हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-38
फिर हजरत महबूब इलाही ने हाजिरीन मज्लिस को एक और वाक्या सुनाते हुए फरमाया एक
बुजुर्ग शेख अली थे एक दिन वो अपने घर में दोनों पांव फैलाए खरके की बखियागिरी कर रहे
थे इसी हालत में खलीफा का हाजिब दाखिल हुआ और शेख अली से कहने लगा खलीफा आपसे
मुलाकात के लिये तश्रीफ ला रहे हैं।
शेख अली के रवैये में कोई तब्दीली नहीं आई वो इसी तरह अपने पांव फैलाये खरका
सीते रहे हाजिब ने कई बार खलीफा के आने की अत्तिला दी मगर शेख अली ने नजर उठाकर भी
नहीं देखा और अपने काम में मसरूफ रहे यहां तक कि खलीफा के घर में दाखिल हुआ और सलाम
करके बैठ गया शेख अली ने खलीफा के सलाम का जवाब दिया और हाकिम-ए- वक्त को सवालिया
नजरों से देखने लगे।
हाजिब ने कई बार कहा कि शेख खलीफा के एहतराम में अपने पांव समेट लें मगर शेख
अली ने कोई जवाब नहीं, दिया जैसे आपने उसकी बात न सुनी हो।
खलीफा ने कई मसले दर्यिाफ्त किये शेख अली ने पूरी तफ्सील और खुश दिली से
जवाबात दिये मगर अपने बैठने का अंदाज नहीं बदला फिर जब खलीफा वापस जाने लगा तो शेख
अली ने एक हाथ से खलीफा का हाथ और दूसरे हाथ से हाजिब का हाथ पकड़ा और खड़े हो गये
फिर निहायत पुर जलाल लहजे में फरमाया जो शख्स अपने दोनों पैर सुकेड़ लेता है, उसके लिये जायज है कि वो अपने
दोनों पैर फैला दे शेख अली की गुफ्तगू का मफहूम ये था कि उन्हें खलीफा से कोइ तमा
नहीं था,
इसलिये एहतरामन खड़े नहीं हुए जब कोई शख्स किसी हाकिम के सामने दस्त तलब दराज
करता है तो वो अपने पांव समेटने पर मजबूर हो जाता है।
शेख अली का वाक्या सुनाने के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया उसको
तर्के दुनिया कहते हैं।
फिर इसी मज्लिस में हजरत महबूब इलाही ने मश्हूर बुजुर्ग हजरत अजल शीराजी का
वाक्या बयान करते हुए फरमाया एक शख्स हजरत ख्वाजा शीराजी का मुरीद हुआ और इस
बात का इंतिजार करने लगा कि पीरो मुर्शिद से किसी वजीफे की तलकीन फरमाते हैं कुछ
देर तक मज्लिस पर सुकूत तारी रहा, फिर हजरत ख्वाजा अजल शीरी ने अपने नये मुरीद को
मुखातिब करके फरमाया जिस चीज को तुम अपने लिये पसंद न करो उसे दूसरे के लिये भी
पसंद न करो।
पीरो मुर्शिद की हिदायात सुनकर चला गया फिर एक तवील मुद्दत के बाद वापस आया और हजरत शेख से अर्ज करने लगा मैं जिस रोज
से आपके हल्काए इरादत में शामिल हुआ हूं , उसी रोज से मुंतजिर हूं कि पीरो
मुर्शिद नमाज,
रोजा,
और दीगर वजाइफ के लिये मुझे हुक्म देते हैं?
अपने मुरीद की बातें सुनकर हजरत ख्वाजा शीराजी ने फरमाया मैंने तुम्हें पहले
दिन ये सबक दिया था जो चीज जाती तौर पर तुम्हें न पसंद हो , उसे दूसरों के लिये भी पसंद न करो
मगर तुमने मेरी वो बात याद नहीं रखी , जब किसी को पहला सबक याद न हो तो फिर उसे दूसरा सबक
किस तरह दिया जा सकता है ?
