अहमद की मुर्गी महमूद के घर
अहमद स्कूल से घर आया, किताबें मेज के ऊपर रखीं, मुंह हाथ धोकर इतमिनान के साथ चाय
पी और अभी खाली प्याली तिपाई पर रखी ही थी कि उसकी छोटी बहन आलिया भागती हुई आई
और मुस्कुराकर बोली:
भाईजान एक खुशखबरी सुनेंगे?
खुशखबरी जरूर सुनओ- क्या तुम इम्तिहान
में पास हो गईं या कहीं से मिठाई का भरा हुआ डिब्बा आया है?
आलिया ने नहीं में सर हिलाती रही।
तो फिर क्या खुशखबरी है ?
आपकी वो मुर्गी है ना सुर्ख रंग की, बड़ी प्यारी ? आलिया ने कहा।
उसने अंडा दिया है, मगर वो तो देती रहती है? अहमद ने जल्दी से पूछा ।
भाईजान आप स्कूल गये और वापस आ
गये। वो बाहर निकली और लौटी नहीं।
क्या मेरी मुर्गी गुम हो गई है ? इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि
राजिऊन
आलिया ने हां मे सर हिलाया।
कहां गई? क्यों गई ?आई क्यों नहीं
अहमद ने एक साथ कई सवाल कर दिये।
हम कुछ नहीं जानते भाईजान बस ये
जानते है कि वो बाग में बाहर फिर रही थी कि दरवाजे से बाहर चली गई । पहले भी जाया
करती थी और थोड़ी देर में वापस आ जाती थी। लेकिन इस बार नहीं आई।
तलाश किया? अहमद ने पूछा।
बहुत ढूंढा। नहीं मिली कोई ले गया
है। आलिया ने जवाब दिया।
कौन ले गया है? अहमद ने पूछा
भाईजान हमें पता होता कि कौन ले गया है तो वहां
जाकर ले ना आते। आलिया ने जवाब दिया।
अहमद ने अपना दांया पांव जमीन पर
पटखा और ये कहकर बाहर चला गया: मैं खुद ढूंढता हूं।
वो पड़ोसी के घर जा जा कर मुर्गी
ढूंढने कोशिश कर रहा था कि उसका हम जमाअत आसिफ जो हकलाकर बात करता था, उसे मिला और उसे इशारे से एक तरफ
ले जाकर राजदाराना लहजे में बोला:
तुम अपनी मुर्गी ढूंढ रहे हो ना
हां देखी कहीं?
आसिफ अपना मुंह उसके कान के पास
लाया और कहा उसे महमूद ले गया है
महमूद ले गया है ?
मैंने वो उसके हाथ में देखी थी।
वही ले गया होगा, उसके पास अपनी मुर्गियां भी। अहमद
ने कहा।
अहदम आसिफ को साथ लेकर महमूद के घर
जाना चाहता था कि उधर उनके तायाजान आ गये। उनके पूछने पर अहमद ने मुर्गी के गुम
होने और उसे महमूद के हाथ में देखने का किस्सा सुनाया।
तो तुम उसके घर जा रहे हो? तायाजान ने पूछा।
जी हां उससे अपनी मुर्गी लेने।
पहले घर चलो। और तायाजान अहमद आसिफ
को अपने घर ले गये।
देखों बेटा ये कोई बात नहीं है कि
आसिफ ने तुम्हारी मुर्गी महमूद के हाथ में देखी और तुम चले उसके घर मुर्गी लेने।
हो सकता है आसिफ की नजरों ने धोका खाया हो। वो तुम्हारी मुर्गी न हो?
