हजरत निजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-70
खामोश थे। फिर जब शोर गुल कुछ कम हुआ तो मौलाना हमीदुद्दीन ने फरमारवाए हिंद
को मुखातिब करते हुए फरमाया जिस तरह मुखालिफीन सुल्तानुल मशाइख की मज्लिस का
जिक्र कर रहे हैं , दर असल ये मामला नहीं है’’
फिर क्या बात है ? सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने पूछा।
मामला इसके उल्टा है ‘’ मौलाना हमीदुद्दीन ने फरमाया ‘’ मैं सुनी सुनाई बातों पर यकीन
नहीं करता। मैं खुद हजरत वाला की खानकाह में हाजिर हुआ हूं, समा में शामिल होने वाले तमाम
दरवेश और पीरों को अपनी आंखों से देखा है सबके सब होशमंद और सलीके के लोग हैं।‘’
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक पर मौलाना हमीदुद्दीन की बातों का असर हुआ तो ये
सूरत हाल देखते ही काजी जलालुद्दीन दिलवाजी बीच में बोल उठे। हजरत इमाम अबू हनीफा
की रिवायत के मुताबिक समा हराम है और रक्स फिस्क है।‘’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने जवाबन फरमाया। काजी साहब आपको इल्म नहीं, ये रिवायत मश्रूत है और इसमें
इम्तिनाई हुक्म मौजूद नहीं’’।
अभी ये गुफ्तगू जारी थी कि हजरत शेख बहाउद्दीन जकरिया मुल्तानी के नवासे
मौलाना इल्मुद्दीन तश्रीफ ले आये सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक उनका बेहद एहतिराम
करता था ,
फौरन ही मौलाना की तरफ मुतवज्जे हुआ । तुम दानिशमंद भी और मुसाफिर भी । इस वक्त
समा के के बारे में बहस हो रही है। मैं इस सिलसिले में तुम्हारी
राय जानना चाहता हूं कि समा हराम है या हलाल?
मौलाना इल्मुद्दीन ने फरमाया । मैंने
इससे मुतअल्लिक एक रिसाला’’ मकसदा’’ तहरीर किया है और उसमें तमाम दलाइल जमा कर दिये हैं। जो लोग समा को दिल से सुनते हैं उनके लिये सबाह
और जो लज्जते नफ्स की खातिर सुनते हैं , उन पर हराम है।‘’
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने मौलाना इल्मुद्दीन से दूसरा सवाल किया। तुमने
बगदाद ,
शाम का सफर किया है, उन मुल्कों के मशाइख समा सुनते हैं या नहीं?
और कोई इस काम में मजाहमत करता है या नहीं?
मौलाना इल्मुद्दीन ने तमाम मसलहतों और नजाकतों को एक तरफ रखते हुए फरमाया। उन
तमाम इलाकों के मशाइख पूरे जोक शौक से साथ समा सुनते हैं और बाज हजरात दफ और शबाना(शहनाई)
के साथ भी सुनते हैं। ये रिवायत हजरत जुनैद बगदादी और हजरत अबूबक्र शिबली के जामने
से चली आ रही है।‘’
मौलाना इल्मुद्दीन की गुफ्तगू सुनकर सुलतान गयासुद्दीन तुगलक खामोश हो गया।
काजी जलालुद्दीन दिलवाजी को अपनी शिकस्त साफ नजर आ रही थी, इसलिये घबराकर बोल उठे। सुल्तान
पर लाजिम है कि समा के हराम होने का हुक्म जारी फरमायें और इस लिससिले में हजरत
इमाम अबू हनीफा के मसलक को पेशे नजर रखा
जाए’’
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक खामोश रहा।
सूरतहाल को अपने हक में न पाकर काजी जलालुद्दीन दिलवाजी हजरत महबूब इलाही से
मुखातिब हुए। शेख निजामुद्दीन कोई कुछ भी कहे मगर ये बात साबित हो चुकी है कि तुम
अपने मुरीदों के साथ अक्सर ‘’ समा व जज्ब’’
में गर्क रहते हो। क्या तुम अपनी
इस गलत रविश के सिलसिले में बुजुर्गाने सलफ के हवाले से कोई मोअतबर रिवायत पेश कर
सकते हो?
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने रिसालत मआब सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस बयान फरमाई।
काजी जलालुद्दीन ने आलिमाना वकार व संजीदगी को बरकरार नहीं रखा और वो भरे दरबार में गुस्सा हो गये-।‘’ तुम मुजतहिद या मुहद्दिस नही हो
कि कौले रसूल सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम
से अपने दावे की दलील पेश करो तुम एक महज मुकल्लिद हो। इसलिये हजरत इमाम अबू हनीफा की कोई रिवायत बयान
करो ताकि तुम्हारी बात सुनी जा सके। काजी
जलालुद्दीन दिलवाजी का लहजा तजहीक आमेज था।
तमाम उलेमा हिंद इस हकीकत से ब खबर थे कि हजरत निजामुद्दीन औलिया रिवायत हदीस में
दर्जा ए एतिबार रखते थे हजरत महबूब इलाही ने उन मशाइख इकराम से हदीस का दर्स लिया
था जिनकी इल्मी फजीलत के दोस्त व दुश्मन सभी काइल थे और उन्ही फिकहाए इजाम ने
हजरत निजामुद्दीन औलिया को रिवायत हदीस की इजाजत मरहमत फरमाई थी। काजी जलालुद्दीन
भी जानते थे कि इल्म हदीस में हजरत महबूब इलाही का क्या दर्जा है? मगर जज्बा हसद और दिल की कुदूरत
ने उन्हें सब कुछ भुला देने पर मजबूर कर दिया था।
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने बड़े सब्र तहम्मुल से काजी जलालुद्दीन का एतिराज
सुना और फरमाने लगे। ‘’ सुब्हानअल्लाह’’
क्या अजीब बात है कि कौले मुस्तफा सल लल्लाहु अलैहि वसल्लम को होते हुए
आप मुझसे कौले अबू हनीफा तलब करते हैं।‘’
काजी जलालुद्दीन मजीद बहस करना चाहते थे
मगर हजरत महबूब इलाही मज्लिस से उठ खड़े हुए और सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक
को मुखातिब होकर फरमाया। आपके हक में यही बेहतर है समा पर पांबदी आइद न की करें।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के जलाल रूहानी का ये असर था कि फरमारवाए हिंदुस्तान
एक लफ्ज तक नहीं कह सका । फिर हजरत महबूब इलाही ने हाजिरीन मजिलस को सलाम किया और
मज्लिस से तश्रीफ ले गये।

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