हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-39
ठठ में शाहजहां के दौर की एक एसी मस्जिद आज भी मौजूद है जिसमें हजारों अफराद नमाज पढ़ते थे जब खतीब कोई तकरीर करता या जुमा का खुतबा पढ़ता तो आखिरी सफ में बैठने वाले नमाजियों को भी उसकी आवाज सुनाई देती थी।
माहिरीन-ए- तामीरात की नजर में येे इंजीनियरिंग का एक बे मिसाल कारनामा है मस्जिद की मेहराब और दर और दीवारें इस तरीके से बनाई गई हैं कि इंसानी आवाज दीवार व फर्स से टकराकर इस तरह गूंजती है कि मस्जिद के आखिरी हिस्से में बैठने वाला शख्स भी उसकी अवाज पूरी सेहत और सफाई के साथ सुन लेता है इसी तरह दस हजार आदमी तक अपनी आवाज को पहुंचाना हजरत महबूब इलाही का कमाल रूहानी था जो सिलसिला चिश्तिया के हवाले से हिंदुस्तान में माअरफत के अजीम तारीन इंजीनियर थे हाजिरीन मज्लिस को जाड़ों के मौसम में तो कोई तकलीफ नहीं होती थी लेकिन गर्मी का जमाना शायकीन दर्स पर बहुत गिरां गुजरता था खानकाह के सायबान में इतने लोगों के बैठने की गुंजाइश नहीं थी।
एक दिन हजरत निजामुद्दीन औलिया का
दर्स जारी था कि लोग आ आकर जलती धूप में बैठने लगे हजरत महबूब इलाही ने ये मंजर देखा तो अपना दर्स
रोक दिय और हाजिरीन को मुखातिब करके फरमाने लगे लोगों जरा करीब करीब बैठो।
दर असल होता ये था कि अगली सफ के हाजिरीन पास अदब की वजह से हजरत निजामुद्दीन
औलिया से एक मखसूस दूरी बनाकर बैठते थे नतीजतन खासी जगह खाली रह जाती थी इसी तरह बाकी सफों के
लोग भी खुल खुलकर बैठने की कोशिश करते थे
एक तो सायबान मुखतसर और दूसरे लोगों का हुजूम यहां तक कि आखिर आने वालों को तपती
धूप में बैठना पढ़ता था इसी तकलीफ दह सूरत
हाल को देखकर हजरत महबूब इलाही ने ये हुक्म दिया था कि लोग मिलकर बैठा करें।
फिर जब भी इस तरह की सूरत हाल पेश आती तो हजरत निजामुद्दीन औलिया बा आवाज
बुलंद फरमाते लोगों जरा पास पास हो जाओ ताकि दूसरे लोग भी साय में बैठ जाएं तुम्हें
नहीं मालूम कि धूप में बैठे तो वो है मगर जलता मैं हूं।
यही हकीकी सूफियत और यही है मन्सब दरवेशी के जख्म किसी और के जिस्म पर आ गये इस की खलश को अपने को दिल पर महसूस हो जो लोग दरवेशों को सहल पसंद और गोसा नशीन कहकर सूफियों का मजाक उड़ाते हैं उन्हें हजरत निजामुद्दीन औलिया के कोल मुबारक पर गौर करना चाहिये कि राहेे सूलूक की ये मंजिल आसान है या दुश्वार ? धूप में बैठे कोई और लेकिन जले कोई और ये इंसानी जिंदगी का मुश्किल तरीन मरहला है।
आज जिन मुहज्जब कौमों या अफराद को
खिदमत खल्क का दावा है वो सिर्फ एक बार भी इस कैफियत पर अमली सुबूत नहीं दे सकते
मगर हजरत महबूब इलाही वो मर्द दरवेश है जो पिंचानवे साल तक साये में बैठकर भी धूप
में जले हैं यहां एक दरवेश को किसी दूसरे दरवेश से मवाजिना मंजूर नहीं मगर ये
हकीकत है कि तस्वीफ की तवील तरीन तारीख में चंद बुजुर्ग ही ऐसे गुजरे हैं जो अपने
