हजरत िनिजामुद्दीन औलिया(रह.) पाठ-74
हमने पूरी तहकीक के साथ तमाम विसवसनीय हवाले जमा करने की कोशिश की ताकि
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की मौत के जाहिरी और माद्दी वजह का सुराग मिल सके । अब
हम एक और तारीखी रिवायत पेश करेंगे जो अपनी नोइयत के एतिबार से तन्हा भी है और
मुनफरिद भी । ये रिवायत तारीख’’ मुबारक शाही’’
से ली गई जिसका मुसन्निफ यहया अहमद सर हिंदी है यहया सर
हिंदी लिखता है कि सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की मौत का सबब शेखउल अकताब हजरत
निजामुद्दीन औलिया की दिल आजारी थी । हजरत शेख ने सुल्तान की रवानगी के वक्त फरमाया
था कि अभी दिल्ली दूर है। फिर जब गयासुद्दीन तुगलक एक फातेह की हैसियत से देहली
के करीब पहुंचा तो इस्तिकबाल करने वाले लोगों से इंतिहाई फख्र के अंदाज में कहा ‘’ मैं दुश्मन के सीने पर पांव रखकर
बखैरियत वापस आ गया।
जब हजरत निजामुद्दीन औलिया को सुल्तान
के इस दावे की खबर दी गई तो आपने फरमाया ‘’ हुनूज दल्ली दूर अस्त।‘’
फिर उसके बाद महल के गिरने और सुल्तान
के हलाक होने का वाक्या पेश आया। जब
गयासुद्दीन तुगलक की रूह ने उसके जिस्म का साथ छोड़ा तो वो देहली से चार – पांच
मील दूर था।
अब तक जिस कदर तफ्सीलात पेश की
गई वो मुख्तलिफ तारीख नवेसों को तजजिया
था। बहुत से इतिहासकारों ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की मौत का जाहिरी सबब बयान
करते हुए सुल्तान की अचानक मौत को हादसा समझाया फिर उसको शहजादा मोहम्मद तुगलक की
साजिश करार दे दिया । इतिहासकारों की उस जमाअत में सिर्फ यहया बिन अहमद सर
हिंदी है जो सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक की
मौत के पशे मंजर में हजरत निजामुद्दीन औलिया की रूहानी कुव्वत का जिक्र करता है।
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक हजरत
महबूब इलाही को देहली छोड़ने की धमकी देने और हुक्म सुल्तानी के ना मानने के
नतीजे में दर्दनाक सजा की धमकी देकर लखनौती चला गया । हजरत अमीर खुसरू उस सफर में
सुल्तान के हमराह तश्रीफ नहीं ले गये थे। जब गयासुद्दीन तुगलक लखनौती की तरफ कूच कर गया तो हजरत अमीर खुसरू
ने पीरो मुर्शिद के हुजूर अर्ज किया । सैयदी
सुल्तान अपने न पसंदीदा अफराद को कभी माफ नहीं करता’’ ।
‘खुसरू उसके माफ करने या न करने से
क्या होता है?