वो मेरी ही मुर्गी होगी। आसिफ उसे
कई बार देख चुका है। उसने मेरी मुर्गी पहचान ली।
जी हां मैंने उसे पहचान लिया था।
यही कहना चाहते हो । तायाजान ने आसिफ से मुखातिब होकर पूछा।
आसिफ ने हां कर दी।
देखो अहमद जब तक पूरी तहकीक न कर
ली जाय किसी पर इल्जाम नहीं लगाना चाहिये। तायाजान ने फरमाया।
अहमद की बाजी भी आ गई थीं। उन्होंने
तायाजान की ताईद करते हुए कहा: महमूद एक
फसादी लड़का है, बेकार में झगड़ा करेगा।
ठीक कहा तुमने । अहमद की अम्मी भी
वहां आ गईं थीं और उन्होंने बड़ी बेटी की बात सुन ली थी।
मैं समझता हूं अहमद , तुम्हारी बाजी ने जिस खतरे का
इजहार किया वो गलत नहीं है। तायाजान ने
अपना फैसला सुनाया।
आलिया जो बड़ी खामोशी से गुफ्तगू
सुन रही थी: मैं तस्दीक करती हूं।
वो कैसे ? आलिया की अम्मी बोलीं।
अम्मी वो ऐसे कि मैं महमूद की बहन
की किताब ले आई थी, वापस करने जाती हूं। महमूद की मुर्गियां उनके घर के बाग
में होती हैं। मैं बाग में से गुजरकर आगे जाऊंगी। देख लूंगी कि मेरी मुर्गी वहां
है यां नहीं।
सबने उसकी ताईद की। आलिया तेजी से
चली गई। सब बे करारी से उसका इंतेजार करने लगे। चंद मिनट के बाद आलिया लौट आई।
उसकी सांसें फूली हुई थीं।
बिल्कुल ठीक है।
क्या बिल्कुल ठीक है?
मुर्गी वहां है।
अब बनी बात। अहमद महमूद के यहां जा
सकता है अपनी मुर्गी मांगने।
अहमद आसिफ को अपने साथ लेकर महमूद के यहां पहुंच गया। महमूद ने उन्हें अपने
ड्रांइग रूम में बिठया और आने की वजह
पूछी।
अहमद ने बड़े नर्म लहजे में कहा:
वो भाई महमूद , हुआ यूं कि मेरी मुर्गी घूमने की लिये घर से बाहर जाया
करती थी। आज वो दूर चली गई और रास्ता भूल गई।
रास्ता भूल गई आपने अखबार में तलाश गुमशुदगी का इश्तेहार दिया होता। महमूद बोला।
जी नहीं उसकी जरूरत पेश नहीं आई।
वो गल्ती से आपके घर में चली गई।
मेरे घर में चली गई ?
महमूद ने हैरत से पूछा।
जी हां वो आपके यहां है।
महमूद मुस्कुराया: आपको गलत फहमी
हुई। आप जैसे अक्लमंद लड़के की मुर्गी भी अक्लमंद होगी। वो घर का रास्ता नहीं
भूल सकती।
ये बात सुनकर आसिफ कहने लगा मैंने वो मुर्गी आपके हाथ में देखी थी।
महमूद ने जवाब दिया मैं वो मुर्गी
मार्केट से खरीदकर लाया था।
आसिफ ने मुंह बिसूर लिया ।अहमद और
महमूद हंस पड़े।
मुझे यकीन है मेरी मुर्गी आपके
यहां मौजूद है।
ठीक है आपकी मुर्गी मेरे पास है तो आप उसकी
निशानियां बता दें। अगर ये निशानियां ठीक
हुईं तो मुर्गी आपकी, ये तो आप कर सकते हैं ना?
कर सकता हूं
तो कीजिये बताईये आपकी मुर्गी का
रंग क्या है ?
अहमद फौरन बोल उठा: सुर्ख
मुर्गी का रंग सुर्ख और वजन कितना
है ?
वजन?
जी हां, उसका वजन कितना है?
मैंने उसे कभी नहीं तोला और तोलने
की जरूरत भी क्या थी?
फिर बताईये मुझे कैसे मालूम हो कि
आप दुरूस्त कहते हैं। अच्छा आप ये फरमाई उसके परों की तादाद क्या है?
