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                         जहांगीर और नूरजहां भाग-4 लेकिन तख्‍त पर बैठने के बाद जहांगीर ने उसकी ये गल्‍ती माफ कर दी और उसे बंगाल की जागीर पर बहाल रखा । शेर अफगन के कत्‍ल के बाद उसकी बीवी मेहरून्निसा (नूरजहां) को उसकी बेटी लाडली बेगम के साथ जहांगीर के दरबार में भेज दिया गया। मेहरून्निसा को अकबर की बीवी सलीमा बेगम की खिदमत पर लगा दिया गया । सन् 1611 ई. में जश्‍ने बहार के मौके पर पहली बार इत्तिफाक से नूर जहां को देखा तो उसका दीवाना हो गया और दो माह बाद ही उससे शादी कर ली । जहांगीर ने उसे नूर महल का नाम दिया । अपनी काबिलियत के दम पर नूरजहां बहुत जल्‍द जहांगीर के करीब होती चली गई । उसके बाप को इतिमातुद्दौला का खिताब दिया गया और उसके भाई को तरक्‍की दी गई। शेर अफगन नूरजहां और जहांगीर के बारे में अनगिनत कहानियों ने जन्‍म लिया । कुछ लोगों ने लिखा कि जहांगीर अकबर के जमाने में ही नूरजहां की मोहब्‍बत में गिरफ्तार हो गया था लेकिन उसकी मंगनी शेर अफगन के साथ हो गई थी इसलिये जहांगीर के रास्‍ते में बहुत ज्‍यादा मुस्किलें पैदा हो ...

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-43

हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-43






मोअतबर तारीख नवेशों की रिवायत है रात के वक्‍त हजरत अमीर खुसरू शाही लश्‍कर के साथ सराय के करीब से गुजरे तो आपने अचानक दूसरे लोगों को ठहर जाने का हुक्‍म दिया।

मुझे शेख की बू आ रही है

हजरत अमीर खुसरू बार बार इसी जुमले को दोहरा रहे थे और परेशान होकर अपने अतराफ का जायजा ले रहे थे।

हजरत अमीर खुसरू की ये कैफियत देखकर बड़े फौजी अफसर अपने घोड़ो से उतर आए और अर्ज करने लगे अमीर आप क्‍या महसूस कर रहे हैं?

मैं इस मकाम पर अपने पीरो मुर्शिद की  खुश्‍बू  महसूस कर रहा हूं  हजरत अमीर खुसरू लहजे में शदीद इज्‍तिराब पनाह था।

हजरत महबूब इलाही तो ग्‍यासपुर में कयाम फरमा हैं और ग्‍यासपुर यहां से बहुत ज्‍यादा फासले पर है शाही सिपेहसालार  ने कहा

मैं जानता हूं कि अभी ग्‍यासपुर बहुत दूर है मगर मैं इस खुश्‍बू को कैसे नजर अंदाज करूं जिसने मेरे दिल व दिमाग को मुअत्‍तर कर दिया है, ये तमाम फिजा मेरे शेख की खुश्‍बू से लबरेज है ऐसा महसूसू होता है जैसे पीरो मुर्शिद यहीं कहीं जलवा अफरोज हैं  या फिर उस मकाम से गुजर रहे हैं हजरत अमीर खुसरू की वारफ्तगी बढ़ती जा रही थी।

आखिर हजरत महबूब इलाही के ये महबूब मुरीद और दूसरे फौजी अफसर खुश्‍बू के तआकुब में आगे बढ़े और फिर एक सराए तक पहुंच गये यहां खुश्‍बू का एहसास तेज हो गया था रात ज्‍यादा गुजर जाने के सबब सराए का दरवाजा बंद हो चुका था मालिक को तलब करके सराए का दरवाजा खुलवाया गया खुश्‍बू कुछ और नुमाया हो गई थी अमीर खुसरू बे करार होकर सराय के एक गौशे की तरफ बढ़े  यहां एक मुसाफिर सोया हुआ था और खुश्‍बू उसी के करीब से आ रही थी हजरत अमीर खुसरू  ने उस ख्‍वाब दीदा मुसाफिर को उठाया वो आंखे मलता हुआ न गवारी के आलम में उठा।

हजरत अमीर खुसरू ने माअजरत तलब करते हुए कहा मैं सिर्फ एक बात जानना चाहता हूं तुम्‍हारे पास से शेख की खुश्‍बू क्‍यों आ रही है ?

