आधा कम्बल
एक मालदार आदमी की बीवी मर गई थी।
और कुछ ही दिनों में उसे भी दमे की बीमारी हो गये तो उसने अपनी पूरी जायदाद अपने
नोजवान बेटे के सुपुर्द कर दी।
जायदाद पाकर पहले तो नौजवाबन लड़का
और उसकी बीवी बच्चे से व्यापारी की खातिरदारी करते रहे मगर एक साल में ही जोश
ठंउा होकर ये हालत हो गई कि उसने इलाज करवाना भी बंद कर दिया और खाना भी वहीं
मिलने लगा जो मामूली तौर पर घर में पकता था।
बल्कि एक दिन तो नौजवान बेटे ने
साफ साफ कह दिया कि आप अपनी चारपाई बाहर बिछा लें तो बेहतर हो कि आप हर वक्त
खांसते रहते हैं उससे बच्चों में बीमारी
फैलने का खतरा है ।
बीमार बाप को सब्र और शुक्र के
सिवा और कोई चारा ही नहीं था। उसने कहा मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं मगर एक कम्बल
ओढ़ने को चाहिये कि अभी सर्दी बाकी है।
नौजवान ने छोटे बेटे से कहा। दादा
के लिये गाय वाला कम्बल तो उठा लाओ। लड़का झट से कम्बल उठा लाया और दादा से कहा।
लो दादा! इसमें से आधा तुम फाड़ लो और आधा मुझे दे दो।
दादा बोला भला आधे कम्बल से सर्दी
कैसे जायेगी बाप ने भी बेटे से कहा दादा को सारा ही कंबल दे दों जिसपर छोटे बेटे
ने भोलेपन से कहा घर में ऐसा कम्बल तो एक ही है। अगर सारा दादा को दे दिया तो जब
तुम बूढ़े और बीमार होकर बाहर चारपाई बिछाओगे तो मैं तुम्हें दूंगा।
नौजवान बाप लड़के की ये भोली बात
सुनकर सुन्न हो गया और बाप से माफी मांगकर खिदमत करने लगा। जिससे बाप भी खुश हो
गया और उसकी आखिरत भी संवर गई।

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