हिफ्ज हो
गया-
एक अंदाजा है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया दस साल की उम्र में अल्लाह की आखिरी किताब को अपने सीने में महफूज कर लिया।
इसके बाद आपने मजहबी किताबों को पढ़ना शुरू किया मगर मगर किसी उस्ताद की रहनुमाई के बगैर इल्म के इसरार व रूमुज तक रसाई मुमकिन नही थीं, इस लिये हजरत निजामुद्दीन औलिया ने मौलाना अलाउद्दीन उसूली की शागिर्दी इख्तियार की।
एक रिवायत के मुताबिक उस वक्त हजरत
निजामुद्दीन औलिया की उम्र मुबारक ग्यारह- बारह साल थी।
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