हां, मैं शेख निजामुद्दीन  से मिलकर आ रहा हूं अब वो शख्‍स किसी कदर सूरत हाल को समझ गया था

कैसे हैं मेरे शेख? हजरत अमीर खुसरू वराफ्ता हो गये ।

तुम्‍हारे शेख तो अच्‍छे हैं मगर उन्‍होंने मेरे साथ कुछ अच्‍छा सुलूक नहीं किया मुसाफिर का लहजा तंज आमेज था उनकी सखावत के बहुत से किस्‍से सुने थे मगर जब मैं ने अपनी बेटियों की शादी के उनसे मदद तलब की तो तुम्‍हारे शेख ने अपने पुराने जूते मेरे हवाले कर दिये और कह दिया कि यही जूते तुम्‍हारी जरूरतों की किफालत करेंगे।

कहां हैं मेरे पीरो मुर्शिद के नअलयन मुबार‍क? हजरत अमीर खुसरू बे करार हो गये।

मेरे पास मौजूद हैं मुसाफिर ने एक तरफ इशारा किया हजरत निजामुद्दीन औलिया के जूते एक कपड़े में लिपटे हुए उसके करीब ही रखे थे।

ए शख्‍स तू उन जूतों को फरोख्‍त करेगा? हजरत अमीर खुसरू चेहरे पर अजीब सी रोशनी थी , जिसे वो दुनिया की सबसे कीमती चीज खरीद रहे हों।

एक वो मजाक और एक ये मजाक है अचानक मीर खुसरू के लहजे में जलाल रूहानी झलक रहा था तूने मेरे शेख को पहचाना नहीं।

सैयदजादा संभल चुका था, फिर भी उसने इजारा तमस्‍खुर कहा अमीर तुम उन जूतों की क्‍या कीमत दोगे?

इस वक्‍त मेरे पास पांच लाख नकरी सिक्‍के हैं हजरत अमीरखुसरू ने इंतिहाई आजिजी के  साथ फरमाया

सैयद जादे को सक्‍ता हो गया

अगर ये रकम न काफी है तो मेरे साथ देहली वापिस चलो हजरत अमीर खुसरू ने फरमाया मैं इतनी ही रकम का और इंतेजाम कर दूंगा।

सैयदजादा बदहवास हो कर खड़ा हो गया और उसने जूते उठाकर अमीर खुसरू के हवाले कर दिये और इल्तिजा करने लगा मेरे लिये तो एक हजार सिक्‍के भी काफी हैं खुदा के लिये अपने वादे से न फिर जाना।

हजरत अमीर खुसरू सैयदजादे को अपने हमराह लेकर सराय से बाहर आए और उस जगह पर पहुंचे जहां नकरी सिक्‍कों से लधे घोड़े खड़े हुए थे सिर्फ एक हजार नहीं , ये तमाम सिक्‍के अब तुम्‍हारी मिलकियत हैं हजरत अमीर खुसरू ने घोड़ों की तरफ इशारा करते हुए फरमाया सैयद जादे पर एक बार फिर सक्‍ता तारी हो गया उसे अपनेे सुनने और देखने पर भरोसा नही हो रहा था फिर जब कुछ देर बाद वो शख्‍स  हैरत से बाहर निकला तो हजरत अमीर खुसरू से कहने लगा मगर मैं ये माल व मताअ लेकर अपने घर तक कैसे जाऊंगा?

यही घोड़े इस बोझ को उठाएंगे हजरत अमीर खुसरू ने जवाब में फरमाया।

घोड़े तो अपना काम करेंगे मगर मैं अपने शहर के लोगों को क्‍या जवाब दूंगा? मुसाफिर यकायक बहुत ज्‍याद परेशान नजर आने लगा था कौन मुझ गरीब की बातों पर यकीन करेगा कि ये सारी दौलत मेरी मिलकियत है घर से निकला तो मेरे सारे मिलने वाले मेरी गरीबी को जानते थे अब वापस जाऊं तो उन्‍हें किस तरह मुतमइन करूंगा कि एक रात में सब कुछ बदल गया है कोई शख्‍स भी मेरे दलाइल तस्‍लीम  नहीं करेगा  सब मुझे कज्‍जाकी या रहजनी का इल्‍जाम देंगे।




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