हजरत निजामुद्दीन औलिया के इस तरह से हाल पूछने पर वो शख्स जारो कतार रोने लगा शेख मैं एक सैयद जादा
हूं ,
सारी उमर मेहनत मजदूरी में गुजार दी मगर अब तीन बेटियां जबान हो चुकी हैं, कोई अहले गैरत नहीं आता कि मेरी
खानदानी शराफत को मेयार बनाकर मुझसे रिश्ता जोड़े , सब लोग कीमती जहेज तलब करते हैं
और पुर तकल्लुफ दावतों का एहतिमाम चाहते हैं मैं क्या करूं मुझे तो दो वक्त की
रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिलती है इत्तिफाक से मेरे एक रफीक ने मुझे आपके बारे में
बताते हुए कहा था आप हिंदुस्तान के बे ताज बादशाह हैं और आपके दरवाजे से कोई
जरूरतमंद न मुराद वापस नहीं जाता यही सोचकर
मैं आपकी खिदमत में हाजिर हुआ हूं।
मेरे भाई तुम्हें ये किसी ने गलत बताया मैं हिंद का बे ताज बादशाह हूं दरवेशी
में तो ताज का तसव्वुर ही हराम है और शहंशाह
सिर्फ अल्लाह की ही जात है मैं तो इस बडी सल्तनत में रहने वाला
एक अदना इंसान हूं जिसे उसने अपनी रहमत ला जवाल के साये में छुपा रखा है न मैं
यहां कुछ लेकर आया था और न अपने साथ कुछ लेकर जाउंगा जो कुछ है, सब उसी का है और वो अपने ला महदूद
खजानों में से जिस बंदे को जितना चाहता है बख्श देता है ये कहकर हजरत निजामुद्दीन
औलिया ने अपने खादिमे खास ख्वाजा इकबाल को तलब फरमाया और फिर सरगोशी के अंदाज
में फरमाया इकबाल तुम्हारे पास जो कुछ जर नकद है
, वो ले आओ।
फिर जब ख्वाजा इकबाल चले गये तो हजरत महबूब इलाही ने अपने मेहमान को तसल्ली
देते हुए फरमाया तुम परेशान न हो अल्लाह कारसाजेे आला है और वही दस्तगीर व मुशिकल
कुशा है मुझे उसकी जात पाक पर यकीन कामिल है कि वो अनकरीब तुम्हारी हाजत रवाई
करेगा इंशाअल्लाह तुम्हारी बच्चीयों की शादी हस्बे मंशा हो जायेगी आज खानकाह
में जिस कदर तहाइफ या नजराने आएंगे, उस सब पर तुम्हारा हक होगा।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के इस फरमान के बाद अजनबी मेहमान मसरूर और मुतमइन हो
गया और बड़े वालहाना अंदाज में कहने लगा
शेख दोनों जहां में आपका मर्तबा बुलंद हो मैंने जैसा सुना था, वैसा ही पाया।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने मेहमान की जबान से अपनी तारीफ सुनी तो गुफ्तगू का
मोजू ही बदल दिया कि देहली का कोई अमीर नजर भेजे तो आप उस मजबूर बाप की हाजत रवाई
कर सकें अब उसे इत्तिफाक ही कहा जाए कि उस दिन एक शख्स भी कोई तोहफा या नजर लेकर
महबूब इलाही की बारगाह में हाजिर नहीं हुआ ये बड़ी तअज्जुब खेज बात थी जब से हजरत
निजामुद्दीन औलिया पर फुतूहात का दरवाजा खुला था , उस रोज से लेकर आज तक कोई दिन ऐसा
नहीं गुजरता था कि खानकाह में हजारों की रकम न आती हो आखिर रात हो गई और हजरत महबूब
इलाही इशा की नमाज से फारिग हो गये तो आपने अजनबी मेहमान से माअजरत ख्वाना लहजे
में फरमाया सैयद मैं बहुत पशेमान हूं कि तुम्हारा निहायत कीमती वक्त हालत
इंतेजार में गुजर गया फिर भी इंसान को सब्र करना चाहिए कि सब्र ही सलामती का रास्ता
है और सब्र ही इंसान की निजात है तुम कल भी इस फकीर के मेहमान रहोगे देखें पर्दा
गैब से क्या जाहिर होता है?
इसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया ने ख्वाजा इकबाल को हुक्म दिया कि मेहमान
के लिये बतौर खास शब बसरी का एहतिमाम किया जाए।
दूसरे दिन वही जरूरतमंद इंसान सुबह से शाम तक हजरत महबूब इलाही की खिदमत में
हाजिर रहा मगर इत्तिफाक से उस रोज भी कोई अकीदतमंद लेकर नहीं आया ये बड़ी अजीब
सूरत हाल थी जिसे खानकाह में रहने वाले हर शख्स ने पूरी शिद्दत से महसूस किया हस्बे
मामूल इशा की नमाज के बाद हरजत निजामुद्दीन औलिया ने अपने मेहमान से माअजरत करते
हुए फरमाया मेरे भाई आज का दिन भी यूं ही गुजर गया मगर तुम परेशान न हो एक
दिन और इंतिजार कर लो इंशाअल्लाह कल कोई रास्ता जरूर पैदा हो जाएगा।
मेहमान अदब व एहतराम के सबब खामोश रहा मगर उसका चेहरा बता रहा था कि वो
अंदरूनी कर्ब में मुब्तिला है हजरत महबूब इलाही हर तरह उसकी पजीराई कर रहे थे
खानकाह में कयाम करने वाला हर शख्स पत्थर के फर्स पर सोता था मगर हजरत निजामुद्दीन
औलियाने अपने मेहमान के लिये पलंग और नर्म बिस्तर का इंतिजाम किया था ताकि एक आली नसब
सैयद की खातिर मदारात में कोई कमी न रह जाए मगर वो शख्स इस जाहिरी तवाजो से
मुतमइन नहीं था एक कसीर रकम उसकी जरूरत थी और रकम के हुसूल के आसार दूर दूर तक नजर
नहीं आ रहे थे फिर जब वो सैयदजादा अपने बिस्तर पर दराज हुआ तो उसकी नजरों में तीन जवान बेटियों के चेहरे उभर आए
सैयद के दिल में दर्द की एक तेज लहर उठी और फिर ये लहर उसके पूरे वुजूद पर मुसल्लत
हो गई ।
तीसरे दिन सैयदजादे ने फजर की नमाज हजरत निजामुद्दीन औलिया के साथ अदा की फिर
आने वाले अकीदतमंदों के हुजूम में इजाफा होता गया मगर उनमें कोई एक शख्स भी नजर
या हदिया लेकर नहीं आया था सैयदजादे की मायूसी बढ़ने लगी आंखों में कई बार अक्स
शिकायत उभरा मगर एहतराम शेख के पेशे नजर
होंटों को जंबिश न हो सकी दिन आहिस्ता आहिस्ता गुजरता रहा खानकाह में हाजिरी
देने वाले अकीदतमंदों की ताअदाद बिला मुबालगा हजारों तक पहुंच गई मगर उसे इत्तिफाक
ही कहा जाए कि नजर या तोहफे के नाम पर मुसलसल तीन रोज से एक दिरहम या दनार तिनका
हजरत महबूब इलाही की खिदमत मे पेेेेश नहीं किया गया ये सूरत हाल सैयद जादे के लिये बहुत
फिक्र अंगेज थी और हजरत निजामुद्दीन औलिया भी काफी अफसुर्दा नजर आ रहे थे यहां तक
कि शाम हो गई।

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