हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-35
खिजर खान और शादी खान के मुरीद हो जाने के बाद सुल्तान के ख्वाब
की ताबीर बरआमद होने का इमकान नजर आने लगा
था मगर ये ख्वाब उस वक्त हमेशा के लिये टूट गया जब हजरत महबूब इलाही ने सख्त
अल्फाज में मुलाकात से इंकार कर दिया ।
इस वाक्ये की तफ्सील ये कि सुल्तान अलउद्दीन खिलजी ने
हजरत निजामुद्दीन औलिया को मुसलसल कई
खुतूत लिखे जिन मे हाजिरी के लिये इंतिहाई आजिजाना दरख्वास्त की गई थी हजरत
महबूब इलाही ने कुछ दिनों तक सुकूत इख्तियार किया जब सुल्तान की इल्तिजाएं
हद से बढ़ गईं तो आपने एक खत के जवाब में तहरीर फरमाया सुल्तान इस फकीर के
घर के दो दरवोजे हैं अगर फरमांरवा-ए- हिंद एक दरवाजे से दाखिल होगा तो फकीर दूसरे
दरवाजे से बाहर निकल जाएगा
कुछ रिवायात से पता चलता है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया के इस जवाब के बाद सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने अपने कई मसाहिबीन से मशवरा किया था कि वो आखिर किस तरह हजरत निजामुद्दीन औलिया के नियाज हासिल कर सकता है सुल्तान के इस सवाल का जवाब में मसाहिबीन ने वाली-ए-हिंदुस्तान को बताया था कि हजरत अमीर खुसरू , हजरत निजामुद्दीन औलिया के चहेते मुरीद हैं।
अगर वो किसी मौके पर हजरत महबूब इलाही से अर्ज करें तो उस मुलाकात का इंतिजाम हो
सकता है अलाउद्दीन खिलजी के किरदार में कई खामियां नुमायां सही मगर बुजुर्गान-ए- दीन
से उसकी अकीदत की एक मिसाल दर्जा रखती थी।
आखिर इसी अकीदत ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को मजबूर किया
था कि वो हजरत महबूब इलाही के मुरीद खास हजरत अमीर खुसरू से राब्ता कायम करे फिर
एक दिन ऐसा ही हुआ अलाउद्दीन खिलजी ने हजरत अमीर खुसरू से कहा खुसरू अब मुझे यकीन
हो गया है शेख निजामुद्दीन मुझसे मिलना पसंद नहीं करते मैं ने सुना है के तुम शेख
के बहुत करीब हो, इस लिये मेरी शिफारिश कर दो मैं सिर्फ एक बार हजरत की दस्तबोसी से
सरफराज होना चाहता हूं।
ये मकाम-ए-फिक्र है जिसकी बारगाह मे बड़े से बड़ा
अमीर भी सिफारिश करते हुए घबरा जाता था , आज वो खुद अपने एक मुलाजिम की सिफारिश का मोहताज था इस वाक्ये
से अगर एक तरफ हजरत निजामुद्दीन औलिया का जबरूत रूहानी जाहिर होता है तो दूसरी तरफ
अलाउद्दीन खिलजी की नियाजमंदी भी झलकती है।
अमीर खुसरू बहुत देर तक खामोश रहे मगर जब सुल्तान ने कई
बार इसरार किया तो कहने लगे मैं सुल्तान से वादा नहीं कर सकता मगर हुजूर शेख्
अर्ज हाल जरूर बयान कर दूंगा शायद आपकी दिली मुराद पूरी हो जाय ।
फिर जब एक दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया किसी बात पर मुस्कुरा
रहे थे तो हजरत अमीर खुसरू ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की अर्ज दाश्त पेश कर दी सैयदी
सुल्तान हाजिरी के लिये बहुत बे करार है, उसे बस एक बार शर्फयाबी बख्श दीजिए।
हजरत महबूब इलाही बहुत देर तक हजरत अमीर खुसरू की इस दरख्वास्त पर गौर करते रहे, फिर निहायत शफकत आमेज लहजे में फरमाया तुर्क तुम ,खूब जानते कि मैं तुम्हें कितना अजीज रखता हूं मगर शाहों से मुलाकात करना मेरा मिजाज नहीं आइंदा तुम इस सिलसिले में मोहतात रहना और किसी फरमांरवा की सिफारिश न करना उन लोगों का रास्ता अलग है और मेरा मस्लक अलग, अगर मैं एक बार सुल्तान को यहां आने की इजाजत दे दूं तो फिर दरवेशों की खानकाहों में शहंशाहों की आमद एक रस्म बन जाएगी और मैं इस रस्म को जिंदा करना नहीं चाहता कुछ सुल्तान की अकीदत और कुछ तुम्हारी मोहब्बत, इन दोनों चीजों ने मुझे मजबूर कर दिया है कि में अलाउद्दीन के लिये दुआ करता रहूं सुल्तान से कह दो कि उसकी जिम्मेदारियां मुझसे ज्यादा हैं।
वो बंदगाने खुदा के हुकूक की हिफाजत करे
और अपनी रियाया के सरों पर सुकून व आफियत का सायबान कायम रखे , मामलात दुनिया में पूरे पूरे इंसाफ से काम ले और जहां तक मेरी दुआओं का
तआल्लुक है तो जब तक सुल्तान उनका तलबगार रहेगा उसके हक में जारी रहेंगी ये
आखिरी मौका था जिसमे वाजेह हो गया था कि हजरत निजामुद्दीन औलिया और सुल्तान
अलाउद्दीन खिलजी के दरमियान बिलमुशाफा या
गुफ्तगू का इमकान मौजूद नहीं ।
इस वाक्ये के बाद अलाउद्दीन बहुत मायूस हुआ सुल्तान के
मसाहिबीन खास का ख्याल था कि हजरत महबूब इलाही के इस इंकार के बाद वाली हिंदुस्तान
अपने इरादे से बाज आ जाएगा मगर किसे मालूम था कि अलाउद्दीन गयासपुर से दरवेश की
खानकाह में हाजिर होने के लिये कुछ और ही मंसूबे बना रहा है इस मंसूबे की तफ्सीलात
ये है कि एक दिन फरमांरवाए हिंद ने हजरत अमीर खुसरू को खलवत में तलब करते हुए कहा
खुसरू मैं हजरत से इल्तिजा करते करते थक गया अब मुलाकात का एक ही तरीका
रह गया है कि मैं हजरत निजामुद्दीन औलिया की इजाजत के बगैर खानकाह में हाजिर हो जाऊं और अपने शौक बे पनाह की तकमील करूं ।
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