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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

MARHATE

मराठे 
वारिन हेस्टिंगेज 

(1181 हिजरी )(1767 ईस्वी ) में किलायू वापस इंग्लिस्तान  गया इसके बाद चार -पांच बरस वार्लिस्ट और कॉलेटर ने क़ायम मुक़ामी की आखिर (1886 हिजरी )(1772 ईस्वी ) में वारिन हेस्टंगगेज बंगाल का गवर्नर हुआ  जिसे (1188 हिजरी )(1774 ईस्वी ) में तरक़्क़ी देकर गवर्नर जनरल कर दिया गया ये भी कलाइयू  की तरह अंग्रेजी हुकूमत का बानी समझा जाता है उसके ज़माने में मराठों  से भी लड़ाई शुरू हो गई मराठों  की फौजी जिंदगी बीजपुर अहमद नगर से शुरू होती है शिवाजी के ज़माने में ये रंग और तेज हुआ लेकिन औरंगजेब की क़ुव्वत के सामने कामयाबी न हो सकी शिवाजी के बाद उसका लड़का संभा बाप का बारिस हुआ (1090 हिजरी )(1679 ईस्वी ) में लेकिन जल्दी ही गिरफ्तार हो कर मारा गया.संभा के बाद उसका लड़का साहू शाही अमीरों में शामिल कर लिया गया और औरगंजेब के दरबार में रहने लगा।
संभा जी
आगे चलकर यही साहू मुगलों की निगरानी में मराठों  का सरदार हुआ जैसे -जैसे मुग़ल कमजोर होते गए मराठों  की ताक़त बढ़ती गई यहां तक की वो सारे हिंदुस्तान की बादशाहत का  खुआब देखने लगे और अगर दरमियान में अहमद शाह अब्दाली से लड़ाई न हो जाती तो इस ख्याल को पूरा होने में कोई कसर नहीं रह गई   थी लेकिन (1174 हिजरी )(1761 ईस्वी ) में पानीपत की लड़ाई ने इनकी क़ुव्वत कुछ दिनों के लिए चूर -चूर कर दी मगर मराठों  में फिर जल्दी संभाला लिया और चंद ही बरस बाद उनके सवार इधर -उधर गस्त करने लगे लेकिन शिवाजी का खानदान ज्यादा दिन नहीं  चल सका बल्कि पानीपत की इस जंग से पहले ही हुकूमत से बे दखल  हो गया खुद साहू जी की जिंदगी में पेशवा और वजीरों ने अपना असर जमा लिया था बाद को उनका पूरा कब्ज़ा हो गया  पेशवा का ये रंग देखकर छोटे सरदारों को भी फ़िक्र हुई और मौके -मौके से  गायकुआढ़  (बड़ोदरा) सिंधिया(ग्वालियर )   होल्कर (इंदौर ) भोंसले (नागपुर ) ने अपनी अपनी हुकूमत क़ायम कर लीं  पेशवा का असर सिर्फ नाम के लिए रह गया.
रघुनाथ राव रघुवा
यही हालात थे जब अंग्रेजों से मुड -भेढ़  शुरू हुई पेशवा के खानदानी झगड़ों में लड़ाई का सामान  किया (1186 हिजरी  )(1772 ईस्वी ) में पांचवे पेशवा माधवराव के कत्ल पर विरासत का झगड़ा हुआ,    चाचा रघुनाथ राव रघोबा ने तख़्त पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन   नाना फडणवीस और दूसरे मरहटे  सरदार नरायन राव के छोटे बेटे माधव राव  को गद्दी पर बैठाना चाहते थे , ये देखकर रघुवा ने अग्रेजों से मदद मांगी ( 1189 हिजरी )(1779 ईस्वी)  अब लड़ाई ने एक नया रंग इख्तयार कर लिया और मराठों  के आपस के झगड़ों से अंग्रेजों को क़दम बढ़ाने का मौक़ा मिला आखिर पांच-सात बरस की जंग के बाद सालबाई के सुलह नामे पर   दस्तखत हुए ,(1196 हिरजी )(1782 ईस्वी ) पूना की पेशवाई हुकूमत ने रघूबा के लिए तीन लाख सालाना पेंशन मुक़र्रर की और मरहटों के साथ अग्रेजों का मुस्तक़िल ताल्लुक़ क़ायम हो गया।
नाना फडणवीस

इस वाक़्ये के बाद बीस बरस तक कोई छेड़ -छाड़  नहीं हुई (1210  हिजरी )(1795 ईस्वी ) में पेशवा माधवराव और रानी अहलिया बाई के इन्तिक़ाल (1215 हिजरी )(1800 ईस्वी )में नाना फडणवीस की मौत फिर मराठों  में गरमा -गर्मी पैदा कर दी , सिंधिया और होल्कर में लड़ाई ठनी इस जंग में पेशवा बाजीराव सिंधिया के साथ था लेकिन फिर कभी कामयाबी नहीं हो सकी होल्कर ने पूना पर कब्ज़ा कर लिया आखिर बाजीराव अंग्रेजों के मदद से पूना पहुंचा  उस हरकत से मरहटे  सरदार बहुत बिगड़े  और सब ने  मिलकर चढ़ाई कर दी मगर अंग्रेजी फौजों  ने शिकस्त दी अब सिंधिया और भोंसले को  भी अग्रेजों की मा तहति क़ुबूल करनी पड़ी होल्कर ने अलबत्ता कुछ दम-ख़म दिखाया  मगर आखिर  (1220हिजरी )(1805 ईस्वी ) में उसे भी झुकना पड़ा।
पेशवा माधव राव
इसके 12 बरस के करीब सुलह रही (1232 हिजरी )(1817 ईस्वी में मराठों  ने फिर संभाला लिया लेकिन बरस ही दो बरस में सबको हार माननी पड़ी ,बाजी राव की 8 लाख सालाना पेंशन मुक़र्रर कर दी गयी और पेशवाई हुकूमत का खात्मा हमेशा के लिए हो गया  (  1232 हिजरी )(1818 ईस्वी) भोंसले राज (नागपुर ) (1269 हिजरी )( 1853 ईस्वी )में ख़त्म हुआ  आखरी राजा के कोई औलाद न थी इसलिए नोट - ये कहानी "हिदुस्तान  की कहानी "उर्दू पुस्तक का अनुवाद है।लार्ड डलहौजी के ज़माने में ये इलाक़ा अंग्रेजों की सल्तनत में शामिल कर लिया गया  गया इस तरह अब मराठों में सिर्फ  ग्वालियर , बड़ोदरा , और  इंदौर  में सिंधिया , गायकवाड़ ,होल्कर ,के खानदान बाक़ी रह गए लेकिन अब तमाम रियासतों की तरह इनकी रियासतें  भी जम्हूरिया हिन्द में शामिल कर ली गईं  और दूसरे राजाओं और नवाबों की तरह इन लोगों को भी गुजारा मिलता है।
रानी अहिल्या बाई
 



नोट - ये कहानी "हिदुस्तान  की कहानी "उर्दू पुस्तक का अनुवाद है।


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