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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

AAZAD HINDUSTAN

लड़ाई का खात्मा और आज़ाद हिंदुस्तान 





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महात्मा गाँधी -प. नेहरू - मौलाना आज़ाद 

अप्रैल (1945 ईस्वी ) में जर्मनी को शिकस्त हुई इटली पहले ही हर चूका था (1945 ईस्वी ) में जापान ने भी अमेरिका के एटम बम के सामने हथियार डाल दिए और इसी तरह कई बरस की खूंरेजी के बाद दूसरी लड़ाई भी ख़त्म हो गई अंग्रेज लड़ाई जीत तो गए मगर बे दम हो चुके थे छह साल की जंग ने उन्हें बेहद थका दिया था वो अब किसी दूसरी लड़ाई के लिए तैयार न थे आज़ाद हिन्द फौज का हाल सुन चुके हो उनकी मिसाल दूसरे फौजी जवानों को भी मुतास्सिर  कर रही थी अब अंग्रेजों को ये उम्मीद  न रह गई थी  की हिन्दुस्तानियों को गुलाम बनाये रखने में इनका हुक्म बजा लाते रहेंगे दूसरी तरफ ये नजर आ रहा था की हिंदुस्तानी आज़ादी के मुतालबे से पीछे नहीं हटेंगें (1942 ईस्वी ) की हिंदुस्तान छोड़ दो तहरीक का नतीजा सामने आ रहा था दुनिया के हालत भी आज़ादी के मुआफ़िक थे इसलिए अंग्रेज मजबूर हुए की हिन्दुस्तानियों से सुलह कर लें  गाँधी जी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ,पंडित जवाहर लाल नेहरू ,और दूसरे लीडर जेलों से रिहा किये   गये और सुलह की बात चीत शुरू हुई।
एक अर्से तक बातें होती रहीं वायसराय के अलावा  सर स्टिफर्ड क्रप्स की सारकर्दगी में एक वफद भी हिंदुस्तान भेजा गया हिन्दू मुस्लमान इख्तिलाफ अब भी आज़ादी की राह में रुकावट बन रहा था अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत के ज़माने में इन दोनों क़ौमों को इतना बदज़न  कर दिया था की तरह  तरह के ख्यालात पैदा होते थे आज़ादी की ख्याहिश तो सबको थी मगर आज़ादी के बाद मुल्क का इंतजाम किस तरह हुआ इस पर कोई समझौता न हो पाया था  मुस्लिम लीग ने मुतालबा किया की मुस्लिम अक्सरियत के इलाक़ो को हिंदुस्तान से अलग करके पाकिस्तान के नाम से एक सल्तनत  बनाई जाय कांग्रेस की ख्वाहिश थी की मुल्क का बटवारा न हो आज़ादी में हिस्सा लेने वाले  बहुत से मुस्लमान रहनुमाओं का यही ख्याल था वो समझते थे तक़सीम से लोगों को बेहद नुकसान होगा और ऐसी उलझनें पैदा हो जांएगी  की इन्हें संम्भालने में उम्रें सर्फ़ हो जाएँगी मौलाना अबुलकलाम   आज़ाद ने खास तौर से ये कोशिश की की मुल्क का बंटवारा न हो और हिंदुस्तान में वफकी तर्ज की हुकूमत बनाई जय जिसमे सूबे अपने मामलात में   में खुद मुख़्तार हों और मर्कजी हुकूमत के सुपुर्द दो ही काम हों  जिनका सारे मुल्क से ताल्लुक हो वर्तानवी वफ्द सर स्टिफर्ड करप्स और उनके साथी भी इस पर राजी थे मुस्लिम लीग को मुत्मइन करने के लिए उन्होंने  C.B.A.  के नाम से सूबों को तीन गुरुप  में तक़सीम किया उन गुरुपों को भी इख़्तियार था की वो वफ़ाक़ से अलग होना चाहें  तो अलग हो सकते हैं।
ये ग्रुप बंदी मुसलमानो के लिए बहुत मुफीद थी इसलिए उम्मीद थी की मुस्लिम लीग भी इसपर राजी होजायगी और मुल्क तक़सीम की मुसीबत से बच जायगा मगर अंग्रेजी हुकूमत ने नव्वे बरस तक  इख्तिलाफ के बीज दिल में बोए थे उनकींजड़ें  किसी तरह न कट सकीं भरोसे की जगह नए नए शक पैदा होने लगे जब मुल्क को मुत्तहिद रखने की कोशिश नाकाम  हो गई तो कांग्रेस भी मुल्क के बंटवारे के लिए राजी हो गई  इस तरह मुल्क अज़ाद तो हो गया पर दो हिस्सों में बंट गया और पाकिस्तान के नाम से मगरिबी पंजाब , सिंध ,बलूचिस्तान , सरहद , मशरिक़ी बंगाल की एक अलहदा सलतनत बन गई। 


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