हजरत निजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-44
फिर तुम किस तरह इत्मिनान हासिल कर सकते हो? हजरत अमीर खुसरू ने पूछा
आप मुझे एक दस्तावेज लिखकर दें कि मैं आज से उस दौलत का मालिक हूं मुसाफिर ने
तजवीज पेश की।
हजरत अमीर खुसरू ने किसी ताखीर के बगैर एक कागज पर तहरीर लिख दी ।
मैं अमीर खुसरू सुल्तान अलाउद्दीन के दिये हुए इनआम की रकम को मजकूरा को बतौर
नजर पेश कर रहा हूं कागज पर तहरीर शुदा अल्फाज ने सैयदजादे को मुतमइन कर दिया फिर
उसने हजरत अमीर खुसरू से आखिरी इल्तिजा की कि लश्कर के चंद सिपाहियों की निगरानी
में ये घोड़े उसके घर तक पहुंचा दिये जाएं क्योंकि रास्ते में लुट जाने का खतरा दरपेश है।
हजरत अमीर खुसरू ने चंद सिपाहियों को हुक्म दिया कि वो मुसाफिर को ब हिफाजत
उसकी मंजिल तक पहुंचा दें और खुद बहुत तेज रफ्तारी के साथ इस तरह देहली की तरफ
बढ़े कि आपकी दस्तार में हजरत
निजामुद्दीन औलिया की जूतेे लिपटेे हुए थे।
फिर जब अमीर खुसरू हजरत महबूब इलाही की बारगाहे जलाली में हाजिर हुए तो अहले
मज्लिस ने देखा कि आपके दोनों हाथ इस तरह बुलंद हैं जैसे कोई मजदूर अपने सर पर
बारे गिरां उठाए हुए आ रहा हो बज्मे इरफां पर सन्नाटा तारी था हजरत निजामुद्दीन औलिया का हर अकीदतमंद और हर
खादिम हैरान था कि आज खुसरू को क्या हो गया? अपने अपने जहन के मुताबिक तमाम
अहले मज्लिस इस मुरीद जांसोख्ता की कैफियत का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे थे कि
हजरत महबूब इलाही के होंटों को जंबिश हुई , खुसरू कामयाबी का सफर मुबरक हो
तुम अपने शेख के लिये क्या तोहफा लाए हो?
हजरत अमीर खुसरू घुटनों के बल झुक गये और अपनी दस्तार में लिपटे हुए मुर्शिद
के नअलयन मुबारक फर्श पर रख दिए । इसके बाद अमीर खुसरू हजरत महबूब इलाही के कदमों से लिपट
गये।
कितने में खरीदी?हजरत निजामुद्दीन औलिया ने तबस्सुम दिल नवाज के साथ
फरमाया।
पांच लाख नकरी सिक्कों में हजरत अमीर खुसरू शिद्दत जजबात में रोने लगे
खुसरू (बहुत सस्ते दामों में खरीदी)
सैयद ये गुलाम और क्या करता? उस शख्स ने इसी पर किनाअत की वर्ना अगर वो इन जूतों
के बदले में मुझसे मेरा तमाम माल व मताअ भी तलब करता तो खुसरू अपना सब कुछ उसके
कदमों में ढेर कर देता ।
खुसरू : अगर ऐसा करते तब भी ये सोदा बहुत सस्ता होता हजरत महबूब इलाही ने
फरमाया।
ये था हजरत अमीर खुसरू के जज्बाते अकीदत का एक हल्का सा अक्स और अमीर खुसरूकी
इसी अकीदत के सबब हजरत निजामुद्दीन औलिया , सुल्तान अलाउद्दीन की दरख्वास्त सुन लिया करते थे अगर बीच में हजरत
अमीर खुसरू का वास्ता न होता तो हजरत महबूब इलाही अपने इसी मश्हूर कोल पर अमल
करते तो आपने एक खत के जवाब में सुल्तान अलाउद्दीन को तहरीर फरमाया था।
इस फकीर के घर के दो दरवाजे हैं अगर
तू एक दरवाजे से दाखिल होगा तो मैं दूसरे से निकल जाऊंगा और ज्यादा तंग करेगा तो
मैं तेरा मुल्क छोड़ दूंगा कि अल्लाह की
जमीन बहुत बसीअ है।
फिर 6/शव्वाल 716 हिजरी की एक सियाह रात में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की जिंदगी का चिराग बुझ गया। नमक हराम मलिक काफूर जिसे सुल्तान अलाउद्दीन ने महबूबियत के दर्जे तक पहुंचाया था और जिस के इश्क में सुल्तान ने अपनी दुनिया और आखिरत बर्बाद कर ली थी, इसी हिंदूजादे ने अपने आकाए नेअमत को जहर देकर हलाक कर दिया था अलाउद्दीन की मौत के बाद तारीख हिंद ने एक खौफनाक करवट ली हुसूल इक्तिदार के लिये बड़े शर्मनाक खेल खेले गये बड़ा खून बहाया गया और बड़ी रूसवाईयां हुईं मलिक काफूर ने सुल्तान अलाउद्दीन के दोनों बेटों खिजर खान और शादी खान को अंधा करके कैद खाने में डाल दिया था।
सुल्तान के
सबसे छोटे बेटे शहाबुद्दीन जिसकी उम्र छ: साल की थी, उसे शाही तख्त पर बैठा दिया गया और खुद मलिक काफूर नायब सल्तनत बन बैठा अब
वो हिंदू जादा जिसने अपने मकरूह चेहरे पर इस्लाम की नकाम चढ़ा रखी थी , अलाउद्दीन के चौथे बेटे
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के पीछे था कि उसे कत्ल कर दे और फिर हिंदुस्तान का
फरमांरवा बन जाए ।

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