आप तो मजाक कर रहें हैं।
मैं बिल्कुल मजाक नहीं कर रहा ।
आपसे आपकी मुर्गी की निशानी पूछ रहा हूं।
अहमद उठ बैठा और गुस्से से जाने
लगा। आसिफ भी उसके पीछे पीछे जाने लगा।
महमूद ने जोर का कहकहा लगाया और ये
कहकहा अहमद को बहुत बुरा लगा, मगर वो घर से निकल गया।
क्यों भाई , क्या बात है मुंह लटकाए आ रहे हो? तायाजान ने अहमद को मायूसी की हालत में देखकर पूछा । अहमद ने जो
कुछ हुआ था सुना दिया।
ये महमूद तो मेरी सोच से भी ज्यादा
चालाक निकला खैर आओ मैं तुम्हारे साथ चलता हूं। रास्ते में महमूद के सावालों के
जवाब सोचेंगे। अहमद, आसिफ और तायाजान महमूद के घर चले गये।
महमूद बेटा
जी फरमाईये।
तुम्हारे और अहमद के बीच एक झगड़ा
पैदा हो गया है। मैं चाहता हूं ये झगड़ा खत्म हो जाय। दोस्तों में
झगड़ा हरगिज नहीं होना चाहिये ।
तायाजान आप उसके भी बुजुर्ग है और
मेरे भी। आप फैसला कर दें, मैं इस फैसले को फौरन मान जाऊंगा।
ये तुम्हारी सआदतमंदी है बेटा।
ये अपनी मुर्गी की सही सही निशानी
बता दे, मगर ये निशानियां बता ही नहीं सका। महमूद ने कहा।
क्यों अहमद अगर तुम्हारी मुर्गी है तो उसकी सारी
निशानियां तुम्हें मालूम होंगी।
मैं बताने की कोशिश करता हूं। अहमद ने कहा।
पूछो महमूद उससे।
महमूद ने पहला सवाल किया। मुर्गी
का रंग?
अहमद ने फौरन जवाब दिया सुर्ख।
दुरूस्त है महमूद ने सर हिलाकर
कहा।
मुर्गी का वजन?
अहमद सोच में पड़ गया, महमूद अपनी कामयाबी पर मुस्कुराने
लगा।
ताया जी कहने लगे: अहमद महमूद ने
जो सवाल किया है उसका जवाब दो।
जवाब देता हूं जी , मेरी मुर्गी का वजन ढाई किलो है।
मैं नहीं मानता। महमूद का जवाब था।
तो बेटा तौल कर देख लो। अभी सही
वजन मालूम हो जायेगा।
महमूद उठकर चला गया। वापस आया तो
उसके हाथ में मुर्गी और तराजू था।
मुर्गी को तौला गया तो उसका वजन
ढाई किलो से छटांक भर कम निकला। ये देखकर महमूद खुशी से उछल पड़ा।
क्यों अहमद झूठा इल्जाम लगाते हो, तायाजान गुस्से से बोले।
मेरी सुनिये तायाजान।
सुनाओ।
मेरी मुर्गी का वजन ढाई किलो ही
था। घर से बिछड़कर इतनी उदास हुई इतनी उदास हुई कि उसका वजन दो छटांक कम हो गया।
ये सुनकर महमूद परेशान हो गया।
बात सही है बेटा तुम भी इसे सही समझते होगे। कोई और निशानी
पूछो।
पूछता हूं इसके परों की तादाद बताओ?
जी मेरी मुर्गी के परों की तादाद नौ हजार नौ सौ निन्नयानवे है।
गलत। महमूद बोल उठा।
दूरूस्त है । अहमद ने इसरार किया।
मैं कहता हूं ये गलत है।
मैं कहता हूं ये सही है।
दोनों झगड़ने लगे।
झगड़ते क्यों हो। अभी फैसला हुआ
जाता है महमूद बेटा
फरमाईये तायाजान।
मुर्गी तुम्हारे पास है ना ।
है जी।
पर गिन लो पता चल जायेगा अहमद ठीक
कहता है या गलत।
महमूद के चेहरे का रंग जर्द पड़
गया।
महमूद बेटा क्या सोचते हो?
महमूद कुछ देर खामोश रहा फिर
मुर्गी अहमद की तरफ बढ़ाकर बोला’’ मैं अपने किये पर शर्मिंदा हूं तायाजान।
शाबाश महमूद बेटा। नेक औलाद कोई बुरी हरकत करे फिर उसपर शर्मिंदगी
का इजहार करें तो अल्लाह पाक उसे माफ कर देता है।
मैं दिल से नदामत का इजहार करता
हूं। महमूद बोला।
चाय पीने के बाद तायाजान, अहमद और आसिफ चलने लगे हां उसके
साथ अहमद की मुर्गी भी थी।

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