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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-3

हजरत निजामुद्दीन औलिया -3

आखिर दुआएं मकबूल हुईं और 636 हिजरी में बीबी जुलेखा के पेट से एक ऐसा बच्‍चा पैदा हुआ

 जिसके चहरे की रोशनी से घर के दर व दीवार  रोशन हो गये बच्‍चे का नाम मोहम्‍मद रखा गया। फिर इसी बच्‍चे ने निजामुद्दीन औलिया के नाम से शौहरत पाई और ‘’ मेहबूब इलाही ‘’  के लक़ब से मश्‍हूर हुये ।

दूसरे साल बीबी जुलेखा के पेट से एक साहबजादी पैदा हुईं अभी सैयदों का घराना खुदा-ए-बुजुर्ग की बर्तरी और बख्‍शी हुई नेअमतों का शुक्रिया अदा कर रहा था कि अचानक सैयद अहमद बुखारी बिस्‍तर अलालत पर दराज हो गये- क़जी शहर होने की वजह से शाही तबीबों ने भी अपका इलाज किया मगर बीमारी रोज बरोज बढ़ती गई ।

मौत की घड़ी करीब से करीब तर आती जा रही थी और वो मर्दे खुदा बहुत जल्‍द इस दुनिया से  जाने वाला था  जिसके  दम से बीबी जुलेखा ही नहीं  बल्कि पूरे बदायूं में किरदार इल्‍म की रोश्‍नी फैली हुई थी। अल्‍लाह की वो आम मख्‍लूक भी बे अमां होने वाली थी जिसके दिलों को सैयद अहमद बुखारी का बड़ा सहारा था।

 मंसबे-ए-कजा के ओहदे पर फाइज होने के दौरान हजरत सैयद अहमद बुखारी ने तमाम आला सिफारिशात को  नजरआंदाज करते हुये ऐसे फैसले किये थे जिन से जालिम से जालिम करार पाया था और मजलूम , मजलूम ठहरा था, आज वही मुन्सिफ व आदिल इंसान दूसरी दुनिया का सफर की तैयारी कर रहा था ।

फिर वो वक्‍त भी आ पहुंचा। 

सांसों का शुमार खत्‍म होने में चंद घड़ी बाकी थीं हजरत सैयद अहमद बुखारी ने अपनी शरीके हयात हजरत बीबी जुलेखा से नजीफ आवाज में कहा बीबी सैयद मोहम्‍मद को मेरे करीब लाओ’’

बीबी मोहर्तमा ने शोहर के हुक्‍म की फौरी तामील की- सैयद मोहम्‍मद (निजामुद्दन औलिया) को वालिद मोहतरम  के सामने लाया गया जैसे ही हजरत सैयद अहमद बुखारी के बेकरार  नजरें अपने मासूम बेटे के चेहरे पर पड़ीं  आंखों  में आंसू आ गये  फिर रब के हुजूर अर्ज करने लगे ऐ मेरे रब तेरी कुदतर कामिला को किसी जाहिरी सबब की जरूरत नहीं तेरी जात पाक है तू वो जिस ने असबाब व वसाइल के बिना अजीमुश्‍शान कायनात तखलीक कर दी तेरी सिफत खल्‍लाकी का इदराक कैसे हो सकता है कि तूने हजरत ईसा अलैहिस्‍सलाम को बगैर बाप के पैदा किया फिर जब मुनकरीन इब्‍ने मरियम  की पैदाइश  के बारे में गुमराह होकर झगड़ने लगे  तो तूने अपने कलाम ए  मुकद्दस के जरिये  से उनसे सवाल किया।

ऐ मोहम्‍मद सललल्‍लाहो अलैहि वसल्‍लम  ये लोग ईसा का बाप न होने की वजह से

शक में हैं आदम अलैहिस्‍सालाम की तो न मां थी न बाप  फिर भी हम उनको अदम से वजूद में ले आए  हमारे लिये जमीन आसमान का मिटा देना और बाकी रखना जरा भी मुश्किल नहीं

ए मेरे रब : मैं तुझसे सवाल करता हूं  तूने अपने हबीब (सल.)  को  यतीम पैदा किया था और इसी बे सहारा बच्‍चे को सारे आलमों के लिये रहमत बना दिया। 

आज  मैं भी रहमतु‍ललिलआलमीन   के वास्‍ते  से तेरे सामने अपना दस्‍त तलब दराज करता हूं मुझे नाकाम और ना मुराद वापस न कर तेरे सिवा मेरी कोई पनाहगाह नहीं, मेरा कोई दस्‍तगीर और कोई मुश्किल कुशा नहीं । 

मैं तेरे ही हुक्‍म से तेरी बारगाहे इज्‍जत और जलाली में हाजिर हो रहा हूं।

 मुझे अपने साया रहमत में छुपा ले और मेरी बीबी और मेरे बच्‍चे सैयद मोहम्‍मद को बे यार मददगार न छोड़ उन्‍हें जमाने के हादसात से महफूज रख और हिदायत देने के बाद उनके दिलों में टेढ़ ना डाल।

ये जब तक जिंदा रहें इन्‍हें दीन ए हनीफ पर कायम रख और जब ये दुनिया से रूख्‍सत हो तो उनकी जवानों पर तेरी वाहदानियत और सरवरे कायनात (सल.)  की रिसालत का जिक्र  जारी हो इनकी कोशिशों को कामयाबी  से हमकिनार  और गवाहियों को शर्फे कुबूलियत अता फर्मा कि तेरे सिवा कोई औलाद देने वाला नहीं ‘’

इस दुआ के बाद हजरत सैयद  अहमद बुखारी  ने अपनी अहलिया मोहतर्मा से फरमाया – सैयद मोहम्‍मद को दूसरे कमरे में ले जाओ वक्‍त रूख्‍तस करीब आ पहुंचा, हर चीज  अपने रब की तरफ लौटकर जाने वाली है मुझे भी मेरे रब के हुजूर  ले जाया जा रहा है’’

शोहर का हुक्‍म सुनते ही बीबी जुलेखा, सैयद मोहम्‍मद को दूसरे कमरे में ले गईं और फिर जैसे ही वापस आईं तो सैयद अहमद बुखारी की जबान पर कलमा तैयबा जारी था जो हर मुसलमान के ईमान की बुनियाद है-

मैं गवाही देता हूं कि अल्‍लाह के सिवा को माबूद  नहीं और हजरत मोहम्‍मद (सल.)  उसके रसूल हैं-

अपने  अकीदे पर गवाही देने के बाद हजरत सैयद अहमद बुखारी ने अपनी बीबी मोहतर्मा की तरफ देखा और निहायत शिकस्‍ता लहजे में कहा अलविदा मेरी अमीन व पाकबाज हमसफर .... अलफिराक मेरे मासूम बेटे सैयद मोहम्‍मद ।

बदायूं में एक बड़ा तालाब ‘’ सागर ताल’’ के  नाम से मश्‍हूर है, हजरत सैयद अहमद बुखारी को इसी तालाब के किनारे सुपुर्द खाक किया विसाल के बाद एक जमाने तक आपकी कब्र मुबारक के निशान तो मिलते हैं मगर मर्दे खुदा की आरामगाह दूसरे इमारतों के मुकाबले में नुमायां नहीं थी।


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