जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्ते में बहुत ज्यादा मुस्किलें पैदा हो ...
हिंदुस्तान की पुरानी तारीख
जहां हम सब रह्ते हैं ये हिंदुस्तान कहलाता है ये मुल्क कश्मीर से रसकुमारी तक और पंजाब से असम तक लाखों मुरब्बा मील के रकबे में फैला हुआ है। ये बहुत पुराना मुल्क है हजारों बरस से यहाँ आबादी है बहुत पहले के हालात तो अच्छे तरह से मालूम नहीं है अलबत्ता इधर उधर की खोज से पता चलता है कि शुरू -शुरू में यहाँ लोग पत्तों से बदन ढाँकते थे| गारों में या दरख्तों के पत्तों से बदन ढांकते थे कभी कभी पत्थर के हरियारों से जानवरों का शिकार कर लिया करते थे इसी से अपना पेट भरते थे आगे चलकर दूसरी धातों का पता चला मिट्टी के बर्तन बनने लगे और घर बार की बुनियाद पड़ी तो बहार के लोग आने लगे
उस ज़माने के हालात अच्छी तरह लिखे तो मिलते नही वैसे ही लोगों का अंदाजा है की हजरत ईसा से चार हजार बरस पहले यानि आज से तक़रीबन साढ़े चार हजार बरस पहले आर्या कोम के लोग और लड़ -झागढ कर सरे मुल्क पर छा गए , उन लोगों ने खेती बाड़ी के काम को आगे बढ़ाया दूसरे धंधे शुरू किये और गांव आबाद होने लगे इसी ज़माने में वेद लिखे गए जो आज तक मौजूद है आगे चलकर उन लोगों ने बड़ी -बड़ी बादशहतें कायम की जिन में अयोध्या के राजा रामचंद्र और इंद्रप्रश्त के कोरो -पांडव का नाम बहुत मशहूर है रामायण और महाभारत में उनके हालात बड़े जोर और फैलाओ से बयान किये गए हैं लेकिन तारीख से जयादा इन पर किस्सेकहानी का रंग चढ़ गया

सिकंदर आजम

सिकंदर आजम
उन किस्सों के सैकड़ों बरस बाद हिंदुस्तान की तरफ और लोग भी बडे सिकंदर का नाम तो तुमने सुना होगा हजरत ईसा से तीन सौ छब्बीस बरस पहले उसने हिंदुस्तान पर चढाई की पंजाब के राजा पोरस ने मुकाबला किया मगर शिकस्त खाई सिकंदर आगे बढना चाहता था मगर उसके सिपहियों ने जवाब दे दिया मजबूरन बापस हुआ और बाबुल पहुंच कर मर गया।
चन्द्रगुप्त मौर्य
सिकंदर के बाद यहाँ मोर्या ख़ानदान का जोर हुआ और पाटली पुत्र (पटना) मैं चन्द्रगुप्त और उसकी ओलाद ने ब
ड़े तनतने की हुकूमत की उस ख़ानदान के राजा अशोक ने बड़ा नाम पैदा किया काबुल से बंगाल और कश्मीर से दकन उसका डंका बजता था अशोक ने बुद्ध मजहब की बड़ी खिदमत की और बहुत दूर तक उसे फैलाया अशोक के हुक्म आज तक पथरों की लाटों पर खुदे मिलते हैं।
अशोक के बाद ये खानदान कमजोर होता गया आखिर हजरत ईसा से एक सौ पिच्यासी बरस पहले बिलकुल खत्म हो गया और वजीर मित्र और उसकी औलाद का राज शुरू किया इसके कनु और इन्द्र की हुकूमत रही फिर यूनानियों और तातारियों का हमला हुआ आखिर सन 50 ईसवी, किशान खानदान के हाथ में हुकूमत आई इस खानदान में राजा कनषक ने बड़ा नाम पाया पष्पपुर (पेशावर ) उसकी राजधानी थी ये भी बुद्ध मजहब का बड़ा मोतक़िद था। उसके बाद छोटे बड़े राजाओं का जोर ज्यादा हो गया और आपस में मुल्क बाँट लिया गया.
राजा विक्रमाजीत
आखिर 320 ईसवी के करीब पाटलिपुत्र में एक नए गुप्त खानदान का जोर हुआ राजा विक्रमजीत का नाम तो तुमने सुना होगा वह इसी खानदान का तीसरा बादशा था। 375 ईसवी से 413 ईसवी तक बड़े रोअब -दाब से हुकूमत की संस्कृत का मशहूर शायर इसी ज़माने में था सवा सौ बरस के बाद ये खानदान भी ख़त्म हो गया इसके बाद हुन्न कौम का धावा हुआ
राजा हर्ष
आखिर 606 ईसवी में हर्ष तख्त पर बैठा और फिर एक बार अशोक की याद तजा हो गयी चालीस बरस की मजबूत और शानदार हुकूमत के बाद 647 ईस्वी में हर्ष मर गया और थोड़े ही दिनों में सल्तनत फिर टुकड़े -टुकड़े हो गई। राजपूत सरदारों ने अलग -अलग हुकूमतें कायम कर लीं। फिर उन में चन्द्रगुप्त / अशोक /विक्रमजीत /हर्ष का सा जबरदस्त राजा पैदा न हुआ।
राजा भोज
नवीं सदी के शुरू में कन्नौज के राजा भोज ने शोहरत हासिल की लेकिन तीस-चालीस बरस में ये किस्सा भी ख़तम हो गया और वहीँ अलग-अलग राजा आपस में उलझने लगे।
ये लोग इसी हाल में थे की मुसलमानों की आमदो -रफ्त हिंदुस्तान के उन शहरों में जो समंदर के किनारे थे होने लगी।
नोट - ये कहानी "हिदुस्तान की कहानी "उर्दू पुस्तक का अनुवाद है।
ये लोग इसी हाल में थे की मुसलमानों की आमदो -रफ्त हिंदुस्तान के उन शहरों में जो समंदर के किनारे थे होने लगी।
नोट - ये कहानी "हिदुस्तान की कहानी "उर्दू पुस्तक का अनुवाद है।




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