बुढि़या का झोंपड़ा
कहते हैं कि बादशाह ने महल बनवाना
चाहा तो उसको चोकोर बनाने के लिये एक तरफ कुछ जमीन कम पड़ रही थी। जिसपर बुढि़या
का झोंपड़ा था ।
सरकारी नौकरों ने बुढि़या से जमीन
खरदना चाही तो उसने बेंचने से मना कर दिया।
बादशाह को जब ये खबर हुई तो उसने
नौकरों से कहा भले ही महल चोकोर बने या न बने मगर बुढि़या को परेशान न किया जाय।
शाही महल एक तरफ से टेढ़ा बन गया ।
महल बन चुका तो बुढि़या ने हाजिर
होकर अर्ज की।
बादशाह सलामत सचमुच शाही महल इस झोंपड़े की जमीन लिये बगैर
टेढ़ा तिरछा अच्छा नहीं लगता लीजिये ये जमीन बिना कीमत के आपको देती हूं।
बादशाह ने पूछा । तुमने पहले क्यों
मना कर दिया था?
बुढि़या ने जवाब दिया कि । सिर्फ
इसलिये कि पूरी दुनिया में आपके इंसाफ का डंका बज जाये।
इस पर बादशाह ने बुढि़या को तो
इनआम देकर भेज दिया । मगर उसकी जमीन नहीं ली और महल को टेढ़ा ही रहने दिया।
बादशाह और बढि़या तो इस दुनिया से
चले गये मगर इंसाफ की ये कहानी लोगों को याद है और हर एक से इंसाफ करने वाले
बादशाह की कहानी सुनवा रही है अगर हर एक आदमी इसी तरह इंसाफ से काम लिया करे तो
उससे खुदा भी खुश हो जाये और बंदे मख्लूक भी।

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