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने जवाबन फरमाया ।‘’ क्या वो इस जमीन का मालिक है कि
वो जिससे चाहे कयाम का हक छीन ले और जिसे चाहे सुकूनत की इजाजत दे दे । वो तो खुद
एक मुसाफिर है। दुनिया की सराय पर उसे उससे ज्यादा इख्तियार हासिल नहीं कि वो
खामोशी से रात गुजारकर चला जाय ।‘’
हजरत अमीर खुसरू पीरो मुर्शिद के अदब की वजह से खामोश हो गये लेकिन आप के चेहरे से सख्त परेशानी
के निशानात जाहिर हो रहे थे कुछ दिन बाद
बाद आपने पीरो मुर्शिद के जनाब में दोबारा अर्ज किया। सैयदी मैं ने रवानगी के वक्त
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के चेहरे पर बड़े सफ्फाक जज्बात का अक्स देखा था ।
गुलाम ये नहीं चाहता कि उसके आका को मामूली सी भी तकलीफ पहुंचे ।
‘’ खुसरू तुमने अभी तक इस वाक्ये को भुलाया नहीं है? अपने मुरीदे
खास की बे चैनी देखकर हजरत महबूब इलाही ने
मुस्कुराकर फरमाया ।
‘’ सैयदी ये कोई आम वाक्या नहीं
है खादिम इसे भुला दे। हजरत
अमीर खुसरू की परेशानी बढ़ती जा रही थी।
‘’ नहीं खुसरू तुम अपने जहन को गुबार
आलूद न करो’’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपने मुरीद की तालीफ ए कल्ब के लिये फरमाया अभी दिल्ली दूर है हजरत महबूब इलाही ने अपनी जबान मुबारक से वही अल्फाज
फरमाये जो आपने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के हुक्म नामे की पेशानी पर तहरीर
फरमाये थे।
वक्त बहुत तेजी से गुजर रहा था ।
इस दौरान गयासुद्दीन तुगलक लखनौती (बंगाल)
से देहली की जानिब कूच कर चुका था हजरत
अमीर खुसरू दरबारे सुल्तानी में एक मुमताज मकाम रखते थे , इस लिये आपको लम्हे लम्हे की खबर
मिल रही थी ,
जब अमीर खुसरू को ये मालूम हुआ कि शहजादा मोहम्मद तुगलक अपने बाप के वाल्हाना
इस्तिकबाल के लिये देहली से अफगान पुर के लिये रवाना हो चुका है तो आपने पीरो मुर्शिद
के सामने रोते हुए अर्ज किया सैयदी अब तो गयासुद्दीन तुगलक अपनी मंजिल के बहुत
करीब पहुंच चुका है’’
हजरत महबूब इलाही ने हजरत अमीर
खुसरू की परेशानी को महसूस किया मगर जबान से वहीं अल्फाज फरमाये
दिल्ली अभी दूर है। उस वक्त सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली से तकरीबन चार पांच मील के फासले पर था और शहजादा मोहम्मद
तुगलक के बनवाये हुए नये महल के करीब पहुंच चुका था। हजरत अमीर खुसरू दरबारे शाही के एक मुअज्जि रूक्न होने बाइस
जानते थे कि सुल्तान गयासुद्दीन अफगान पुर के नो तामीरकर्दा कोशक में महज रात बसर
करेगा और सुबह रवाना होकर देहली पहुंच जायेगा। इस तरह
तुगलक के देहली पहुंचने में चौबीस घंटे का
वक्त था और अगर उसूली तौर पर देखा जाए तो फरमा रवए हिंद देहली के मजाफात में
दाखिल हो चुका था मगर हजरत महबूब इलाही मुसलसल यही फरमा रहे थे ‘’ देहली अभी दूर है’’
हजरत निजामुद्दीन औलिया का ये
इत्मिनान ए कल्ब आपकी शान ए कलंदरी का मजहर था मगर मुरीदीन और खुद्दाम उस हकीकत
को समझने से कासिर थे और उनकी आंखे पसे मंजर को देखने की सलाहियत से महरूम थीं। इसलिये उनका पेरशान होना इंसानी फितरत के ऐन
मुताबिक था। हजरत अमीर खुसरू कुछ देर तक खामोश बैठे रहे और फिर अपने पीरो मुर्शिद
के हाथ पकड़कर रोने लगे। सैयदी ये गुलाम फरमूदा शेख पर लबकुशाई की जुराअत नहीं
रखता मगर अब दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है। जब तक आप तुगलक का कोई इंतेजाम नहीं
फरमाएंगे ,ये
खादिम यूं ही रोता रहेगा।
अहले मज्लिस ने देखा अमीर खुसरू
जारो कतार रो रहे थे। खानकाह के दर दीवार पर एक अजिय्यत नाक सुकूत तारी था। तमाम
खुद्दाम के चेहरे उदास और आंखे ना काबिल बयान इज्तिराब को जाहिर कर रही थी।

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