नटखट गिलेहरी
एक थी गिलेहरी और उसका बच्चा।
बच्चे का नाम था गुल्लू था वह बड़ा शरारती मगर वो ऐसी शरारतें नहीं करता था कि
जिनसे किसी को नुकसान पहुंचे और अगर कभी कोई ऐसी शरारत कर बैठता तो माफी जरूर मांग
लेता था।
गुल्लू का घर शीशम के पेड़ पर बना
हुआ था और उसके साथ एक नहर भी बहती थी। गांव से शहर जाने वाले बहुत से लोग उस पेड़
के नीचे आकर रूकते, नहर का ठंडा पानी पीते और आगे चले जाते।
गुल्लू उन सब लोगों को देखता और
अगर कोई मुसाफिर उस पेड़ की छांव में लेट कर सो जाता तो गुल्लू उसके सामान की
तलाशी लेता और खाने की चीजें निकाल कर खा जाता। अगर पूरी चीजें न खा सकता तो चखता
जरूर था।
वो अक्सर सोचता कि ये इंसान इतनी
अच्छी -अच्छी और मजे की चीजें कहां से ले आते हैं। मुझे तो जंगल में एक भी पेड़
ऐसा नहीं मिला जिस पर गुलाब जामुन, रस गुल्ले, या चॉकलेट लटक रही हो। मगर उसे क्या पता था कि ये
नेअमतें तो अल्ला मियां ने सिर्फ इंसानों को दी है कि वो घर पर मजे मजे की
चीजें बनाकर खा सकें।
नहर के पुल से गुजरने वाले चंद लोग
तो ऐसे थे कि गुल्लू हर रोज उनको देखा करता था। उनमें एक अम्मा मालन थी जो बाग
से फूल चुनकर शहर बेचने जाती। फूलों की भीनी भीनी खुश्बू गुल्लू को बहुत पसंद
थी।
दूसरा बाबा दारा था जो शहर सब्जी
बेचने जाता था और वापसी पर शीशम के पेड़ के नीचे बैठकर चंद मिनट आराम करता था।
तीसरा अख्तर दूध वाला था जो दूध
लेकर शहर जाता था। कभी कभार गुल्लू और उसके साथी शर्तें लागकर अख्तर की सायकल के
आगे से गुजरने का मुकाबला किया करते थे।
एक रोज गुल्लू अपने दोस्तों के
साथ पेड़ पर पकड़म पकड़ाई खेल रहा था कि उसकी नजर शहर से आने वाले रास्ते पर पड़ी
एक आदमी सायकल के पीछे एक बड़ा सा डिब्बा रखे आ रहा था।
गुल्लू और उसके साथी खेल छोड़कर
उस आदमी को देखने लगे क्योंकि उन्होंने उस आदमी को पहले भी इस रास्ते पर नहीं
देखा था। वो आदमी धीरे- धीरे सायकल चलाता हुआ शहर से आ रहा था।
'' ये कौन हो सकता है?'' गुल्लू ने सोचते हुए कहा।
'' मुझे पता है ये कौन है?'' गुल्लू का दोस्त बोला।
'' बताओ फिर'' गुल्लू ने कहा।
'' ये फेरीवाला है और शहर से चीजे बेचने गांव आता है''। दोस्त ने बताया।
मगर तुम्हें कैसे मालूम है? गुल्लू ने पूछा।
दोस्त ने कहा '' मुझे पता है क्योंकि उसकी सायकल
पर जो बड़ा सा डब्बा रखा हुआ है। उसमें तरह -तरह की चीजें होती हैं। कल उसके डब्बे
से एक मूंगफली गिरी थी जो मैंने चखी थी। बड़ी मजेदार थी''।
'' अच्छा इसके डिब्बे में खाने की चीजें होती हैं। आज फिर
तलाशी लेंगे इसकी''। गुल्लू ने खुश होकर कहा।
सख्त गर्मी का मौसम था नहर
पहुंचकर उस आदमी ने अपनी सायकल शीशम के पेड़ के साथ खड़ी कर दी और खुद नहर पर पानी
पीने चला गया। गुल्लू तो पहले ही मौके की तलाश में था। वो फौरन एक डाल से दूसरी
डाल पर होता हुआ नीचे को दौड़ा।
उसके दोस्त जरा सुस्त जरा डरपोक
थे। वो ऊपर ही बैठे रहे।
अचानक गुल्लू का पांव फिसला और वो
धड़ाम से नीचे गिरा मगर जमीन पर गिरने के बजाये वो सायकल वाल डिब्बे में जा पड़ा।
वो खुश था कि मुफ्त में मूंगफलियां, अखरोट और दूसरी चीजें खाने को मिलेंगी। मगर ये क्या? दुकानदार तो आज शहर से सिर्फ
सुर्ख मिर्चें लेकर आया था।
''आछू...'' गुल्लू ने एक जोर की छींक ली और डिब्बे से बाहर जा पड़ा।
''आछू.... आछू ... आछू ''
और फिर तो गुल्लू छींकता ही चला गया। गुल्लू की समझ नहीं आ रहा था कि ये
क्या हो रहा है। वो तो बस मुंह खोल कर छीकता और दो फुट पीछे जा गिरता उसका ये हाल
देखकर उसके दोस्त जो पेड़ पर बैठे थे जोर जोर से हंसने लगे और इतना हंसे कि बे
काबू होकर सब पेड़ से गिरे और मिर्चों वाले डिब्बे में जा पड़े' गुल्लू की तरह।
अब तो सड़क पर हर तरफ आछू... आछू
हो रही थी। सत गिलेहरियां सड़क पर छींकती फिर रहीं थी।
फेरीवाला जब पानी पीकर वापस आया तो
इतनी सारी गिलेहरीयों को छींकते देखकर हंसने लगा।
उसे गिलेहरियों का ये तमाशा बहुत
दिलचश्प लग रहा था। हंस हंसकर उसके पेट में दर्द होने लगा। हंसते हंसते अचानक
दुकानदार का पांव फिसला और वो भी मिर्चों वाले डिब्बे से जा टकराया। उसकी नाक में
भी मिर्चें घुस गईं। अब फेरी वाला भी गिलेहरियों के साथ छीके मार रहा था।
'' आछू... आछू... आछू''
। रास्ते पर बहुत से लोग रूककर उनका तमाशा देख रहे थे। छीकों की आवाजें
सुनकर जंगल के और भी बहुत से जानवर पेड़ों से सर निकाल निकालकर उनका तमाशा देख रहे थे और हंस रहे थे।
यूं लग रहा था जैसे सड़क पर छीकों का मुकाबला हो रहा हो।

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