हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-36
हजरत अमीर
खुसरू ने जवाब में फरमाया मैं सुल्तान मुअज्जम की परेशानी को समझता हूं और उसके
साथ ही आदाब-ए- खानकाही से भी वाकिफ हूं दरबार शाही के कवानीन और है.... मज्लिस-ए- सूफिया के उसूल कुछ और है..... मेरी गुजारिश है कि आप हजरत शेख की मर्जी के खिलाफ
खानकाह तशरीफ न ले जाएं।
हजरत अमीर
खुसरू ने बहुत एहतियात से सुल्तान को रोकने की कोशिश की मगर वाली-ए- हिंदुस्तान ने
हजरत अमीर खुसरू की गुफ्तगू को एक दरबारी शायरी का जज्बाती तजजिया समझा नतीजतन
अलाउद्दीन खिलजी ने साफ साफ कह दिया कि वो कल किसी वक्त हजरत निजामुद्दीन औलिया
की खिदमत में हाजिरी देगा।
ये हजरत अमीर
खुसरू के लिये बड़ा लम्हा फिक्र था अगर आप सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को हजरत
महबूब इलाही की इजाजत के बगैर खानकाह में जाने देते तो शेेेेख की नाराजगी का अंदेशा था और
अगर सुल्तान के इरादों से पीरो मुर्शिद को वक्त से पहले खबरदार करते तो फिर शाही
इताब नाजिल होने का खतरा था हजरत अमीर खुसरू दिन भर इसी कशमकश में मुब्तिला रहे
फिर जब दरबार शाही बरख्वास्त हुआ तो हजरत अमीर खुसरू पीरो मुर्शिद के जनाब में
हाजिर हुए इस दौरान आप एक नतीजे पर पहुंच चुके थे।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अमीर खुसरू को अफसुर्दा देखा तो बे करार हो गये तुर्क एसी
कौनसी जहनी कशमकश है जिसने तुम्हारे चेहरे का रंग ही बदल दिया ? हजरत महबूब इलाही ने अपने चहेते मुरीद की
दिलदारी करते हुए फरमाया।
जवाब में हजरत
अमीर खुसरू ने सुल्तान अलाउद्दीन के हवाले से पेश आने वाला पूरा वाक्या तफ्सील
के साथ बयान कर दिया हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमारवा-ए- हिंद की जिद का हाल सुनकर अमीर खुसरू से पूछा तुम मुझसे इस बात को पोशिदा भी रख सकते फिर तुमने एसा क्यों
नहीं किया खुसरू ?
अमीर खुसरू ने
हजरत निजामुद्दीन औलिया के सामने सर झुका
दिया सैयदी ये गुलाम, कोई बात आपसे किस तरह पोशीदा रख सकता मैं किसी की खुशी को आपकी न खुशी पर
तरजीह नहीं दे सकता, चाहे वो सुल्तान ही क्यों न हो ।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अमीर खुसरू के इस जवाब पर इजहार मसर्रत फरमाया और उसी वक्त
अपने पीरो मुर्शिद हजरत बाबा फरीद उद्दीन गंज शकर के मजार मुबारक पर हाजिरी देने
के लिये अजोधन (पाक पटन) रवाना हो गये ।
दूसरे दिन जब
अलाउद्दीन खिलजी को मालूम हुआ कि हजरत महबूब इलाही इसी रात देहली से अजोधन तशरीफ
ले गये तो वो हैरतजदा रह गया फिर सुल्तान ने हजरत अमीर खुसरू को तन्हाई में तलब
करके अपने तअज्जुब का इजहार करते हुए कहा, खुसरू मैं नही जानता कि हजरत शेख को मेरे
मंसूबे की खबर किसी तरह हो गई?
हजरत अमीर
खुसरू गलत बयानी से काम लेते हुए मस्लहत के तौर पर कह सकते थे कि हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अपने कश्फ की कुव्वत से सुल्तान के इरादे को जान लिया और
फिर इस मुलाकात से बचने के लिये अजोधन तशरीफ ले गये मगर ये अकीदत का इम्तिहान भी
था और राह-ए- सुलूक का तकाजा भी कि हजरत अमीर खुसरू ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के
सामने साफ अल्फाज में फरमाया मैंने पीरो मुर्शिद को आपके इरादे के बारे में बताया
था।
सुल्तान
अलाउद्दीन खिलजी चंद लम्हों के लिये दम ब खुद रह गया फिर उसकी ये हैरत गुस्से में बदल गई खुसरू तुम्हें खबर है कि तुमने मुझे किस कदर नुकसान पहुंचाया
मैं सिर्फ तुम्हारी वजह से हजरत शेख के दीदार के शर्फ से महरूम हो गया।
सुल्तान अलाउद्दीन के बारे में मश्हूर है कि एक बार फैसला कर लेने के बाद उसे तबदील नहीं करता था और अगर वो एक बार किसी से नाराज हो जाता था तो फिर उसे किसी हाल में उसके दिल की कदूरत खत्म नहीं होती थी हजरत अमीर खुसरू भी फरमारावा-ए- हिंद की इस मिजाजी कैफियत से वाकिफ थे लेकिन जब हजरत महबूब इलाही की निस्बत से सुल्तान ने गुफ्तगू की तो आपने तमाम मस्लहतों को बाला ताक रखते हुए फरमाया सुल्तान जी चश्म मैं आपकी बरहमी से बे खबर नहीं था।
और खुसरू तुम
ये भी जानते हो कि हमारे गुस्सेे का अंजाम बहुत सख्त होता है सुल्तान अलाउद्दीन
ने इसी नाराजगी के आलम में कहा।
इससे ज्याद
और क्या होगा सुल्तान मुझे इस खिदमत से सबकदोश कर देंगे हजरत अमीर खुसरू ने हर
खौफ व खतर से बे नियाज होकर फरमाया और ये भी हो सकता है कि मुझे हवाला जंदान कर
दिया जाए ।
इन सजाओं के
अलावा और भी सजाएं हैं सुल्तान अलाउद्दीन ने हजरत अमीर खुसरू की वजाहत के जवाब
में कहा।
मौत की सजा से
ज्यादा अजियतनाक कोई सजा नहीं हो सकती हजरत अमीर खुसरू ने एहतराम शाही को मलहूज
रखते हुए कहा मेरे नजदीक बदशाह या सरबराह हुकूमत की नाराजगी का इंतिहाई नतीजा ये
है कि मैं कत्ल कर दिया जाऊं और जिंदगी से महरूम हो जाऊं मगर पीरो मुर्शिद की
नाराजगी से आखिरत खराब होने का खतरा है मैं ये तो बर्दाश्त कर सकता हूं कि
फरमारवाए हिंद मुझसे नाराज हो जाएं और अपनी खफगी का तास्सुर कायम करने के लिये इस
खादिम को तह तेग करा दें मुझे पीरो मुर्शिद के चेहरे मुबारक पर हल्का सा मलाल भी
गवारा नहीं कि उनकी ना खुशी मेरी आखिरत की तबाही का सबब बन सकती है बस यही वो सूरत
हाल थी जिसने मुझे अफशाए राज की तरगीब दी दरअसल में जान के मुकाबले में अपनी
आखिरत बचाना चाहता था अल्लाह का शुक्र है कि मेरी आखिरत सलामत रही जान बाकी है
अगर आप पसंद करें तो अपनी ना फरमानी के जुर्म मे मेरी जान भी ले सकते हैं।

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