हजरत िनिजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-71
कह सका – फिर हजरत महबूब इलाही ने हाजिरीन मजिलस को सलाम किया और मज्लिस से
तश्रीफ ले गये-
मुखालिफीन का मंसूबा ना काम हो चुका था। हजरत निजामुद्दीन औलिया तश्रीफ के ले जाने के
बाद शेखजादा फरजाम, काजी जलालुद्दीन दिलवाजी और दूसरे उलेमा ने बहुत शोर गुल
किया,
वाली-ए- हिंदुस्तान पर तरह तरह से दबाओ डाला मगर सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने
समा की मजालिस पर पाबंदी आइद नही की। ये
हजरत महबूब इलाही के मुखालिफीन की बड़ी शिकस्त थी।
उस मुनाजरे के ग्यारा दिन बाद सुल्तान तुगलक किसी बात पर जलालुद्दीन दिलवाजी
से नाराज हो गया और उसने काजी साहब को उनके ओहदे से हटा दिया गया। दरबार में मौजूद लोगों ने जो हुक्मे सुल्तानी सुना तो उनके कानों में हजरत निजामुद्दीन औलिया के ये अल्फाज
गूंजने लगे’’
काजी साहब आप अपने ओहदे पर बरकरार रहेंगे तो किसी को सजा देंगे।‘’
फिर कुछ दिल बाद काजी जलालुद्दीन ये हसरत दिल में लिये हुए दुनिया से रूखसत
हुए कि वो हजरत महबूब इलाही को समा सुनने से रोक देंगे।
हजरत ख्वजा हसन संजरी की शहरा ए आफाक
तालीफ’’
फवाइदुल फवाइद’’ में समा का बार बार जिक्र आया है। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने कई मौकों पर समा की
हकीकत बयान करते हुए फरमाया है। ‘’ समा एक मौजू
सूरत है इसलिये अपनी फितरत में हराम नहीं। समा से कल्ब में गर्मी पैदा होती है। अगर ये तहरीर यादे इलाही
के लिये है तो मुस्तहब है और अगर फसाद की तरफ माइल हो हराम है। फसाद से मुराद लज्जत
–ए नफ्स का हुसूल है।
हजरत महबूब इलाही ने समा के लिये पांच शराइत लाजमी करार दी है। अगर उनमें से एक भी शर्त साकित हो जाये तो
मज्लिस-ए- समा महफिल कैफ मतरब में बदल जायगी और समा का मकसद फना हो जायेगा।
वो समा जिससे हजरत महबूब इलाही रगबते खास रखते थे, उसकी पहली शर्त ये है कि कलाम पेश
किया जाये वो आरिफाना हो(हम्दो नात पर मुशतमिल हो) या इंसानी जज्बात को आला अखलाक की तरफ उभारने
वाला हो। दूसरी शर्त ये है कि कलाम सुनने वाला खुद भी परहेजगार हो। फासिक फाजिर न
हो पुख्ता उम्र रखता हो। कोई लड़का इस
हल्के में शामिल नहीं हो सकता तीसरी शर्त ये है कि समा सुनते वक्त इंसान की नियत
दुरूस्त हो अगर वो अपने सीने में इश्के
खुदाबंदी का गुदाज पैदा करने के लिये समा सुन रहा है तो जायज है और अगर समा का मकसद हुसूल तफरीह व निशात है तो सुनने
वाले का ये काम बिल्कुल हराम है चौथी
शर्त ये कि है कि महफिल-ए- समा में आलाते
मौसिकी चंग रूबाब और दूसरे मजामीर से मुकम्मल इज्तिनाब किया जाय पांचवी शर्त ये
है कि मज्लिसे समा में ख्वातीन की शिरकत तो दरकिनार, उस मकाम पर औरतों का साया भी नहीं
पड़ना चाहिये।
जिस मर्दे जलील ने इस कदर एहतियात
के साथ अपनी महफिले समा को आरास्ता किया हो, उस पर लहू लोअब का इल्जाम आइद
करना तअस्सुब और तंग नजरी के सिवा कुछ नहीं, उलेमा ए वक्त हजरत निजामुद्दीन
औलियाके इस अमल को बुनियाद बनाकर हंगामा
आराई की थी,
