फिर मगरिब की नमाज के बाद हजरत महबूब इलाही ने सैयदजादे को अपने हुजरे मुबारक
में तलब किया अजनबी मेहमान का ख्याल था कि देहली का कोई अमीर कीमती नजर लेकर आया
होगा और हजरत निजामुद्दीन औलिया वही नजर उसे तन्हाई में पेश करना चाहते होंगे उन्हीं खुश करने वाले तसव्वुरात में घिरा वो शख्स हजरत महबूब इलाही की खलवत में हाजिर हुआ
और हाथ बांधकर बैठ गया।
मुअज्जज व मोहतरम मेहमान तुम्हें इस फकीर के घर आए हुए तीन दिन गुजर गये अब
तुम ने अंदाजा कर लिया होगा कि ये दरवेश जिसके बारे में बे ताज बादशाह जैसे कई
खिताबात शोहरत पा गये हैं , उसकी कोई हकीकत नहीं है मैं तो वही हूं जो नजर आता
हूं मगर लोग अपनी अकीदत की आंख से मुझमें न जाने क्या क्या सिफात देख लेते हैं
मैं तुम्हारी जरूरियात की नजाकत और शिद्दत से वाकिफ हूं मगर क्या करूं कि आज मेरे
हाथों में इतनी फराखी नहीं है कि तुम्हें पूरे सुकून इतमिनान के साथ तुम्हारे घर
रवाना कर सकूं।
सैयद जादा भी बड़े लोगों के खानदान से तअल्लुक रखता था, अहले इल्म की सोहबतें उठाई थीं, आदाबे मज्लिस से आसना था , इसलिये हजरत निजामुद्दीन औलिया की
गुफ्तगू सुनकर मुज्तरब हो गया , शेख आप क्यों परेशान होते हैं ये तो मेरी गर्दिशे वक्त है जिसने आप जैसे मर्दे सखी के हाथ को मुझ पर तंग कर
दिया है।
सैयद इस फकीर की दुआएं तुम्हारे साथ हैं और अल्लाह बहुत बेहतरीन कारसाज है , इंसान सोच भी नहीं सकता कि कब रहमत का दरवाजा खुलेगा और कब इंसान उसके लुत्फ व करम की बारिश में नहा जायेगा।
सैयदजादा खामोश बैठा रहा वो अल्लाह की रहमत से मायूस तो नहीं था मगर अपनी
शदीद तरीन जरूरतों के पेशे नजर फौरी तौर पर रहमतों का नूूजूल चाहता था ।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने कुछ देर के लिये सुकूत इख्तियार किया फिर सैयदजादे
को मुखातिब करके फरमाया दरवेश के पास अपने मेहमान को नजर करने के लिये जूतों के
सिवा कुछ नहीं हैं
हजरत महबूब इलाही ने अपने जूतों की तरफ इशारा किया जो जाहिरी तौर पर ज्यादा
शिकस्ता तो नहीं थे मगर कीमत में उनकी कोई हैसियत नहीं थी।
सैयदजादा चंद लम्हों के लिये दम बखुद रह गया वो सोच भी नहीं सकता था कि उस बे
ताज बादशाह के दर से पुराने जूतों के सिवा
कुछ हाथ नहीं आयेगा।
अजनबी मेहमान को हैरान परेशान देखकर हजरत महबूब इलाही ने फरमाया मेजबान पर
लाजिम है कि वो मेहमान की खिदमत में अपना बेहतरीन असासा और सबसे कीमती तोहफा पेश
करे मेरे जाती माल व मताअ में ये जूत ही सबसे ज्यादा कीमती हैं लिबास इस काबिल
नहीं कि तुम्हारी नजर किया जा सके बस यही जूतियां हैं कि उनके बगैर भी दरवेश का कारोवार
हायात जारी रहेगा।
सैयदजादा कुछ देर तक सोचता रहा और फिर उसने हजरत निजामुद्दीन औलिया के जूतों
को अपने रूमाल में लपेट लिया उसके बाद इजाजत तलब की और इंतिहाई बे दिली के आलम में
खानकाह से निकल कर अपने शहर की तरफ रवाना हो गया।
सैयदजादा रस्ते चलते हुए सोच रहा था कि अगर अहले खाना उससे पूछेंगे कि तू
देहली से क्या लाया तो वो साफ साफ कह देगा कि हिंद के बेताज बादशाह ने ये पुराने
जूते उसे तोहफे में दिये हैं और यही जूते बेटियों की शादी के मामलात में इसकी
किफालत करेंगे ।
उस शख्स को फिक्र थी सैयदजादे ने ये सोचकर जूते कुबूल नहीं किये थे कि ये चमड़े के उन दो टुकड़ों से हजरत महबूब इलाही के कदमों की खुश्बू आती है अगर वो इस हकीकत का समझ लेता तो इतनी बे अदबी के साथ खानकाह से न उठता और इसी बे दिली ने उस शख्स को अदम आगही की मंजिल तक पहुंचा दिया आगही तो उस वक्त पैदा होती जब वो देने वाले की जात से मुकम्मल तौर पर मुताआरिफ होता ताअरूफ ही नहीं था तो कैसे पहचानता कि देने वाला कौन है और उसने क्या दिया है?
गर्ज सैयद जादा इसी कशमशक में अपना सफर तय करता रहा वो दिन भर पैदल चलता और रात को किसी सराय में कयाम कर लेता था, इसलिए हर कदम पर शदीद गिरानी महसूस होती थी उसने बारहा सोचा कि गर मालूम होता तो वो कभी देहली का रूख न करता सैयदजादा एक अजीब से अहसास नदामत व कुर्ब में मुब्तिला था कि वक्तभी बर्बाद हुआ और रास्ते की मुसीबतें भी बर्दाश्त की , यही सोचते सोचते उस रात भी वो किसी सराए के एक कोने में सो गया जब सैयदजादा अपना सवाल लेकर हजरत निजामुद्दीन औलिया के आस्ताने सखावत व करम पर हाजिर हुआ था, उस वक्त हजरत अमीर खुसरू, सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के हमराह देहली से बाहर गये हुए थेे।
बहुत से मुअर्रखीन की रिवायत है कि बंगाल के सफर
में हजरत अमीर खुसरू सुल्तान के हमराह थे रिवायत में इख्तिलाफ हो सकता है मगर ये बात पक्की है कि हजरत अमीर खुसरू किसी जंगी मुहिम के मौके पर सुल्तान
अलाउद्दीनके साथ थे उस जंग में सुल्तान अलाउद्दीन ने शानदार फतह हासिल की थी और इसी
फतह से मुताअस्सिर होकर हजरत अमीर खुसरू ने अलाउद्दीन की शान में एक पुरजोश कसीदा
कहा था जिसके जवाब में सुल्तान ने पांच लाख नकरी सिक्के बतौर इनआम दिये थे ये
बड़ा अजीब इत्तिफाक था कि वो जरूरत मंद शख्स हजरत महबूब इलाही की बारगाह से नाकाम
हो कर अपने घर वापस जा रहा था और हजरत अमीर खुसरू घोड़ों पर लदी हुई एक कसीर रकम
लेकर देहली वापस आ रहे थे ।

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