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Showing posts from September, 2020
                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-28

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-28 तुम्‍हारी इस मोहब्‍बत का शुक्रिया तुमने दरवेशों का इस कदर ख्‍याल रखा हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया मगर इस फकीर को इस बड़ी रकम की जरूरत नहीं है । खिलजी अमीर का चेहरा उतर गया हजरत महबूब इलाही ने इस तरीके से एक मालदार के ख्‍याल को गलत साबित कर दिया दरवेश जरूरतमंद होते हैं और खास व आम की हदिये कुबूल फरमा लेंते हैं । ये रकम जरूरतमंदों तक पहुंचा दो कि वो मुझसे ज्‍यादा तुम्‍हारी मदद के हकदार हैं खिलजी अमीर को खामोश पाकर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया एक मालदार का महल आन की आन में ढह गया खिलजी ने दरवेश का ये अंदाज देखा दिल पर चोट लगी थी गिड़गिड़ाने लगा   शेख मुझे इस तरह नाकाम न नामुराद वापस न लौटाएं । भाई अपना रास्‍ता लो क्‍यों इस दरवेश का वक्‍त बर्बाद करते हो ? हजरत महबूब इलाही ने बेजारी के साथ फरमाया मुझे और भी जरूरी काम हैं। दरअसल वो खिलजी अमीर दौलत को दिखा रहा था और दरवेशों को बड़ी रकम देकर अपनी अना को पूरा करना चहता था हजरत महबूब इलाही पर कश्‍प के जरीये खिलजी अमीर की नियत जाहिर हो   चुकी थी इसीलिये आप उसकी नजर कुबूल करने से बच...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-27

 हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-27 जब हजरत निजामुद्दीन औलिया देग लेकर उस दरवेश के करीब पहुंचे तो वो भूख की शिद्दत   से इस कदर परेशान हुआ कि उसने उबलते हुए पानी में बे झिझक अपना हाथ डाल दिया हजरत महबूब इलाही उसे मना करते रहे मगर दरवेश बार बार देग में हाथ डालता और फिर जौ के आटे को मुंह में रख लेता गुदड़ीपोश ने ये अमल तीन बार दोहराया   फिर उसने देग को जमीन पर मार दिया वो देग दरअसल मिट्टी का मटका थी    जो जमीन पर गिरते ही टूट गई । हजरत निजामुद्दीन औलिया निहायत सब्र सुकून से दरवेश की इस इज्तिरारी हरकत को देखते रहे   मगर मौलाना कमालुद्दीन याकूब खामोश न रह सके। मेहमान तुमने ये क्‍या किया ? मौलाना के लहजे से तल्‍खी का रंग साफ था तुम्‍हे मालूम है कि इस पानी जैसी   गिजा से  खुदा के बंदे  भी रोजा खोल सकते थे अफसोस तुमने दूसरों की भूख को नजर अंदाज कर दिया तुम नहीं जानते ये दरवेशाने खुदा मस्‍त कितने दिन के फाके से हैं। मैं अल्‍लाह के हुक्‍म से ये बात जानता था मगर क्‍या करता मेरे लिये अल्‍लाह का यही हुक्‍म था दरवेश  बे नियाजी के आलम में बोल रह...

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-26

हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-26 वो अपनी जाहिरी हालत से कोई मस्‍त  मालूम होता था मौलाना कमालुद्दीन याकूब जिस मंजिल के मुसाफिर थे , वो  होश की मंजिल थी वहां किसी मस्‍ती को दखल नहीं था मौलाना ने गुदड़ीपोश को एक नजर देखा और उठकर हजरत निजामुद्दीन औलिया की बारगाह  में हाजिर हुए हजरत महबूब इलाही उस वक्‍त कुछ पढ़ रहे थे मौलाना कमालुद्दीन याकूब को अपने सामने हाथ बांधे खड़े देखकर आपने उनसे आने की बजह पूछी। एक मर्द दरवेश बहुत भूखा है मौलाना कमालुद्दीन याकूब ने अर्ज किया अंदाजा होता है कि वो यहां से कुछ खाए-पीए  बगैर नहीं जायेगा। मौलाना उसमें आपको क्‍या एतराज है ? हजरत निजामुद्दीन औलिया ने एक आरिफाना तबस्‍सुम के साथ फरमाया इसमें तो उस दरवेश का हिस्‍सा भी शामिल है , हम तो महज मुंतजिम हैं। मख्‍लूक खुदा को खिलाने के लिये ही बैठे हैं दरवेश से भी कह दो अभी खाना पक रहा है जैसे ही तैयार होगा , सबसे पहले उसकी खिदमत में पेश किया जायेगा ।   पीरो मुर्शिद का हुक्‍म सुनकर मौलाना कमालुद्दीन याकूब वापस तश्‍रीफ ले गये और अजनबी दरवेश के सामने महबूब इलाही के अल्‍फाज दोहरा दिये । ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-25

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-25 सुल्‍तान जलालुद्दीन खिलजी का अतिया शुक्रिया के साथ लौटा दिया गया और अब फिर गयासपुर के दरवेशों की खानकाह में चार वक्‍त का फाका था हजरत निजामुद्दीन औलिया ममनूअ दिनों के अलावा हमेशा रोजा रखते थे अगर गिजा आ जाती तो एक रोटी से अफ्तार कर लेते और एक रोटी से सहरी का एहतमिमा करते कुल दो रोटियां आपकी खुराक थीं अक्‍सर रिवायतों में दर्ज है कि हजरत महबूब इलाही ने   कई सालों तक   नमक के पानी से जो की रोटी इस्‍तेमाल की यानी लज्‍जत से आप इतनी दूर थे जितने कि जमीन और आसमान है। गयासपुर में एक बूढ़ी औरत हजरत निजामुद्दीन औलिया की पड़ोसी थी और आपसे बेहद अकीदत रखती थी उस बूढ़ी औरत का काम ये था सुबह से शाम तक रस्‍सी बनाती और फिर दूसरे दिन करीब की आबादी में जाकर रस्‍सी बेंच देती फिर चार पैसे जो हासिल होते उनसे जो का आटा और थोड़ी सी तरकारी खरीद लाती उसके बाद चंद रोटीयां पकाकर महबूब इलाही की खिदमत में पेश कर...