वो दरअसल हजरत महबूब इलाही की बे पनाह हर
दिल अजीजी और मकबूलियत से जलते थे। यहां इस हकीकत का कुबूल करना बड़ा तकलीफ दे महसूस होता है कि उलेमा ने ‘’ समा’’ की आड़ लेकर उस शख्स को मुजरिम
साबित करने में अपनी तमाम तर कुव्वतें और सलाहियतें सर्फ कर दी जो अल्लाह के
बीमार बंदों का मसीहा था और जो लोग खुले तौर पर गुनहगाराना जिंदगी बसर कर रहे थे उनके खिलाफ आवाज
बुलंद करने वाला कोई नहीं था। उमरा शराब
पीते थे ,वुजारा
दिन रात फिस्क फुजूर में मुब्तिला रहते थे , रक्स की महफिलों में मजबूर
औरतों को नचाया जाता था , मआशी न हमवारीयां और जुल्म तशद्दु तमाम था। ये वो मुहाज थे जहां उलेमा इकराम को तागूती
ताकतों से नबर आजमा होना चाहिये था मगर हम देखते हैं कि अहले इल्म की जमाअत
दरबारे शाही में नशिस्त हासिल करने के लिये बे करार रहती थी, मन्सबे कजा तक पहुंचना एक बड़ा
एजाज था और इस एजाज तक पहुंचने के हुसूल
की खातिर उलेमा में कभी कभी एसी कशमश नजर आती थी जैसे दो सियासी गिरोह आपस में टकरा
रहे हों।
इस सूरत-ए- हाल से हटकर उलेमा को
जिन समाजी खराबियों में सुधार करना चाहिये थी वो बदस्तूर मौजूद थीं और सारी कुव्वतें
सिर्फ एक मसअले पर सर्फ हो रही थीं कि समा
हराम है या हलाल? अहले इल्म की इसी तंगनजरी ने हिंदुस्तान की इस्लामी
तारीख को नुकसान पहुंचाया बिलफर्ज अगर उलेमा ए जाहिर को हजरत निजामुद्दीन औलिया और
दूसरे दरवेशों से कुछ शरअई इख्तिलाफात थे भी तो उनके इजहार का ये तरीका मुनासिब नहीं था।
बुत परस्तों की जमीन पर इस्लाम की इब्तिदाई बारिशें हुई थीं। यहां की सियाह मिटटी के सफ्फाफ पानी
की तासीर को महसूस कर रही थी फरान की जांफरा हवाएं हिमालय की सर्द और बे जान फिजाओं में नई रूह फूंक रही थीं। अभी तो इंकिलाब का आगाज हुआ था। अभी फसल तैयार
कब हुई थी कि आने वाले किसानों ने अपने खेतों की तरफ से मुंह मोड़ लिया और आफाते
आरजी का मुकाबला करने की बजाय आपस में उलझ पड़े। दरवेशों का तो ये उसूल था कि वो
बंजर जमीनों को भी नजरअंदाज नहीं करते थे।
जिस दिल में ईमान की जरा भी गुंजाइश नजर आई उसे इस्लाम का पैगाम दे दिया । आंखों
का जिस कदर पानी जलते हुए पत्थरों पर छिड़क दिया
ये दरवेशों की आला जरफी और कुशादा
दिली ही थी जो अहले हुनूद की रूहों में उतर गई
और जिसने दिलों के अंदर पोशीदा सनम खाने भी ढा दिये । अगर तब्लीग का ये
काम उलेमा ए जाहिर पर छोड़ दिया जाता तो सारी जिंदगी इल्मी मौशिगाफियों में उलझे
रहते और मख्लूक खुदा चश्मा ए हिदायत पर
पहुंच कर भी तिश्ना लब ही लौट जाती।
ये हजरत निजामुद्दीन औलिया और दूसरे दरवेशों की ही जमात थी जिसने बड़े से बड़े
गुनहगार को भी अपने सीने से लगाया और गुमकर्दा राह लोगों को यकीन दिलाया कि अल्लाह
उनके अंदाजों से कहीं ज्यादा मेहरबान है, रहीम और बख्शने वाला है।
‘’
आओ भलाई की तरफ’’
...... और जब लोग भलाई के रास्ते पर आ जाते थे तो दरवेशों का दूसरा पैगाम होता
था। ‘’
आओ नमाज की तरफ ..... आओ नमाज की तरफ ।‘’

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