हजरत िनिजामुद्दीन औलिया(रह.) भाग-77
हुकूमत बड़ी खौफनाक चीज है अक्सर
हुक्मरां इस काम में अपनी औलाद की शिरकत भी बर्दाश्त नहीं करते अगर हजरत महबूब
इलाही ने शहजादा मोहम्मद को फरमारवाए हिंद बनने की खुशखबरी सुनाई थी तो उसमें क्या
बुराई थी?
सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के बाद उसूली तौर पर उसके बेटे को ही सरबारा- ए- सल्तनत
होना था ये खबर सुनकर गयासुद्दीन तुगलक को खुशी का इजहार करना चाहिये था कि उसका
इक्तिदार गैर हाथों में नहीं है मगर हवस ने उसे नये अंदाज से वरगलाया और वो हजरत
निजामुद्दीन औलिया की बातों को अपने खिलाफ
साजिश समझने लगा।
तुगलक का ख्याल था कि हजरत महबूब
इलाही शहजादा मोहम्मद तुगलक को बगावत के लिये उकासा रहे हैं। फिर इसी बदगुमानी ने
वाली हिंदुस्तान को इस जाते गिरामी का दुश्मन बना दिया जिनका वुजूद मसऊद हिंदुस्तान
के बाशिंदों के लिये मसीहा का दर्जा रखता था अल गर्ज इसी तंग नजरी की वजह से कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिल्जी की तरह सुल्तान
गयासुद्दीन तुगलक अपने इबरतनाक अंजाम को पहुंचा।
अब हम हजरत निजामुद्दीन औलिया की
तरफ से दी जाने वाली दावत की तरफ लौटते हैं जब शहजादा मोहम्मद तुगलक खाना खाकर चला गया तो
हजरत महबूब इलाही ने अपने खिदमगार से फरमाया ‘’ खानकाह के दरवारे पर एक शख्स
खड़ा है जो निहायत शरीफ बातिन है और शक्ल व सूरत से भी शराफत व नेकी की तस्वीर
है, उसे बुलकार ले आओ।‘’
दर असल वाक्या ये था कि ‘’सल्तने बहमनी’’ का बानी सुल्तान अलाउद्दीन हसन
गंगो बहमनी हुकूमत चाहता था और बहुत दिनों से इक्तिदार हासिल करने की कोशिश कर रहा
था। फिर जब वो हर तरह ना काम हो गया तो एक सवाली की हैसियत से हजरत निजामुद्दीन
औलिया के आस्ताने आलिया पर हाजिर हुआ। जब शहजादा मोहम्मद तुगलक खाना खा रहा था, उस वक्त हसन गंगोह बहमनी निहायत
शिकस्ता हालत में खानकाह के दरवोजे पर खड़ा था।
हजरत निजामुद्दीन औलिया के खादिम ने
मतलूबा आदमी को बहुत तलाश किया। फिर वो नाकाम होकर पीरो मुर्शिद की खिदमत में
हाजिर हुआ।‘’
मखदूम वहां तो बोशीदा कपड़ों मे एक परेशानहाल खड़ा शख्स खड़ा है।
हजरत महबूब इलाही ने फरमाया। ‘’ हां वही शख्स है जो ब जाहिर फकीर
मालूम होता है लेकिन दर हकीकत वो एक दिन दक्किन का ताजदार होगा।
खादिम दोबारा गया और हसन गांगोही
से कहने लगा ‘’
चलो हजरत शेख ने तुम्हें याद फरमाया है।
हसन गांगोही हजरत महबूब इलाही की
खिदमत में हाजिर हुआ और बड़े वालहाना अंदाज में अर्ज करने लगा। ‘’ शेख आपका हुस्ने करम कि मुझ जैसे
भिकारी को शर्फे बारयाबी बख्शा’’
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने बड़ी
