हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-45
फिर वक्त ने एक अजीब करवट ली मुबारक शाह के बदतरीन दुश्मन मलिक काफूर को उसी के आदमियों ने हलाक कर दिया और ताज शाही उस
शख्स के सर पर जगमगाने लगा जो बजाहिर
अपनी जिंदगी से मायूस हो चुका था और जिसकी जाती हैसियत हवा के दोश पर उड़े हुए एक
हकीर तिनके से ज्यादा नहीं थी।
राजकुमार महेंन्द्र देव किसी हिंदू हुक्मरां के खानदान से था और हजरत निजामुद्दीन औलिया से बे पनाह अकीदत रखता था बाद में उसने इस्लाम कुबूल कर लिया था और हजरत महबूब इलाही ने उसका नाम अहमद याज रखा था , यही महेन्द्र देव हजरत निजामुद्दीन औलिया के हवाले से पेश आने वाले वाक्यात को राेेजाना कलमबंद करता था, फिर यही रोजनामचा ‘’ महेन्द्र देव की डायरी’’ के नाम से मश्हूर हुआ राजकुमार ने अपने इसी रोज नामचे में कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के मुतअल्लिक एक अजीब वाक्या तहरीर किया है जिसे पढ़कर एक तरफ हजरत निजामुद्दीन औलिया की शान-ए- बे नियाजी का अंदाजा होता है और दूसरी तरफ फरमा रवाए हिंद की खबासतेे नफ्सी और ना शुक्र गुजारी का।
राजकुमार महेन्द्र हर देव लिखता है कि मुबारक शाह को मेरे पीरो मुर्शिद से पुरानी दुशमनी थी क्योंकि उसके दोनों भाई खिजर खां और शादी खान, हजरत महबूब इलाही के मुरीद थे वो हर वक्त इस खौफ में मुब्तिला रहा था कि कहीं हजरत निजामुद्दीन औलिया उसके दरबारी अमीरों और फौज के सिपाहियों को बगावत पर आमादा न कर दें, इसलिए मुबारक शाह ने अपने एक कासिद के जरीये हजरत निजामुद्दीन औलिया को हुक्म दिया ।
शेख निजामुद्दीन मैं चाहता हूं कि तुम किसी ताखीर के बगैर देहली छोड़कर कहीं
दूर चले जाओ इस शहर में तुम्हारा कयाम मेरी सल्तनत के लिये मुस्तकिल खतरा है।
हजरत महबूब इलाही ने सुल्तान के कासिद को मुखातिब करते हुए फरमाया मैं एक
गौशा नशीन फकीर हूं और इस फकीर को अपने मालिक की रजा हासिल करने के सिवा किसी
दूसरी चीज की तलब नहीं।
मुबारक शाह पर हजरत निजामुद्दीन औलिया के जवाब का जरा भी असर नहीं हुआ फरमा
रवाए हिंद के दिल की कदूरत बढ़ती चली गई यहां तक कि वो सरे दरबार हजरत महबूब इलाही
की शान में गुस्ताखी करने लगा।
फिर एक दिन कुतुबुद्दीन मुबारक शाह अचानक बीमार हो गया बद किरदारी के सबब उसे ऐसी
कई बीमारीयां लाहिक हो गईं थीं जिन्हें वो तबीबों के सामने जाहिर करते हुए भी
शर्माता था उनही खुफिया बीमारियों के सबब वाली ए हिन्दुस्तान का पेशाब बंद हो
गया मजबूरन मुबारक शाह ने शाही हकीमों को अपनी खलवत में तलब किया मगर वो माहिर हकीम भी
अपने आका को इस तकलीफ से निजात न दिला सके मुख्तसर कि इसी हालत में तीन दिन गुजर
गये मुबारक शाह तकलीफ की शिद्दीत से इस कदर चींखता कि महल के दर व दीवार गूंजने
लगते थे।
आखिर हकीमों ने मुबारक शाह की मां बीबी मलिक से साफ साफ कह दिया कि सुल्तान की
जिंदगी को शदीद खतरा लाहिक है अगर एक दो दिन में ये तकलीफ दूर न हुई तो फिर कुछ भी
हो सकता है।
बीबी मलिक ने फौरी तौर पर शेख
नजमुद्दीन से रूजूअ किया और दुआओं की तलबगार हुई आम तौर पर मश्हूर है कि शेख
नजमुद्दीन की दुआओं से मुबारक शाह को हुकूमत हासिल हुई थी इसीलिये बीबी मलिक पुर यकीन थी कि इस मुश्किल
वक्त में भी शेख निजामुद्दीन की रूहीनी इमदाद मुबारक शाह के काम आएगी मगर कुदरत को
कुछ और ही मंजूर था शेख निजामुद्दीन की दुआएं भी बे असर साबित हुईं।
बेटे की बीमारी ने बीबी मलिक की नींदें
उड़ा दीं इसी दौरान एक शाही खिदमगार ने अपनी जान की अमां मांगते हुए अर्ज
किया सुल्तान मुअज्जम हजरत निजामुद्दीन की शान में गुस्ताखीयां करते रहते हैं
कहीं ये बीमारी इसी बे अदबी का नतीजा न हो ।
बीबी मालिक एक खुदा तरस औरत थी
खिदमगार की जबान से ये इंकिशाफ सुनते ही वो कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के पास पहुंची
और बेटे से कहने लगी मुझे मालूम हुआ है कि शेख निजामुद्दीन औलिया के साथ तेरा
रवैया गुस्ताखाना है और इसी वजह से तुझे इस मोजी मर्ज ने आ घेरा है अगर तू अपनी
सलामती चाहता है तो उनसे माफी मांग ले और अपनी सेहत के लिये दुआ की दरख्वास्त कर
।
अगर चे कुतुबुद्दीन मुबारक शाह बिन पानी की मछली की तरह तड़प रहा था लेकिन उस
आलम में भी उसका दिल हजरत निजामुद्दीन औलिया की तरफ से साफ नहीं था गजबनाक लहजे
में कहने लगा मैं उन फकीरों को नहीं मानता ये सब दुनियादार दुकानदार लोग हैं मेरी
बीमारी का तअल्लुक शेख निजामुद्दीन की बद दुआ से नहीं है।
बीबी मालिक ने मुबारक शाह को बहुत समझाया मगर बद बख्ती ने उसके होश हवास छीन
लिये थे आखिर एक गमजदा मां बेटे की मोहब्बत से मजबूर होकर खुद ही निजामुद्दीन
औलिया की बारगाहे जलाली में हाजिर हुई हजरत महबूब इलाही ने मल्का हिंद को बड़ी
हैरत से देखा मगर अपनी ना पसंदगी का इजहार
न फरमाया।
मेरा बेटा एक निहायत ही तकलीफ दह बीमारी में मुब्तिला है आप उसकी सेहतयाबी के
लिये दुआ फरमाएं बीबी मलिक ने निहायत ही रिक्कत आमेज लहजे में अर्ज किया।
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-41
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- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-44

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