हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-5
मौलाना उसूली ने शुरूआत में कुछ मजहबी किताबें पढ़ाईं, फिर अपने शागिर्द हजरत निजामुद्दीन औलिया को इस्लामी फिक्हा की अहम तरीन किताब ‘’ कुदूरी’’ की तालीम देनी शुरू की ‘कुदूरी’ इमाम अहमद बिन मोहम्मद की तस्नीफ है।इमाम अहमद बगदाद के एक मोहल्ले ‘कुदूर’ के रहने वाले थे इस लिये इमाम कुदूरी के नाम से शोहरत हासिल की।
ये किताब मुख्तसर होने के बावजूद ‘फिक्हा हनफी’ पर इस कदर तसनीफ है कि तकरीबन एक हजार साल गुजर जाने के बाद भी इसकी अजमत व इनफिरादियत में कोई कमी नहीं आई है।
इमाम कुदूरी की ये किताब करीबुल खत्म थी तो एक दिन मौलाना अलाउद्दीन उसूली ने हजरत निजामुद्दीन औलिया से फरमाया।
सैयद अब तो एक बड़ी किताब
खत्म कर रहे हो , इस लिय तुम्हें लाजिम है कि अपने सर पर दानिशमंदी की दस्तार बंधवाओ’’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उस्तादे मोहर्तम की बात सुनी और खामोश हो गये मगर जैसे ही आप मकतब से घर पहुंचे तो शदीद परेशानी के आलम वालिदा मोहर्तमा से अर्ज करने लगे।
उस्तादे गिरामी चाहते हैं कि में कुदूरी (किताबे फिक्हा) के खत्म करने से पहले अपने सिर पर दस्तार बांधूं’’हजरत निजामुद्दीन औलिया की परेशानी वजह उनके मआशी हालात थे।
दस्तार बंदी का वाजिह मफहूम था कि इस तकरीब में बदायूं के मुमताज उलेमा की खातिर मदारत का ऐहतिमाम किया जाये।
हजरत निजामुद्दीन औलिया यही सोच कर परेशान रहने थो जिस घर में दो वक्त की रोटी मुश्किल से आती हो, वहां मेहमानों की खातिर दारी कैसे हो सकती है? हजरत बीबी जुलेखा अपने बेटे की ये बात सुनकर बहुत खुश हुईं और निहायत सरशारी के आलम में फर्माने लगीं बाबा निजाम तुम इस सिलसिले में जरा भी फिक्रमंद न हो।
तुम्हारे उस्ताद की ये ख्वाहिश जल्द पूरी हो जायेगी ।
इसके बाद बीबी जुलेखा ने दिन रात सूत कातना शुरू कर दिया और उसे मुलाजिमा के हाथों बाजार में फरोख्त कराती रहीं। फिर आप ने उसी सूत से कपड़ा बुना और हजरत निजामुद्दीन औलिया के लिये दस्तार तैयार की।
जाहिर परस्तों की जमाअत शायद इस दस्तार की कीमत का
अंदाजा न कर सके मगर नजर वाले जानते हैं कि वो मामूली सूती कपड़े की दस्तार बहुत
कीमती है। इस दस्तार की तैयारी में उस
मेहबान मां के सब व रोज का खून शामिल था, जिसने अपने अमीरो कबीर बाप की दौलत उस वक्त कुबूल नहीं किया
था जब उसने बेवगी की कुबा पहनीं थी, फिर वो हलाल रोजी, परहेजगार हाथों की मजदूरी, गर्ज उन ही तमाम चीजों
ने मिलकर उस सूती कपड़े की दस्तार को ताज शाही से भी ज्यादा गिरां कदर बना दिया
।
फिर हजरत निजामुद्दीन औलिया की जिंदगी का वो यादगार दिन भी
आया जब आप ने फिक्हा हन्फी की इस अजीम किताब को खत्म कर लिया। उसके बाद बीबी
जुलेखा ने खाना तैयार करवाया और बदायूं के जलीलुल कद्र उलेमा को दावत दी।
जब बदायूं के मुमताज उलेमा जमा हो चुके तो हजरत निजामुद्दीन औलिया, हजरत ख्वाजा अली के हमराह मजलिस में दाखिल हुये और हजरत बीबी जुलेखा की तरफ से पहले मेहमानों को खाना खिलाया गया।
इस सिलसिले में एक रिवायत ये भी है कि हजरत जुलेखा ने सूत कात कर जो रकम जमा की थी, वो कम थी और मेहमान नवाजी के इखराजात ज्याद थे।
हजरत निजामुद्दीन औलिया
ने ये रकम अपने उस्ताद गिरामी मौलाना अलाउद्दीन उसूली के सामने रख दी और अपनी
आजजी का इजहार किया ये चंद सिक्के भी हजार दुश्वारियों के बावजूद जाम हुये हैं ।
तुम क्यों पेरशान होते हो सैयद मोहम्मद मौलाना अलउद्दीन उसूली ने अपने शागिर्द -ए-खास की
तालीफ क़ल्ब के लिये फरमाया और जितनी रकम बीबी जुलेखा ने जमा की थी , अपने पास से उतनी ही रकम उसमें मिला दी।
खाने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने वालिदा मोहर्तमा की
तैयार की हुई दस्तार मौलाना अलाउद्दीन के उसूली के सामने रख दी। मौलाना उसूली ने
दस्तार का एक सिरा अपने हाथ में रखा और दूसरा हजरत निजामुद्दीन औलिया के सर पर रखा फिर हजरत ख्वाजा अली की तरफ
देखते हुये फरमाया’’ इजाजत है?
आप सैयद मोहम्मद के उस्ताद हैं।
हजरत ख्वाजा अली ने
फरमाया आप को किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं ।
मगर मैं आपकी इजाजत की जरूरत महसूस करता हूं। मौलाना
अलाउद्दीन उसूली ने फरमाया ।
तो फिर ‘ बिस्मिल्लाह कीजिये’ हजरत ख्वाजा ने हाथ का इशारा किया ‘ अल्लाह बरकत देगा’।
हजरत ख्वाजा अली के इरशाद गिरामी के बाद मौलाना अलाउद्दीन उसूली ने अपने शागिर्द
के सर पर दस्तार बांधनी शुरू कर दी। हाजिरीन मज्लिस ने इस रूहानी मज्लिस में बड़ा
जां अफ्जा मंजर देखा जमाना हाल का आलिम
मुस्तकबिल के आलिम को अपने इल्म की अमानत मुन्तकिल कर रहा था।
दस्तार बन्दी के बाद मौलाना अलाउद्दीन उसूली ने हजरत ख्वाजा
मौलाना अली से दुआ की दरख्वास्त की।
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