दिलों में मजहब इस्लाम और मख्लूक खुदा का इस कदर दर्द रखते थे एक हजरत गौसे आजम सैयदना शेख अब्दुल कादिर
जिलानी और दूसरे हजरत निजामुद्दीन औलिया।
धूप में बैठे तो वो हैं मगर जलता मैं
हूं ये मुख्तसर फिक्रा हजरत निजामुद्दीन औलिया के किरदार की बुलंदी और रूहानी
अजमत को समझने के लिये काफी है अगर लोगों के जहन कुशादा और दिल रोशन हों।
अलउद्दीन खिलजी के हवाले से हमारे पढ़ने वालों के जहनों में एक सवाल उभरकर सकता है
कि जलालुद्दीन खिलजी की तरह वो अभी एक मोहसिन कश हुक्मरां था फिर हजरत
निजामुद्दीन औलिया के हल्का दुआ में किस तरह शामिल हो गया था? ये एक अहम सवाल है जिस के जवाब में
कई तोजीहात पेश की जा सकती है मिसाल के तौर पर एक
बद किरदार इंसान होते हुए भी सुल्तान अलाउद्दीन बुजुर्गाने दीन से बे हद
अकीदा रखता था और खास तौर पर हजरत महबूब इलाही की जात तक तो उसकी अकीदत गुलामी का
रंग इख्तियार कर गई थी इस लिये हजरत निजामुद्दीन औलिया सुल्तान को दिल से ना पसंद
करते हुए भी यक्सर नजर अंदाज नहीं कर सकते थे
मोहब्बत गुनाहगार की हो या किसी पारसा की , मोहब्बत बेहरहाल मोहब्बत होती
है और वो अपने अंदर एक खास ताइद रखती है हजरत निजामुद्दीन औलिया तो मर्दे बुजुर्ग थे जो अपने दुश्मनों को भी दुआएं दिया करते थे
फिर आप एक मोहब्बत करने वाले को किस तरह फरामोश कर सकते थे?
हजरत महबूब इलाही और सुल्तान अलाउद्दीन के तअल्लुक का जायजा लेते वक्त इस हकीकत को हमेशा पेशे नजर रखा जाये कि हजरत महबूब इलाही ने उस वक्त दुआ की जब लश्कर इस्लामी खतरात में घिर जाता था इस तरह अहले नजर समझ सकते हैं कि हजरत महबूब इलाही की दुआओं का मर्कज सुल्तान की जात नहीं था हजरत निजामुद्दीन औलिया के मुखालिफीन भी किसी मोअतबर तारीखी रिवायत से ये बात साबित नहीं कर सकते कि हजरत महबूब इलाही ने फरमारवाए हिंद की बुलंद इकबाली के लिये दस्त दुआ बुलंद किया हो इसके अलावा तारीख में ये तल्ख तरीन हकीकत भी महफूज है कि सुल्तान अलाउद्दीन ने अपनी पूरी जिंदगी में एक बार भी हजरत निजामुद्दीन औलिया से ये दरख्वास्त नहीं की कि वो उसकी हिदायत और रहनुमाई के लिये दुआ फरमाएं।
सुल्तान खुशकिस्मत होते हुए भी एक बदनसीब इंसान था चश्मा आबे हयात के करीब रहते
हुए भी वो आखिरी सांस तक प्यासा रहा और उसी तिश्नगी के आलम में मर गया सुल्तान
शमशुद्दीन अल्तमश हजरत कुतुबुद्दीन की खिदमत में रहकर खुद भी वली बन गया मगर
अलाउद्दीन की तकदीर में ये सआदत नहीं थी उसने जब भी हजरत महबूब इलाही के सामने
अपना दामन मुराद फैलाया या तो उसके होंटों पर एक ही इज्तिजा होती थी कि लश्कर इस्लाम गालिब रहे सुल्तान की ये दरख्वास्त बजाहिर
अपने उरूजेे इक्तिदार के तहफ्फुज के लिये होती थी मगर इसमें अवाम के फायदे छुपे थे।

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