पंचायती राज
पंचायती राज की संकल्पना इस देश की सबसे दूर दराज के गावों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए बनाई गयी है। ऐसे में जब संवैधानिक ढांचे की पहुंच निचले स्तर तक है तो फिर विकास क्यों नहीं होता। कहा जाता है कि छोटे राज्य ही विकास का आधुनिक प्रतिमान हैं तो पूर्वोत्तर के उन छोटे और मझौंले राज्यों के विकास के बारे में कोई क्यों नहीं सोचता। यह तब है जब उनके पास प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी भी नहीं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण नए गठित राज्य हैं जो स्वयं अपनी कहानी बयान कर रहे है तथा जिन राज्यों से इन्हें अलग किया गया उनकी भी स्तिथी बद से बदतर हो गयी।
आज नए राज्यों के बनने के पक्ष में पूर्व
में बने कुछ राज्यों की बढ़़ी़ हुई जी.डी.पी. यानी सकल घरेलू उत्पाद का हवाला दिया
जा रहा है। पर वास्तविकता देखी जाए तो यह केवल अर्थशास्त्रियों के कागजों का
गणित मात्र है। विकास संयुक्तता में है और यदि बंटवारे का ही नाम विकास है तो वह
दिन दूर नहीं जब बंटवारे के लिए कुछ नहीं बचेगा और विकास शब्द स्वयं अपनी
सार्थकता खोज रहा होगा।

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