ओजोन परत के क्षरण से प्रकृति हाेेेनेे वाली हानियां
ओजोन एक वायुमंडलीय गैस है जिसे हम ऑक्सीजन का एक प्रकार भी कहते हैं। ऑक्सीजन के दो परमाणुओं से जुड़ने से ऑक्सीजन गैस बनती है, जिसे हम सांस लेते समय फेफड़ों के अंदर खींचते हैं। तीन ऑक्सीजन परमाणुओं के संबंध से ओजोन का एक अणु बनता है। इसका रंग हल्का नीला होता है और तीव्र गंध आती है। ओजोन गैस वायुमंडल में अत्यंत पतली एवं पारदर्शी परत बनाते हैं। वायुमंडल में समस्त ओजोन का कुल 90 प्रतिशत भाग समताप मंडल में पाया जाता है। वायुमंडल में ओजोन का कुल प्रतिशत अन्य गैसों की तुलना में बहुत ही कम है। प्रत्येक दस लाख वायु अणुओं में दस से भी कम ओजोन अणु होते हैं। ओजोन की कुछ मात्रा निचले वायुमंडल में पाई जाती है। रासायनिक रूप से समान होने पर भी दोनों स्थानों पर ओजोन की भूमिका महत्वपूर्ण है। समताप मंडल में यह पृथ्वी को हानिकारक पराबैंगनी विकिरण बचाने का काम करती है।
क्षोभमंडल में ओजोन हानिकारक संदूषक के रूप में कार्य करती है कभी-कभी प्रकाश रासायनिक धूम भी बनाती है। क्षोभमंडल में यह गैस बहुत कम मात्रा में भी मानव के नुकसान पहुंचा सकती है। समताप मंडल में स्थित ओजोन परत समस्त भूमंडल के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती है। यह सूर्य की हानिकारक बैंगनी किरणों को उपरी वायुमंडल में ही रोक लेती हैं, उन्हें पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंचने देती। पराबैंगनी विकिरण मनुष्य, जीव, जंतुओं और वनस्पतियों के लिए अत्यंत हानिकारक है। परबैंगनी किरणों से त्वचा का कैंसर होने की संभावना रहती है। इन किरणों के कारण आंखो में मोतियाबिंद की बीमारी उत्पन्न होती है और यदि समय पर उपचार ना किए जाए तो मनुष्य अंधा भी हो सकता है। परबैंगनी किरणें मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम करती हैं, जिसके कारण वह कई संक्रामक रोगों का शिकार हो जाता है। एक विशेष प्रकार की पराबैंगनी किरणें समुद्र में कई किलोमीटर तक प्रेवश कर समुद्री जीवन को क्षति पहुंचाती हैं। यदि कोई गर्भवती महिला इनके संपर्क में आ जाए तो गर्भस्थ शिशुको अपूर्णिय क्षति हो सकती है।
ओजोन परत संरक्षण हेतु 1985 में आस्ट्रिया की राजधानी में वियाना कन्वेंशन संपन्न हुई, ओजोन परत के क्षरण की समस्या पर विश्व भर का ध्यान आकर्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र ने 16 दिसंम्बर का दिन विश्व ओजोन दिवस के रूप में मनाने क निर्णय लिया। 16 दिसम्बर 1987 को सयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में ओजोन छिद्र से उत्पन्न शंका निवारण हेतु कनाडा के मांट्रियाल शहर में 33 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसे मांट्रियाल प्रोटोकाल कहा जाता है। इस सम्मेलन में यह तय किया गया कि ओजोन परत का विनाश करने वाले पदार्थ कार्बनिक (सी.एफ.सी.) के उत्पादन एवं उपयोग को सीमित किया जाए। भारत ने भी इस प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर किए।

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