मोहब्बत से हसन गांगोह को अपने पास बिठाया और उसका हाल पूछा । हजरत महबूब इलाही
की ये शफकत व मेहरबानी देखकर हसन गांगो रोने लगा। हजरत निजामुद्दीन औलिया ने उसे
तसल्ली देते हुए फरमाया। ‘’ एक सुल्तान को जैब नहीं देता कि अल्लाह की रहमत से
मायूस हो जाये’’
कुछ देर बाद हजरत निजामुद्दीन
औलिया ने एक खिदमगार से अपने अफ्तार की रोटी मंगवाई आम लंगर का खाना खत्म हो चुका
था इसलिये महबूब इलाही ने निवाला बनाकर हसन गांगो को दिया। फिर फरमाया’’ ये दक्किन का ताज है जो तुझे शदीद
कशमकश के बाद हासिल होगा।‘’
हजरत महबूब इलाही की ये पेशनगोई
बाइस साल के बाद पूरी हुई। 747 हिजरी में हसन गांगोह के सर पर दक्किन की सल्तनत का ताज रखा गया और
वो हिंदुस्तान में बहमनी सल्तनत का बानी करार पाया।
हजरत महबूब इलाही ने मुखालिफों की
इसी हुजूम में जिंदगी बसर की । कभी ‘ तारिके सुन्नत कहलाये और कभी बिदअती कभी आपकी शब व
रोज पर बे खबरी का इल्जाम आइद किया गया और कभी कुरआन व सुन्नत से अदम आगही की
तोहमत तराशी की गई । ‘’ मुफ्तियान-ए- वक्त ‘’ और ‘’ काजियान अस्र’
के इशारों पर हजरत निजामुद्दीन औलिया के खिलाफ उन लोगों ने हंगामा आराइयां
की जिन्हें इंसानियत के दायरे में शुमार करना भी इंसानियत की तोहीन है। वो कौनसा
न पसंद लफ्ज जो हजरत महबूब इलाही के लिये इस्तेमाल न किया गया हो देहली के ओबाश
लोग बर सरे मज्लिस चले आते थे और हजरत निजामुद्दीन औलिया को उन बेहूदा कलिमात के
साथ पुकारते थे जिनका इस्तेमाल किसी काफिर के लिये भी जायज नहीं हजरत महबूब इलाही
उन तमाम दशनाम तराजियों को खंदापेशानी के साथ बर्दाश्त करते और जब वो लोग अपने
खबासत –ए- नफ्सी का मुजाहिरा करके चले जाते तो आप दस्ते दुआ बुलंद फरमाते ‘’ ए अल्लाह इन बे खबर लोगों को
निजामुद्दीन के हक में न पकड़ना मैंने उन्हें माफ कर दिया तू भी अपनी शान दर गुजर
से काम ले।
ये हजरत निजामुद्दीन औलिया की
दुआओं का ही नतीजा था कि देहली शहर बड़े बड़े अजाबों से महफूज रहा। अगर हजरत महबूब
इलाही अपने मुखालिफीन और शर पसंदों को माफ न फरमाते तो अल्लाह के एक वली की ये
दिल आजारियां मुमकिन है बहुत खौफनाक शक्ल इख्तियार कर लेतीं। अगर पढ़ने वाले
तारीख इस्लाम का जायजा लें तो ऐसी बहुत सी मिसालें सामने आयेंगी कि जब औलिया का मजाक उड़ाने वालों
की पूरी पूरी बस्तियां तबाह कर दी गईं और
आसमान से ऐसा कहर नाजिल हुआ जो दर्दनाक भी था और बाइसे इबरत भी। हजरत निजामुद्दीन
औलिया भी अपनी जिंदगी की इसी कड़ी आजमाईश से गुजरे और सरवरे कौनेन सलल्लाहु अलैहि
वसल्लम की सुन्नत को जिंदा रखने के लिये
हमेशा माफी और दर गुजर से काम लिया यही आपका सबसे बड़ी करामात थी, अगर लोग समझने की कोशिश करें।
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