उसके बाद हजरत ख्वाजा अजल शीरी ने हाजिरीन मज्लिस को मुखातिब करके फरमाया एक
बुजुर्ग अक्सर कहा करते थे कि नमाज, रोजा, वजाइफ दीगर की जरूरियात हैं लेकिन असल चीज गोश्त है
जब गोश्त ही न होगा तो मसाल्हे क्या काम आयेंगे?
हाजिरीन में से किसी ने इस नुक्ते की वजाहत चाही तो वो बुजुर्ग फरमाने लगे
गोश्त तर्के दुनिया है और नमाज, रोजा, और वजाइफ मसालहात हैं इसलिये मर्दे मोमिन को लाजिम
है कि पहले तर्के दुनिया करके किसी चीज से ताअल्लुक न रखे फिर नमाज पढ़े, रोजा रखे और दूसरे वजाइफ में मश्गूल
हो तो कोई खतरा नहीं मगर इस हालत में कि दिल दुनिया की मोहब्बत से लबरेज हो तो
इबादत वजाइफ से कुछ हासिल नहीं होगा।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने हजरत ख्वाजा अजल शीरी के हवाले से ये वाक्या
सुनाने के बाद फरमाया अगर घी , लोंग, लहसुन, और प्याज वगैरा देग में डालें और बगारें फिर पानी
डालकर शोरबा करें तो वो छोटा शोरबा कहलाएगा जिसका तअल्लुक गोश्त
से हो ख्वा मसालहों का इस्तेमाल हो या न हो।
मज्लिस के इख्तिताम पर हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया तर्के दुनिया के ये
मायने हरगिज नहीं इंसान नंगा होकर लंगोट बांधकर एक जगह बैठ रहे बल्कि तर्के
दुनिया ये है कि लिबास पहने, खाना खाए और जो फुतूहात हासिल हों, उन्हें बंदगाने खुदा में तक्सीम
करता रहे,
जमा न करे और अपनी तबीअत को किसी चीज की जानिब न होने दे।
हजरत निजामुद्दीन औलिया का हल्का-ए- इरादत रोज व रोज बड़ा होता जा रहा था फिर एक वक्त वो भी आया कि आपकी मज्लिस में दस दस हजार आदमी जमा होने लगे इस मौक पर सवाल ये किया जाता है कि 700 हिजरी में लाउड स्पीकर ईजाद नहीं हुआ था फिर किसी बर्की आले की मदद के बगैर इतने बड़े इंसानी हुजूम को मुखातिब करना किस तरह मुमकिन था? आम मुशाहिदा ये है कि ख्वा कितना ही बुलंद मुकर्रर हो , उसकी आवाज हल्का असर दो चार सौ आदमीयों से ज्यादा नहीं होता फिर दस हजार आदमी हजरत महबूब इलाही की तकरीर से किस तरह फैजयाब होते थे?
इस सिलसिले में दुनियादार और मादा
परस्त लोगों का ख्याल है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया के दर्स से हाजिरीन की एक
महदूद ताअदाद मुस्तफीज होती थी बाकी लोग अपनी अकीदत से मजबूर होकर बैठे रहते थे
और हजरत महबूब इलाही की जुबान मुबारक से अदा होने वाला एक लफ्ज भी उनकी समाअत तक
नहीं पहुंचता था जो लोग सिर्फ जाहिरी असबाब और वसाइल पर यकीन रखते हैं उन्हें ये
अक्ली तोजहीया मुतमइन कर सकती है मगर अहले नजर हजरात इसे तस्लीम नहीं कर सकते
उनका अकीदा है और सौ फीसद दुरूस्त है कि हजरत निजामुद्दीन औलिया की तकरीर से
मज्लिस में हाजिर होने वाला एक एक शख्स इस्तिफादा हासिल करता था आपकी आवाज मुबारक
नजदीक और दूर यक्सां सुनाई देती थी और यही निजामुद्दीन औलिया की करामत है ।

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