हजरत िनिजामुद्दीन औलिया (रह.) भाग-75
आखिर हजरत निजामुद्दीन औलिया के
होठों को हरकत हुई अच्छा खुसरू तुम ऐसे
नहीं मानोगे यकीनन नहीं मानोगे मगर तुम भी क्या कर सकते हो कि लोहे महफूज पर यही लिख
चुका है’’ उसके बाद हजरत निजामुद्दीन औलियाने अपने खादिम
खास ख्वाजा इकबाल को तरबूज लाने का हुक्म दिया। जब ख्वाजा इकबाल तरबूज ले आये
तो हजरत महबूब इलाही ने फरमाया कि उसे एक
ख्वान में रखकर सुर्ख कपड़े से ढांक दो।
जब ख्वान तैयार हो गया तो हजरत
महबूब इलाही ने हजरत अमीर खुसरू को हुक्म देते हुए फरमाया’’
उसे सैयद अहमद बहार के पास ले जाओ सलाम
पेश करने के बाद अर्ज करना ये ख्वान निजामुद्दीन ने आपके लिये भेजा है’’
हजरत अमीर खुसरू बड़ी हैरत से पीरो
मुर्शिद के उस अमल को देख रहे थे।‘’ कुछ और अर्ज करूं? नहीं बस इतना कह देना काफी है।
सैयद खुद समझ लेंगे। ‘ हजरत निजामुद्दीन औलिया ने फरमाया और फिर अपने हुजरे
मुबारक में तश्रीफ ले गये।
सैयद अहमद बहार एक अजीब व गरीब बुजुर्ग हैं। हालात ने उनकी जिंदगी पर गहरा पर्दा डाल दिया
है। इसलिये पता नहीं चलता कि सैयद कहां से आये थे और उनका अरिफाना मकाम क्या है? फिर भी सैयद अहमद बहार के मन्सबे
विलायत को समझने के लिये ये दलील काफी है हजरत निजामुद्दीन औलिया उनका बेहद एहतराम करते थे सैयद अहमद बहार
जिंदगीभर एक अजीब काम करते रहे जिसके मकसद को अल्लाह जानता है या औलिया इकराम उनके इस काम की अक्ली दलील पेश करने से आजिज
हैं देहली के आस पास के तमाम लोग जानते थे कि सैयद अहमद बहार
नमाज फजिर अदा करने के बाद आपने हाथों से मिट्टी तैयार करते थे और फिर दिनभर उसी
मिट्टी से दीवार बनाते थे । मगरिब की आजान तक सैयद का ये काम जारी रहता और फिर जैसे ही नमाज का वक्त आता, सैयद इस दीवार को गिरा देते ।
सुबह होते ही उस मिट्टी को दोबारा गूंधते
और दीवार उठाना शुरू कर देते शाम
होती और हर दिन की तरह वो दीवार गिरा दी
जाती । बर्षों से सैयद अहमद बहार का यही काम
था।
मश्हूर रिवायत है कि जब हजरत
निजामुद्दीन औलिया हजरत नसीरूद्दीन चिराग को खिलाफत अता कर रहे थे, उस वक्त हजरत महबूब इलाही ने
अपने खुद्दाम को खीर पकाने का हुक्म दिया। फिर जब खीर तैयार हो गई तो हजरत
निजामुद्दीन औलिया ने अपने दोनो खास मुरीदों हजरत नसीरूद्दीन चिराग और हजरत अमीर खुसरू से फरमाया’ ये खीर सैयद अहमद बहार की खिदमत
में ले जाओ’’।
जब हजरत चिराग देहली और हजरत अमीर खुसरू
उस मर्दे बुजुर्ग के पास पहुंचे तो ये देखकर हैरान रह गये कि सैयद अहमद बहार के
हाथ मिट्टी में आलूद हैं और वो दीवार बना रहे हैं, हजरत अमीर खुसरू और हजरत
नसीरूद्दीन चिराग ने देहली के कमाले अदब
से सलाम अर्ज किया और खीर का तबाक सैयद अहमद बहार के सामने पेश कर दिया।
सैयद अहमद बहार ने इंतिहाई शफकत आमेज नजरों से दोनों को देखा और बड़े
वालहाना अंदाज में पूछा ‘’ महबूब इलाही कैसे हैं?’’
हजरत अमीर खुसरू ने अपने पीरो
मुर्शिद की खैरियत बयान की मगर आप बड़ी हैरत से सैयद अहमद बहार की तरफ देख रहे थे ।
खुसरू को समझ नहीं आ रहा था कि ये बुजुर्ग हैं कौन और पीरो मुर्शिद इनसे क्या काम
लेना चाहते हैं ? अभी अमीर खुसरू की जहनी कशमकश जारी थी कि सैयद अहमद
बहार ने अपने आलूद हाथ खीर में डाल दीये मिट्टी के मिलने से खीर का रंग इस कदर तब्दील हो गया कि
वो लजीज गिजा भी मिट्टी नजर आने लगी। उसके बाद सैयद अहमद बहार ने हजरत अमीर खुसरू
से फरमाया। ‘’
इसे खा लो’’ ।
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग’-71
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-72
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-73
- हजरत निजामुद्दीन औलिया भाग-74

Comments
Post a Comment