हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-37
बहुत से
मुअर्रखीन की रिवायत के मुताबिक सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी एक जहीन हुक्मरां था
उसे अमीर खुसरू का जवाब पसंद आया और कुछ देर के लिये उसके दिल में पैदा हो जाने
वाला गुबार साफ हो गया ये एक तारीखी वाक्या है जिसे मुअर्रखीन ने इस की जिहानत से
ताबीर किया है मगर अहले नजर जानते है कि हजरत अमीर खुसरू के जवाब पर सुल्तान का
खामोश रहना, दर पर्दा
हजरत निजामुद्दीन औलिया के जलाल रूहानी के जेरे असर था ये सरीउल गजब हुक्मरां
अपनी मर्जी के खिलाफ कोई बात सुनना गवारा नहीं करता था उसने हजरत अमीर खुसरू की ये
बेबाकी सिर्फ इस लिये बर्दाश्त की कि वो हजरत महबूब इलाही के जलाल रूहानी से डरता
था मुख्तसर ये कि इस वाक्ये के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया और सुल्तान
अलाउद्दीन खिलजी के दरमियान मुलाकात के तमाम इमकानात खत्म हो गये मगर ये बात भी
तय हो गई कि सुल्तान को हजरत महबूब इलाही की दुआओं का साया हासिल है।
हजरत
निजामुद्दीन औलिया की मज्लिस दर्स रोशन थी एक अकीदतमंद अपने गुलाम के साथ हाजिर
हुआ उस गुलाम का नाम मलीह था अकीदतमंद ने शुक्राने के तौर पर हजरत महबूब इलाहीके
सामने अपने गुलाम को आजाद कर दिया आजाद होते ही गुलाम अपनी जगह से बे इखितयार उठा
और हजरत निजामुद्दीन औलिया के कदमों में बैठ कर रोने लगा दुनिया की गुलामी से आजाद
होकर खुश हूं मगर अब आपकी गुलामी की तमन्ना है।
यहां आका और
गुलाम का रिश्ता नहीं सिर्फ मोहब्बत का रिश्ता है ये कहकर हजरत महबूब इलाही ने
गुलाम मलीह को बेयत के शर्फ से सरफराज किया फिर हाजिरीन मज्लिस को मुखातिब करते
हुए फरमाया इस रास्ते में न कोई आका है न कोई गुलाम ये मोहब्बत की दुनिया है इस
दुनिया में जो नेक नियती के साथ दाखिल हुआ, उसका काम बन गया और वो कामयाब ठहरा।
उसके बाद हरजत
निजामुद्दीन औलिया ने ये वाक्या बयान करते हुए फरमाया गजनी में एक बुजुर्ग थे जेरक
नामी एक गुलाम था जो साहिबे सलाहियत था जब उन बुजुर्ग के इंतिकाल का वक्त आया तो तमाम मुरीद जमा हुए और अर्ज किया आपके बाद
सज्जादा नशीनी का एजाज किसे हासिल होगा ?
बुजुर्ग ने अपने गुलाम की तरफ देखा मेरे बाद जेरक मेरा खलीफा होगा।
उन बुजुर्ग के चार लड़के थे जो फितरतन निहायत चालाक थे और साहिबे इख्तियार भी
गुलाम जेरक ने सूरत हाल की नजाकत को महसूस करते हुए अर्ज किया ख्वाजा इरशाद
गिरामी सर आंखों पर मगर आपके शहजादे मुझे सज्जादे(खिलाफत) पर बैठने नहीं देंगे और
हर लम्हा मुझसे दुश्मनी का इजहार करेंगे, मैं बहुत कमजोर इंसान हूं इसलिये
पीरो मुर्शिद मुझे माफ फरमाएं।
जेरक को पशो पेश में मुब्तिला देखकर बुजुर्ग ने फरमाया तुझे इस सिलसिले में
जरा भी खौफजदा नहीं होना चाहिए अगर मेरे बेटे तुझसे फसाद और तकरार करेंगे तो मैं
उनके शर को दफा कर दूंगा।
अलगर्ज जब बुजुर्ग का इंतिकाल हुआ तो उनकी वसीयत के मुताबिक सज्जादे पर जेरक को बैठाया गया खिलाफत का ऐलान होते ही चारों लड़कों ने जेरक के खिलाफ दुश्मनी का
आगाज कर दिया भरी खानकाह में, सैकड़ों मुरीदों के सामने जेरक की तहकीर करने लगे ये
बे हुनर शख्स वालिद मोहर्तम का खलीफा कैसे हो सकता है ? ये तो हमारा गुलाम है और एक गुलाम
की क्या मजाल कि वो सज्जादे पर बैठकर आला
मंसब की तजलील करे।
जेरक कुछ दिनों तक तो शेखजादों का तहकीर आमेज सुलूक बर्दाश्त करता रहा मगर जब
उसे अपनी जान का खतरा लाहिक हो गया तो पीरो मुर्शिद के मजार पर हाजिर होकर अर्ज
करने लगा ख्वाजा आपने इरशाद फरमाया था अगर मेरे लड़के तुझसे मजाहमत करेंगे तो मैं
उनके शर को दफा कर दूंगा अब आप अपना वादा वफा कीजिए कि वो लोग मेरी जिंदगी के दरपे
हैं ये इल्तिजा करके जेरक खानकाह में वापस आ गया ।
अभी चंद रोज भी न गुजरे होंगे कि गजनी के नवाही इलाके पर कुफ्फार के एक लश्कर
ने चढ़ाई कर दी शहर को दुशमन से बचाने के लिये गर्दोनवाह के लोग इस्लामी लश्कर
में शामिल होने लगे उन बुजुर्गों के चारों लड़कों ने भी अपने खदशात पेश कीं और
कुफ्फार से जंग करते हुए शहीद हो गये इस तरह किसी तरह मजाहमत के बगैर शेख के मकाम-ए- खिलाफत जेरक के लिये खाली हो गया ये बुजुर्ग का फैज रूहानी था कि शहादत नसीब हुई
और गुलाम को सज्जदगी ।
सुल्तान अलाउद्दीन की अकीदत और हासिदीन की मुखालिफत से बे नियाज हजरत
निजामुद्दीन औलिया मखलूक-ए- खुदा की इसलाह में मश्गूल थे एक रोज आपकी खानकाह में
सैंकड़ों तालिबान हकीकत जमा थे किसी दरवेश ने अर्ज किया शेख तर्के दुनिया क्या है?
जवाब में हजरत महबूब इलाही ने फरमाया मेरे एक दोस्त ख्वाजा महमूद हैं वो एक
दिन रास्ते में जो रहे थे कि उन्होंने ने एक दरवेश को देखा जो अपनी फकीरी की वजह से फाकाकशी में मुब्तिला था अक्सर औकात भूका रहने की वजह से उसका पेट कमर से जा लगा था
ख्वाजा महमूद ने दरवेश की ये हालत देखकर उसे एक दांग( तांबे का सिक्का) देना
चाहा।
दरवेश ने ख्वाजा महमूद से कहा आज मैं ने कठल ( एक जंगली फल) जी भरके खाया है
और रोजी की तरफ से आज इस्तिगना हासिल कर लिया है, इसलिये ए ख्वाजा मुझे इस सिक्के
की हाजत नहीं,
किसी जरूरतमंद को दे दो।
ये वाक्या सुनाने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया ये है सब्र और ये
किनाअत.... और इसी सब्र व किनाअत को तर्के दुनिया कहते हैं।

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